लोगों को पैरों पर खड़ा होने के समर्थ बनाएं
स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक न होने के कारण मैं खुद पंजाब के गांवों में नहीं जा सकता। कुछ इसलिए क्योंकि मुझे अब कार चलाने के लिए मना किया गया है। रिश्तेदारों और मित्रों से पंजाब के गांवों की खबर लगातार मिलती रहती हैं। पुराने कुओं के ढंके जाने और उनके ऊपर से बैलगड़ियों-वाहनों के गुजरने की भी और बारिश न होने पर फसलों के मुरझाने और कम पैदावार की भी।
चुनाव पास आते ही वोट हासिल करने के लिए सत्तारूढ़ं दलों किए जा रहे पाखंडों के बारे में भी। खासकर ऐसे लुभाने वाले बयानों के बारे में जिनमें महिलाओं, बहनों और माताओं को मासिक पेंशनें दी जाती हैं। ये बिना मांगे सुविधाएं बयानों तक ही सीमित नहीं हैं, गरीबी रेखा से नीचे वाले हर व्यक्ति के घर तक पहुंचाए जाते हैं। सुनाने में तो यह भी आया है कि सरकारी कर्मचारी खाद्य पदार्थ वाहनों पर लादकर यह आवाज़ देते घूमते हैं कि अपनी-अपनी बाल्टियां और थैले लेकर गांव के चौराहों या ढंके हुए कुओं पर पहुंच सकते हैं, जहां सरकारी कर्मचारी उनका इंतजार कर रहे होते हैं।
नतीजा यह होता है कि गांव वाले खेतों में फसलों पर ध्यान देने की बजाय गांव के चौराहों पर ही अपनी आंखें व कान लगाए रहते हैं।
आने वाले कल को इसका क्या नतीजा निकलता है, इसकी पहचान कोई ही करता है। चुनाव के बाद सरकार को किस तरफ मुड़ना है, उस ओर कोई ध्यान नहीं देता। वह भी नहीं जो सम्पन्न परिवार आज लाभ लेने के लिए अपने-आप को गरीबी रेखा से नीचे बता रहा है।
सवाल यह नहीं है कि पंजाब में किस सरकार ने शासन किया। सवाल यह है कि दशकों की राजनीति ने पंजाब को क्या दिशा दी? क्या हमने अपने युवाओं के लिए ऐसी अर्थव्यवस्था बनाई है, जहां वे अपने सपनों को हकीकत में बदल सकें और विदेशों की तरफ न देखें।
अगर जवाब नहीं में है, तो हमें यह मानना होगा कि समस्या सिर्फ स्रोतों की नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं की है। सरकारें अपने काम से ज़्यादा अपने प्रचार पर खर्च करने लगी हैं।
लोगों को वास्तव में क्या चाहिए? लोगों को अपने बच्चों के लिए अच्छे स्कूल, बीमारी में अच्छा इलाज, युवाओं को स्थायी रोज़गार, किसान को अपनी फसल का उचित दाम और मज़दूर को अपनी मेहनत का पूरा सम्मान चाहिए।
सवाल मुफ्त बिजली, मुफ्त राशन या मुफ्त यात्रा का नहीं है। सवाल यह है कि क्या राज्य ऐसी व्यवस्था भी बना रहा है जिसमें भावी पीढ़ियों के लिए इन रियायतों की ज़रूरत कम से कम रह जाए। आज ज़रूरत किसी नई रियायत की नहीं, बल्कि नई सोच की है। ऐसी सोच जो नागरिकों को मोहताज नहीं, बल्कि समर्थ बनाए। ऐसी राजनीति जो वोट नहीं, विश्वास जीते। ऐसा राज्य, जो अपने काम से पहचाना जाए।
आखिर में सवाल यह नहीं है कि सरकार लोगों को क्या दे रही है। सवाल यह है कि क्या वह लोगों से अपने पांवों पर खड़े होने का हक तो नहीं छीन रही?
दो महारथियों का चले जाना
पिछले दिनों प्रसिद्ध चिंतक और लेखक मलविंदर जीत सिंह वड़ैच और कहानीकार लाल सिंह दसूहा पंजाबी साहित्य और संस्कृति की झोली में अमूल्य रचनाएं डालने के बाद अपनी सांसारिक यात्रा पूरी करके बिछुड़ गए हैं। ऊपर वाला उनके अंग-संग रहे। वड़ैच मुझसे चार साल बड़े थे, 96 वर्ष के।
बछड़ा एक, चहेते चार
हरियाणा के झज्जर ज़िले में एक बछड़ा कुएं में गिर गया। कुआं काफी समय से बंद था, लेकिन स्थानीय लोगों ने अब तक उसे ऊपर से ढंका नहीं था। हर एक ने बछड़े को बचाना ज़रूरी समझा और दो लोग कुएं में उतर गए। जब उन्होंने बाहर खड़े लोगों के किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया, तो दो और लोग कुएं में उतर गए। जब उनकी ओर से भी कोई जवाब नहीं आया, तो बचाव कार्य शुरू किया गया। चारों लोगों को बाहर निकाल लिया गया, लेकिन वे सांस नहीं ले रहे थे। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत लाया घोषित कर दिया गया। मृतकों की पहचान मोनू, दलबीर और नरेंद्र के तौर पर हुई, जो स्थानीय गांव के निवासी थे और चौथे व्यक्ति की पहचान रामू के रूप में हुई, जो एक प्रवासी मज़दूर था। बछड़ा तो शायद उनसे पहले ही मर चुका था। सबका कहना है कि ये मौतें ज़हरीली गैस चढ़ने से हुई हैं।
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