बेअदबी संबंधी कानून के बारे में मतभेद कम करने की आवश्यकता
होता रहा मुकाबला पानी का और प्यास का,
सहरा उमड़ उमड़ पड़े, दरिया ब़िफर ब़िफर गए।
अदीम हाशमी का यह शे’अर इस समय आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार तथा श्री अकाल तख्त साहिब के बीच जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) एक्ट-2026 के मामले में चल रही कशमकश की ही तर्जुमानी कर रहा है। इस समय एक बार फिर सरकार तथा श्री अकाल तख्त साहिब के बीच तनाव शिखर पर पहुंच गया है। वास्तव में 29 जुलाई, 2026 को चीफ खालसा दीवान के प्रमुख, ‘आप’ के विधायक, पूर्व मंत्री इन्द्रबीर सिंह निज्जर तथा श्री अमृतसर के ज़िलाधीश दलविन्दर जीत सिंह ने इस कानून में संशोधन के बारे में श्री अकाल तख्त साहिब द्वारा दी गई तारीख के बिल्कुल अंतिम दिन जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज द्वारा इस कानून पर उठाई गई आपत्तियों को दूर करने के लिए, कानून में संशोधन की बजाय कानून के नियमों के मसौदे के ज़रिये परिभाषा बदल कर मामले का समाधान करने के यत्न करते हुए एक प्ररूप श्री अकाल तख्त साहिब के सचिवालय को सौंपा था, तो हमारा माथा उसी समय ही ठनक गया था कि मामले का समाधान नहीं होगा, अपितु नए टकराव की ओर जाएगा, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि इस मामले में दयानतदारी की कमी है और यत्न न्याय का कम और राजनीतिक लाभ का अधिक है। इस बारे जहां सरकार पर सवाल खड़े होते हैं, वहीं कुछ लोग जत्थेदार साहिब पर भी एक पक्ष की राजनीति को सहारा देने के आरोप लगा रहे हैं। वास्तव में हुआ भी ऐसा ही, आज श्री अकाल तख्त साहिब के कार्यकारी जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने बाकायदा प्रैस कान्फ्रैंस करके सरकार द्वारा नियम बनाने के पेश किए गए पुलिंदे को रद्द कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि मसौदे की जांच करने के बाद वह इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि 90 प्रतिशत बातें जो 29 जून, 2026 को सिख विधायकों तथा मंत्रियों की श्री अकाल तख्त साहिब पर पेशी के समय मानी गई थीं, अब सरकार नहीं मान रही। उन्होंने आरोप लगाया कि नियमों के नाम पर चालाकी की जा रही है। उन्होंने कहा कि एक तरफ श्री अकाल तख्त साहिब को सपर्पित होने की बात कही जा रही है और दूसरी तरफ चालाकी की जा रही है। उन्होंने श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अंग 474 पर आसा महला 2 पर दर्ज इस तुक—
सलामु जबाबु दोवै करे मुंढहु घुत्था जाइ।
नानक दोवें कूड़ीया थाइ न काई पाइ।
का ज़िक्र भी किया।
सरकार की ओर से कानून में संशोधन करने की बजाय श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार द्वारा उठाए गए नुकतों के समाधान के लिए कि अनजाने में हुई गलती या लापरवाही को बेअदबी नहीं माना जाएगा, सिर्फ जानबूझ कर बेअदबी करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी, धार्मिक खोज, कथा कीर्तन, प्रचार तथा डिजिटल माध्यम से गुरबाणी के प्रचार पर रोक नहीं होगी। नगर कीर्तन या धार्मिक समारोह के दौरान अनजाने में हुई समस्या तथा घरों में प्रकाश एवं सुख आसन पर एक्ट का प्रभाव नहीं होगा। प्रत्येक स्वरूप के लिए यूनीक नम्बर एस.जी.पी.सी. जारी करेगी और उसके पास ही रहेगा। ऐसे कई अन्य नियम बनाए गए ताकि श्री अकाल तख्त साहिब की आपत्तियां दूर हो सकें। कस्टोडियन की परिभाषा भी साफ की गई। कहा गया कि एक्ट का एकमात्र उद्देश्य बेअदबी करने वालों के कड़ी सज़ा देना है, संगत या सेवादारों को परेशान करना नहीं, परन्तु जत्थेदार गड़गज्ज ने सिख विधायकों को तथा मंत्रियों को कहा है कि 3 अगस्त को शुरू होने वाले विधानसभा सत्र में तब तक इस कानून पर कोई चर्चा नहीं की जाए, जब तक इस बारे श्री अकाल तख्त साहिब से कोई आगामी सहमति नहीं बन जाती, परन्तु यह अच्छी बात है कि जत्थेदार ने सीधा टकराव शुरू करने की बजाय बीच का रास्ता चुना है और इस कानून पर विचार-विमर्श के लिए जस्टिस सेवामुक्त आर.एस. सोढी, जस्टिस महिन्दर मोहन सिंह बेदी, एडवोकेट पूरण सिंह हुंदल, डा. केहर सिंह पटियाला, सिख कुलैक्टिव संस्था के प्रमुख प्रो. जगमोहन सिंह टोनी तथा शिरोमणि कमेटी के सचिव लखवीर सिंह को कोआर्डिनेटर बना कर एक समिति गठित कर दी है और सरकार को कहा है कि वह भी अपनी ओर से इस पर विचार के लिए एक समिति बनाए ताकि दोनों समितियां सहमति पर पहुंच सकें।
हालांकि हमारा यह स्पष्ट प्रभाव है कि दोनों पक्ष इस मामले पर होशियारी एवं अक्ल दोनों से काम ले रही हैं और यह होशियारी एवं अक्ल मामले के समाधान के लिए कम और अपने-अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अधिक इस्तेमाल की जा रही है, परन्तु फिर भी हम श्री अकाल तख्त साहिब की ओर से सभी विरोधों के बावजूद इस समिति के ज़रिये दरवाज़े खुले रखने तथा सहमति का रास्ता देने का स्वागत करते हैं। अब फिर गेंद सरकार के पाले में है कि वह किस ओर बढ़ती है या नहीं।
दोनों तरफ से अक्ल मुकाबिल है आ गई,
देखें कि किस की जीत हो बाज़ार-ए-होश में।
—लाल फिरोज़पुरी
अकाली दल वारिस पंजाब दे का घेराव अन्य अकाली दलों के लिए ललकार
नि:संदेह पहले अकाली दल बादल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने एक के बाद एक, 40 कान्फ्रैंसें करके पंथक हलकों में कुछ अधिमान हासिल किया था, परन्तु अकाली दल वारिस पंजाब दे द्वारा कल जिस प्रकार का प्रदर्शन पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ किया गया, उससे यह उनकी ओर से मुख्यमंत्री को दी गई ललकार वास्तव में अन्य अकाली दलों को दी जा ललकार की भांति ही प्रतीत हो रही है।
ललकारा तो उसने था
औरों को मगर यार,
ललकार उसकी क्यों
मेरे सीने में चुभी है?
वास्तव में लम्बे समय से पंजाब में पंथक राजनीति सड़कों की बजाय बड़ी-बड़ी रैलियों तथा एकत्रता के ज़रिये ताकत के प्रदर्शन में लगी रही है। हां, पंजाब में किसान संगठन अवश्य मोर्चे लगाते हैं, परन्तु उनकी आपसी फूट तथा दर्जनों संगठनों द्वारा प्रतिदिन के बंद से भी लोग परेशान एवं निराश हो रहे हैं।
परन्तु कल अकाली दल वारिस पंजाब दे ने ताकत का प्रदर्शन करने के लिए रैली या कान्फ्रैंस करने की बजाय मुख्यमंत्री का घेराव करने का कार्यक्रम दिया। उनके कार्यकर्ताओं में उत्साह भी था और वे लम्बे समय बाद चंडीगढ़ पुलिस के बैरीकेड तोड़ कर आगे भी बढ़े। हालांकि उनके विरोधी यह आरोप लगा रहे हैं कि उनके साथ चंडीगढ़ पुलिस द्वारा नरमी बरती गई जबकि अन्य पक्ष जब रोष प्रदर्शन के लिए चंडीगढ़ में दाखिल होने का यत्न करते हैं तो पुलिस की सख्ती एवं प्रबंध कहीं अधिक होते हैं, परन्तु विपक्षी दल तो आरोप लगाते ही रहते हैं। इस प्रदर्शन से अकाली दल वारिस पंजाब दे का नेतृत्व अपने कार्यकर्ताओं के उत्साह एवं हौसले के प्रकटावे के साथ-साथ यह सिद्ध करने में भी सफल रहा है कि उनका अपने कार्यकर्ताओं पर अच्छा नियंत्रण है और उनकी पार्टी हालात बिगाड़ने की इच्छुक नहीं अपितु शांति के साथ विरोध करने वाली पार्टी है। यह कदम पार्टी की पहली बनी छवि को सुधारने वाला सिद्ध हुआ है। जिस प्रकार वह शांतिपूर्ण ज्ञापन देकर प्रदर्शन खत्म करने में सफल रहे और वे बंदी सिंहों का मुद्दा भी अपने हाथों में लेने की ओर आगे बढ़े हैं, वह भाई अमृतपाल सिंह की रिहाई, संसदीय अधिकारों तथा पंथक भावनाओं से अपनी पार्टी को जोड़ने में बड़ी सीमा तक सफल दिखाई दिए हैं।
परन्तु इस प्रकार प्रतीत होता है कि उनके कार्यक्रम ने अन्य अकाली दलों को एक चुनौती तथा ललकार दे दी है कि उन्हें भी पंजाब तथा सिख मामलों के समाधान के लिए सड़कों पर उतरना पड़ेगा। विशेषकर अकाली दल बादल जो संगठनात्मक रूप में सबसे मज़बूत है और जिसकी शिरोमणि कमेटी जैसी बड़ी संस्था पर भी पकड़ है, को तो पंथक कतारों में अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए सिर्फ कान्फ्रैंसें ही नहीं, अपितु संघर्ष के अन्य रास्ते अपना कर अपनी ताकत का प्रदर्शन करना ही पड़ेगा, जबकि अकाली दल ‘पुनर सुरजीत’ तथा अन्य अकाली दलों को भी जहां अपनी ताकत दिखाने के लिए नई रणनीति बनानी पड़ेगी और नये कार्यक्रम बनाने पड़ेंगे। वहीं उन्हें आपसी सहयोग की ओर भी देखना पड़ेगा। वास्तविकता यही है कि अकाली दल वारस पंजाब दे के नेताओं भाई अमृतपाल सिंह, पिता बापू तरलोक सिंह, मनप्रीत सिंह इयाली, एस.पी. सरबजीत सिंह खालसा, चाचा परगट सिंह, परमजीत सिंह जौहल आदि ने इस घेराव की रणनीति बना कर अपने मुख्य उद्देश्य में बड़ी सीमा तक सफलता हासिल की है। इस तरह प्रतीत होता है कि अकाली दल वारिस पंजाब दे का यह कदम अन्य अकाली दलों को भी संघर्ष के रास्ते पर ले जाने की शुरुआत करेगा।
ज़िन्दगी नाम है एक
जोहद-ए-मुसलसल का ़फना,
राह-रौ और भी थक
जाता है आराम के बाद।
—़फना निज़ानी
(जोहद-ए-मुसलसल = लगातार संघर्ष)
-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना
-मो. 92168-60000



