संकट बनता निर्माणाधीन सुरंगों का ढहना
मानव जीवन के लिए प्रकृति को छलनी कर किया जा रहा आधुनिक विकास, जहां ज़रूरी है, वहीं संकट का सबब भी बन रहा है। सिक्किम के नामची ज़िले में समरडुंग-झोलुंगे में नामची जल विद्युत सुरंग परियोजना (तीस्ता नदी चरण-5) की निर्माणाधीन सुरंग में तेज बारिश, भूस्खलन और जहरीली गैस मीथेन के रिसाव चलते बड़ी दुर्घटना घटी है। इसमें 20 मजदूरों की मौत हो गई। कुल 25 मजदूर घटना के समय सुरंग में काम कर रहे थे। 500 मेगावाट की इस परियोजना में विस्फोट के कारण मीथेन का रिसाव हुआ बताया जा रहा है। रिसाव के चलते राष्ट्रीय और राज्य आपदा राहत दलों को बचाव कार्य में कठिनाई आ रही है। सुरंग के भीतर ऑक्सीजन का स्तर बहुत कम रह गया था। इस कारण कई बेहोश भी हो गए थे। फंसे लोगों को निकालने के लिए हर संभव प्रयास हो रहे हैं। सुरंगों के लिए किए जाने वाले भीषण विस्फोटों को भूस्खलन एक बड़ा कारण माना जा रहा है। नामची ज़िले में जल विद्युत ऊर्जा निगम तीस्ता छह परियोजनाओं के लिए सुरंगें बनाई जा रही हैं। समूचे हिमालय में घट रही ऐसी घटनाएं पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा को लेकर बड़े सवाल खड़े कर रहीं हैं।
इस सुरंग के अलावा सिक्किम के ऊंचाई वाले नगरों व ग्रामों तक पहुंच आसान बनाने के लिए अनेक सुरंगें निर्माणाधीन हैं। इनमें 578 मीटर लंबी एक सुरंग मंगन ज़िले की सीमा में गंगटोक-चुंगथांग राजमार्ग पर बन रही है। दूसरी प्रमुख सुरंग सिवोक-रंगपो है। इसे पाक्योंग ज़िले में भारत-तिब्बत तक बनाया जा रहा है। यह सुरंग सीमा तक सैनिकों की आवाजाही को आसान बनायेगी। मालूम हो, बीते साल फरवरी 2025 में तेलंगाना के नगरकुरनूल ज़िले के डोमलपेंटा गांव में श्रीशैलम लेफ्ट बैंक कैनाल (एसएलबीसी) परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग में फंसे आठ लोगों का जीवन बचाने में अनेक मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा था। 42 किमी लंबी यह सुरंग बनने के बाद दुनिया की सबसे लंबी पानी की सुरंग कहलाएगी। 2023 में उत्तराखंड के उत्तरकाशी में निर्माणाधीन सुरंग का एक हिस्सा भूमि में धंस जाने के कारण 40 मजदूर फंस गए थे। उनके प्राण पिछले कुछ दिनों से संकट में ज़रूर हैं लेकिन उन्हें बचा लिया गया था। यह हादसा उत्तरकाशी से 55 किमी दूर निर्माणाधीन सिल्क्यारा-पोलगांव सुरंग के भीतर हुआ था। यह हादसा भू-स्खलन के कारण सुरंग का 15 मीटर हिस्सा जमीन में धंस जाने के कारण घटित हुआ था। बरसात के मौसम में सुरगें मलबे व पानी से भर जाती हैं। फंसे लोगों को बचाने के लिए रैट माइनर्स अर्थात चूहों की तरह खदान खोदने वाले विशेषज्ञ खनिक इस काम को अंजाम तक पहुंचा पाते हैं। यही सिक्किम के लोगों को बचने के काम में जुटे हैं। बचाव दल रोबोटिक कैमरों की मदद से लोगों तक बमुश्किल पहुंच पता है। ये थर्मल फिशिंग नौका से सुरंग के अंदर पहुंचते हैं।
वर्तमान में देशभर के पहाड़ों की स्थिति की अनदेखी करके सड़कें, रेल लाइन, नहरों के पानी की निकासी, नदी जोड़ों और जल विद्युत परियोजनाओं के लिए हिमालय के शिखरों से लेकर मध्य और दक्षिण भारत के अनेक पहाड़ों को खोदा जा रहा है। इन कठिन कार्यों को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए अनेक दुर्घटनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है। समूचे हिमालय क्षेत्र में बीते एक दशक से पर्यटकों के लिए सुविधाएं जुटाने के परिप्रेक्ष्य में जल विद्युत संयंत्र और रेल परियोजनाओं की बाढ़ आई हुई है। इन योजनाओं के लिए हिमालय क्षेत्र में रेल गुजारने और कई हिमालयी छोटी नदियों को बड़ी नदियों में डालने के लिए सुरंगें निर्मित की जा रही हैं। बिजली परियोजनाओं के लिए जो संयंत्र लग रहे हैं, उनके लिए हिमालय को खोखला किया जा रहा है। इस आधुनिक औद्योगिक व प्रौद्योगिकी विकास का ही परिणाम है कि आज हिमालय ही नहीं, हिमालय के शिखर दरकने लगे हैं जिन पर हजारों साल से मानव बसाहटें अपने ज्ञान-परंपरा के बूते जीवन-यापन करने के साथ हिमालय और वहां रहने वाले अन्य जीव-जगत की भी रक्षा करते चले आ रहे हैं। हिमालय और पृथ्वी सुरक्षित बने रहेंए इस दृष्टि से कृतज्ञ मनुष्य ने अथर्ववेद में लिखे पृथ्वी-सूक्त में अनेक प्रार्थनाएं की हैं। यह सूक्त में राष्ट्रीय अवधारणा एवं वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को विकसित, पोषित एवं फलित करने के लिए मनुष्य को नीति और धर्म से बांधने की कोशिश की हैं लेकिन हमने कथित भौतिक सुविधाओं के लिए अपने आधार को ही नष्ट करने का काम आधुनिक विकास के बहाने कर दिया। जोशीमठ इसी अनियोजित विकास की परिणति है।
उत्तराखंड के चमोली ज़िले में आने वाले जोशीमठ शहर ने कई अप्रिय कारणों से नीति-नियंताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा जारी उपग्रह तस्वीरों से जोशीमठ के हिमालय के गर्भ में घंस जाने की चिंता जताई है। सिमटती धरती की इन प्रामाणिक सच्चाइयों को छिपाने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और उत्तराखंड सरकार ने अंतरिक्ष एजेंसी समेत कई सरकारी संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे मीडिया के साथ जानकारी साझा न करे। उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहयोगी नदियों पर एक लाख तीस हजार करोड़ की जल विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इनमें से कई पूरी भी हो गई हैं। इन संयंत्रों की स्थापना के लिए लाखों पेड़ों को काटने के बाद पहाड़ों को निर्ममता से छलनी किया जा रहा है और नदियों पर बांध निर्माण के लिए बुनियाद हेतु गहरे गड्ढे खोदकर खंबे व दीवारें खड़े किए जाते हैं। कई जगह सुरंगे बनाकर पानी की धार को संयंत्र के पंखों पर डालने के उपाय किए गए हैं। इन गड्ढों और सुरंगों की खुदाई में ड्रिल मशीनों से जो कंपन होता है, वह पहाड़ की परतों की दरारों को खाली कर देता है और पेड़ों की जड़ों से जो पहाड़ गुंथे होते हैं, उनकी पकड़ भी इस कंपन से ढीली पड़ जाती है। नतीजतन तेज बारिश के चलते पहाड़ों के ढहने और हिमखंडो के टूटने की घटनाएं पूरे हिमालय क्षेत्र में लगातार बढ़ जाती हैं। यही नहीं कठोर पत्थरों को तोड़ने के लिए भीषण विस्फोट भी किए जाकर हिमालय को हिलाया जा रहा है।
हिमालय में हाल ही में केन-बेतवा नदी जोड़ों अभियान की तर्ज पर उत्तराखंड में देश की पहली ऐसी परियोजना पर काम शुरू हो गया हैए जिसमें हिमनद (ग्लेशियर) की एक धारा को मोड़कर बरसाती नदी में पहुंचाने का प्रयास हो रहा है। यदि यह परियोजना सफल हो जाती है तो पहली बार ऐसा होगा कि किसी बरसाती नदी में सीधे हिमालय का बर्फीला पानी बहेगा। हिमालय की अधिकतम ऊंचाई पर नदी जोड़ने की इस महापरियोजना का सर्वेक्षण शुरू हो गया है। यह स्थिति हिमालयी पहाड़ों के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नया बड़ा खतरा साबित हो सकती है। हिमालय के लिए बांधों के निर्माण पहले से ही खतरा बनकर कई मर्तबा बाढ़, भू-स्खलन और केदारनाथ जैसी प्रलय की आपदा का कारण बन चुके हैं।



