पंजाब के हितों को दृष्टिविगत कर रहे हैं राजनीतिक दल

वो तो बस झूठी तसल्ली को कहा था तुम से,
हम तो अपने भी नहीं ़खाक तुम्हारे होते।
जुनैद अ़ख्तर का यह शे’अर पंजाब के रानजीतिज्ञों पर ही नहीं, अपितु अब तो ज़्यादातर पंजाबियों पर भी चरितार्थ होता है। यहां नेता पंजाब, पंजाबी तथा पंजाबियत की बात सिर्फ अवाम को मूर्ख बनाने के लिए ही करते हैं, अन्यथा जिस प्रकार पंजाब के पानी, हवा, धरती, ़गैरत तथा संस्कृति को दूषित किया जा रहा है, और जिस प्रकार पंजाब के साथ अन्याय हुए हैं और हो रहे हैं, कोई पार्टी या कोई नेता तो होता जो इसके खिलाफ खुल कर कोई स्टैंड लेता। हमारे पंजाबी जिनमें हम सब शामिल हैं, छोटे-छोटे स्वार्थों तथा लाभ की ओर ही देखने के आदी हो गए हैं। 
किसी को चिन्ता नहीं कि मुफ्त की सुविधाएं पंजाबियत की ़गैरत को खत्म कर रही हैं। पंजाब लगातार रेगिस्तान बनने की ओर बढ़ रहा है, परन्तु हम धान, जो हमारा दैनिक आहार भी नहीं, के लिए मुफ्त बिजली देने से गुरेज़ नहीं कर रहे। यहां स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं किसानों को सब्सिडियां देने के खिलाफ नहीं हूं, परन्तु यह तर्क-संगत एवं समूचे पंजाब के हित में होनी चाहिएं। चाहिए तो यह है कि धान के लिए मुफ्त बिजली की बजाय अन्य फसलों को उत्साहित करने के लिए यही पैसा उन फसलों का न्यूनतम खरीद मूल्य तय करने पर खर्च किया जाए ताकि किसान के लिए धान लगाने की बजाय अन्य फसलें अधिक लाभदायक हो सकें। यही पैसा कृषि आधारित कारखाने लगाने पर क्यों नहीं इस्तेमाल किया जाता? जितनी बिजली सब्सिडी अब तक पंजाब ने दी है, यदि उसे बिजली की औद्योगिक कीमत से मापा जाए तो वह लगभग एक लाख, 65 हज़ार करोड़ रुपये बनती है। इस कीमत के साथ पंजाब को कुछ बड़े कृषि आधारित उद्योग दिए जा सकते थे जो पंजाब के किसानों की कृषि के धान के चक्र में से निकलने में ही मदद नहीं करते, अपितु समूचे पंजाब के विकास का कारण भी बनते। धान जैसी फसल के लिए मुफ्त बिजली देना पंजाब से द्रोह कमाने से कम नहीं, परन्तु हां, किसान की आर्थिकता को मज़बूत करने के लिए वैकल्पिक कदम उठाने भी आवश्यक हैं। पंजाब की राजनीतिक पार्टियां पंजाब के हितों की सिर्फ बात ही करती हैं, परन्तु वास्तव में उनकी प्रत्येक लड़ाई सिर्फ अल्पकालिक हितों एवं चुनाव राजनीति पर आधारित होती है। सच्चाई तो यह है कि अब नेता अपनी पार्टियों की भलाई के लिए नहीं, अपितु अपने गुट और उससे भी आगे बढ़ कर अपने निज को ही प्राथमिकता दे रहे हैं। अकबर इलाहाबादी के शब्दों में:
़कौम के ़गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ,
रंज लीडर को बहुत है, मगर आराम के साथ। 
पंजाब भाजपा की हालत 
भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी थी जहां पार्टी के फैसले के खिलाफ आम तौर पर ब़गावत देखने को नहीं मिलती थी, परन्तु इस बार पार्टी के टकसाली नेताओं के सब्र का प्याला भर गया प्रतीत होता है। पहली बार है कि लगभग 7 ज़िलों में पार्टी में नई नियुक्तियों के खिलाफ आवाज़ उठ रही है। वैसे तो पिछले कौंसिल चुनाव के परिणाम ने ही सिद्ध कर दिया था कि शहरों के भीतर पार्टी का पुराना काडर पार्टी से निराश है। यही कारण है कि शहरी वोट में भाजपा सबसे पीछे रह गई थी, परन्तु अब नई नियुक्तियों में तो शायद पंजाब भाजपा के अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों को भी विश्वास में नहीं लिया गया। हमें जो ‘सरगोशियां’ सुनाई दी हैं, उनके अनुसार ढिल्लों ने गृह मंत्री अमित शाह को एक पत्र लिख कर कहा है कि जब नियुक्तियों हेतु मुझे नहीं पूछा गया तो परिणाम की ज़िम्मेदारी भी मेरी नहीं होगी। हमारी जानकारी के अनुसार नई नियुक्तियों में सिर्फ पंजाब भाजपा के संगठन महासचिव मंथरी श्रीनिवासलु तथा केन्द्रीय संगठन महासचिव बी.एल. संतोष की ही चली है। हां, कुछेक नियुक्तियों पर आरएसएस के कुछ अन्य नेताओं का प्रभाव भी दिखाई देता है। पंजाब भाजपा में पहले कांग्रेस से आए सुनील जाखड़ तथा फिर केवल सिंह ढिल्लों को अध्यक्ष बनाए जाने पर ही पार्टी के टकसाली काडर में निराशा थी, परन्तु जलती पर तेल का काम नई नियुक्तियों ने कर दिया है। उल्लेखनीय है कि पार्टी के 5 बड़े पदाधिकारी सिर्फ लुधियाना से ही ले लिए गए हैं, जिनमें 5 में से 3 महासचिव, एक उपाध्यक्ष तथा कोषाध्यक्ष शामिल हैं। पार्टी के नाराज़ नेताओं की हालत शकील बदायूनी के इस शे’अर जैसी है:
कितने मसरूर थे जीने की दुआओं पे शकील,
जब मिले रंज तो तासीर पे रोना आया। 
(मसरूर = खुश, आनंदित)
पंजाब ‘आप’ की हालत  
चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो,
आईना झूठ बोलता ही नहीं।
—कृष्ण बिहारी नूर
(आईना =शीशा)
पंजाब की आम आदमी पार्टी में कितने ही विधायकों एवं मंत्रियों के खिलाफ उनकी अपनी ही पार्टी या सरकार ने कार्रवाई की थी, परन्तु पार्टी में किसी तरह की ब़गावत दिखाई नहीं दी थी, परन्तु अब जब आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी के दर्जनों विधायकों की टिकटें कट जाने की चर्चा शुरू हुई है, तो वे विधायक आपस में बातचीत करके अपनी रणनीति बना रहे बताए जाते हैं, जिन्हें अपनी टिकट कट जाने की आशंका सता रही है, परन्तु अभी ये बातें सिर्फ हवा में हैं क्योंकि कुछ स्थानों पर जहां विधायकों के मुकाबले नये हल्का प्रभारी नियुक्त किए गए हैं, वहां कहीं भी खुली ब़गावत दिखाई नहीं देती, परन्तु चर्चा है कि ये विधायक सरकार के डंडे से डरते हैं और चुनाव संहिता लागू होने का इंतज़ार कर रहे हैं, अत: वास्तविकता तो चुनाव संहिता लागू होने के बाद ही सामने आएगी। 
पंजाब कांग्रेस की हालत 
पंजाब कांग्रेस की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती ही जा रही है। हालांकि हमारी सूचना के अनुसार पार्टी के प्रमुख नेता के.सी. वेणुगोपाल ने चरणजीत सिंह चन्नी तथा पंजाब कांग्रेस के दो अन्य प्रमुख नेताओं को बुला कर कुछ दिन चुप रहने और पार्टी कांफ्रैंसों में अपने समर्थकों को नारेबाज़ी से रोकने के लिए कहा है। हमारी जानकारी के अनुसार कांग्रेस हाईकमान कोई बीच का रास्ता निकालने के बारे में सोच रही है। ऐसी हालत में राजा वड़िंग के स्थान पर चन्नी को छोड़ कर कोई तीसरा व्यक्ति पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जा सकता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इस समय सबसे आगे विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा का नाम है, क्योंकि वह पंजाब कांग्रेस की आतंरिक कलह में किसी भी पक्ष के साथ खुल कर नहीं चले, जबकि अन्य नामों में विजयइन्द्र सिंगला, सुखजिन्दर सिंह रंधावा, परगट सिंह तथा गुरजीत सिंह औजला के नाम की चर्चा है, परन्तु सिर्फ यह ही नहीं, लगभग आधा दर्जन अन्य गैर-जट्ट नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं। हो सकता है कि कोई डार्क हार्स अर्थात कोई अनजाना नाम ही आगे ले आया जाए। इस बीच जब पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल राजा वड़िंग को पुन: स्थापित करने के यत्न कर रहे हैं, उस समय भी पार्टी के चुनाव रणनीतिकार और प्रशांत किशोर के पुराने साथी सुनील कानूगोलू तथा कांग्रेस के सांसद शशि कांत सैंथिल भी पंजाब का जायज़ा लेकर गए हैं। कांग्रेस हाईकमान की हालत तो मोमिन खां मोमिन के इस प्रसिद्ध शे’अर जैसी प्रतीत हो रही है:
चल दिये सू-ए-हरम, कू-ए-बुतां से मोमिन,
जब दिया रंज बुतों ने तो ़खुदा याद आया।
(सू-ए-हरम = रब के घर की ओर)
(कू-ए-बुतां = महबूब का मुहल्ला)
अकाली दलों की हालत
अकाली दलों की हालत ‘हन्ने-हन्ने मीरी’ जैसी प्रतीत होती है, ऊपरी नज़र में यह सिखों की 12 मिसलों के समय जैसी प्रतीत होती है, परन्तु वास्तव में यह उससे भी कहीं बुरी हालत है। एक तो सिख वोट कांग्रेस, ‘आप’ तथा भाजपा को भी पड़ते हैं और शेष रहते पंथक वोट भी कई अकाली दलों में विभाजित हो जाएंगी। मिसलों के समय भी सिख सांझे दुश्मन से लड़ने के लिए आपसी विरोध भुला कर एकजुट होकर लड़ते थे, परन्तु अब अकाली दलों के एकजुट होने के आसार नहीं के बराबर हैं। चाहे कुछ अकाली दलों में एकता की बातचीत गाहे-बगाहे चलती रहती है, परन्तु एकता के लिए लगाई जाती शर्तें यह साफ प्रगट करती हैं कि एकता के आसार अभी बहुत दूर हैं। इस बीच पता चला है कि अकाली दल पुनर सुरजीत अकाली दल (बादल) के नेताओं सहित बाबा सरबजोत सिंह बेदी के ज़रिये शीघ्र ही सभी अकाली दलों की बैठक बुलाने पर विचार कर रहा है, परन्तु वास्तव में इस समय अकाली दलों की हालत एक गीत के बोल जैसी है :
इस दिल के टुकड़े हज़ार हुए, 
कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा।
-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना
-मो. 92168-60000

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