81 साल बाद भी क्यों नहीं मिटा हिरोशिमा का भय ?

6 अगस्त 1945 इतिहास में यह तारीख उस भयावह क्षण के रूप में अंकित है, जब विज्ञान की शक्ति ने मानवता की सीमा लांघ दी थी और विनाश का नया अध्याय शुरू हुआ था। यही वह दिन था, जब अमरीका ने जापान के शांत और सांस्कृतिक शहर हिरोशिमा पर ‘लिटिल बॉय’ नामक परमाणु बम गिराया था। उस एक विस्फोट ने लगभग एक लाख चालीस हजार लोगों की जान ले ली थी और लाखों अन्य को पीड़ा, विकलांगता, मानसिक संताप और सामाजिक बहिष्करण के लंबे दौर में धकेल दिया था। हिरोशिमा केवल एक शहर नहीं था, जो जलकर राख हुआ, वह मानव विवेक, चेतना और सहअस्तित्व की अवधारणा पर लगा एक ऐसा स्थायी घाव था, जो आज भी रिस रहा है।
हर साल 6 अगस्त को मनाया जाने वाला ‘हिरोशिमा दिवस’ पूरी दुनिया को यह याद दिलाता है कि जब वैज्ञानिक उपलब्धियां नियंत्रण से बाहर होती हैं तो वे मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाती हैं। हिरोशिमा पर गिराया गया बम कोई आम हथियार नहीं था, वह लगभग 15 किलोटन यानी 15 हजार टन टीएनटी विस्फोटक के बराबर शक्ति रखता था और उसकी विभीषिका ने केवल शहर की इमारतों को नहीं बल्कि वहां की मिट्टी, जल, वायु व मानव शरीर तक को रेडियोधर्मी विकिरण से बुरी तरह प्रभावित किया। बम विस्फोट के तुरंत बाद लगभग 80 हजार लोग मारे गए और वर्ष के अंत तक यह संख्या 1.4 लाख के पार पहुंच गई। वहां की संतानों में जन्म दोष, कैंसर, मानसिक विकार व सामाजिक कलंक के ऐसे दाग लगे, जो पीढ़ियों तक नहीं मिट सके।परमाणु बम से बच निकले लोगों को जापान में ‘हिबाकुशा’ कहा गया। इन लोगों ने केवल शारीरिक पीड़ा ही नहीं, सामाजिक तिरस्कार और मानसिक आघात भी सहा। जिन लोगों ने त्रासदी झेली, उन्हें अक्सर हीन दृष्टि से देखा गया। यही त्रासदी कुछ ही दिन बाद 9 अगस्त को नागासाकी में भी दोहराई गई, जब अमरीका ने ‘फैट मैन’ नामक बम गिराया और एक बार फिर करीब 70 हजार लोगों की जानें चली गई। उन दो हमलों के बाद द्वितीय विश्वयुद्ध भले ही समाप्त हुआ लेकिन मानवता की चेतना पर जो चोट पड़ी, उसकी भरपाई आज तक नहीं हो पाई है। उन बम हमलों ने वैश्विक राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया। उसके बाद युद्ध केवल सैनिकों और हथियारों का खेल नहीं रह गया बल्कि एक ऐसी होड़ में तब्दील हो गया, जिसमें विनाश की क्षमता को ही शक्ति का मानक माना जाने लगा।
हिरोशिमा और नागासाकी की विभीषिका के बाद परमाणु हथियारों की दौड़ शुरू हुई। अमरीका के बाद सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इज़रायल जैसे देशों ने परमाणु बम बनाए और धीरे-धीरे यह शस्त्र राजनीतिक शक्ति और रणनीतिक नियंत्रण का प्रतीक बन गया। संयुक्त राष्ट्र की परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) और व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) जैसे प्रयासों के बावजूद परमाणु खतरा कम नहीं हुआ। कुछ देशों ने इन संधियों को स्वीकार नहीं किया, कुछ ने मात्र औपचारिकता निभाई और कुछ ने गुपचुप अपना परमाणु जखीरा बढ़ाया। पड़ोसी देशों से बढ़ती चुनौतियों के कारण भारत ने भी 1974 में ‘स्माइलिंग बुद्धा’ के नाम से पहला परमाणु परीक्षण किया और 1998 में पोखरण-2 द्वारा स्वयं को परमाणु संपन्न राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। भारत ने ‘नो फर्स्ट यूज’ यानी पहले हमला नहीं करने की नीति अपनाई, जो एक जिम्मेदार परमाणु राष्ट्र की पहचान है लेकिन पाकिस्तान, जिसने 1998 में अपने परमाणु परीक्षणों से ताकत दिखाई, बार-बार इस नीति को चुनौती देता रहा है। भारत-पाक के बीच जब-जब तनाव बढ़ा, चाहे वह कारगिल युद्ध हो, पठानकोट हमला हो, बालाकोट स्ट्राइक हो, पुलवामा व पहलगाम जैसे आतंकी हमले, विश्व समुदाय ने परमाणु टकराव की आशंका के साथ चिंताओं का इजहार किया।
आज हिरोशिमा दिवस की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है क्योंकि विश्व फिर से उन्हीं खतरों की छाया में जी रहा है। रूस-यूक्रेन और अमरीका-ईरान के बीच चल रहे युद्ध, जिनमें अनेक बार परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकियां दी गई हैं, इस बात को स्पष्ट करती हैं कि परमाणु बम केवल संग्रहालय की वस्तु नहीं हैं। उत्तर कोरिया का मिसाइल परीक्षण, ईरान का परमाणु कार्यक्रम, चीन का परमाणु शस्त्रागार बढ़ाने का प्रयास हमें बार-बार इस सच्चाई से अवगत कराते हैं कि हिरोशिमा जैसे दृश्य दोहराए जाने की आशंका कभी भी पैदा हो सकती है। आज जब विश्व जलवायु परिवर्तन, वैश्विक महामारी, जैविक हथियारों और साइबर युद्ध जैसी नई चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब परमाणु हथियारों का अस्तित्व एक ऐसा छिपा हुआ विस्फोटक है, जो केवल एक गलत निर्णय, एक तकनीकी विफलता या एक गलतफहमी से ही धरती को विनाश के गर्त में धकेल सकता है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि हम अब परंपरागत युद्धों की नहीं बल्कि ‘साइबर स्पेस’, ‘ड्रोन स्ट्राइक्स’ और ‘परमाणु धमकी’ जैसे अस्थिर और अनिश्चित युद्धों के युग में प्रवेश कर चुके हैं।
वर्ष 2021 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा परमाणु हथियारों को प्रतिबंधित करने हेतु ‘ट्रीटी ऑन द प्रोहिबिशन ऑफ न्यूक्लियर वेपन्स’ पारित की गई लेकिन दुखद है कि इसमें कोई भी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र शामिल नहीं हुआ। लगभग 70 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए, जिनमें से अधिकांश विकासशील और अपेक्षाकृत छोटे देश थे। यह एक त्रासदी है कि जो देश विश्व में सबसे अधिक परमाणु खतरे का कारण हैं, वही देश इस तरह की शांति संधियों से दूर हैं। परमाणु हथियारों को लेकर एक बड़ा खतरा यह भी है कि यदि कभी यह तकनीक आतंकवादी संगठनों या अस्थिर शासन व्यवस्थाओं के हाथ लग जाती है तो हिरोशिमा से भी अधिक भयावह स्थिति उत्पन्न हो सकती है। वैश्विक सुरक्षा केवल सैन्य बजट बढ़ाने, सीमाओं पर हथियार तैनात करने या अंतरिक्ष से निगरानी रखने तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि यह वैश्विक निगरानी तंत्र, पारदर्शी सूचना साझेदारी, अंतर्राष्ट्रीय संधियों की मजबूती और वैश्विक जनचेतना पर आधारित होनी चाहिए।
हिरोशिमा दिवस वास्तव में वर्तमान में चेतना का दीप जलाने और भविष्य की पीढ़ियों को विनाश से बचाने की पुकार है। यह दिन बार-बार हमें यह सवाल करने को मजबूर करता है कि क्या विज्ञान का उपयोग केवल शक्ति प्रदर्शन और भय पैदा करने के लिए होना चाहिए? दुनिया में जब तक एक भी परमाणु हथियार मौजूद है, तब तक हिरोशिमा दिवस प्रासंगिक रहेगा। यह न केवल हमें अतीत की गलती की याद दिलाता है बल्कि भविष्य की रक्षा के लिए संकल्प लेने का दिन भी है। यह मानवता के सबसे कठिन समय में विज्ञान और चेतना के सही संतुलन की आवश्यकता का स्मारक है। सच्ची शक्ति तब है, जब कोई विनाश कर सकता हो पर न करे। हिरोशिमा दिवस हमें यही संदेश देता है कि शांति कोई विकल्प नहीं बल्कि एकमात्र रास्ता है।

#81 साल बाद भी क्यों नहीं मिटा हिरोशिमा का भय ?