क्या मोहन भागवत के यत्न सफल होंगे ?

ऐसा लगता है कि संघ परिवार सुपर फास्ट ट्रेन की तरह सरपट भाग रहा है, इस बात से बेखबर कि सामने एक पहाड़ है और अगर इसने ट्रैक चेंज नहीं किया तो हादसा होना तय है। मोहन भागवत इस बात को जानते हैं इसलिये वो रह रह कर संघ परिवार को ट्रैक बदलने की सलाह दे रहे हैं। वो जानते हैं कि सत्ता में आने के बाद संघ परिवार को ऐसा ‘शाही रोग’ लग गया है कि पतन निश्चित है। जेन-ज़ी आंदोलन पर दिया उनका हालिया बयान पूरे परिवार को एक गंभीर मशविरा है। पर अभी तक सत्ता के नशे में चूर पूरा परिवार उनकी राय को काफी हद तक अनसुना करता रहा है। वो उनके बताये रास्ते पर चलने को तैयार नहीं दिखा लेकिन अब पानी नाक तक पहुंच गया है। 
भागवत ने कॉकरोच आंदोलन के बारे में थोड़ा देर से बोला लेकिन काफी सोच समझ कर बोला। उन्होंने जेन-ज़ी से बात करते हुए तीन बेहद अहम बातें कही हैं और संघ परिवार को, विशेष तौर पर सरकार को संदेश दे दिया है कि वो घड़ी आ गई है जब भाजपा को अपना रास्ता बदलने की सख्त ज़रूरत है। 
एक, उन्होंने बिना किसी लाग लपेट के कहा है कि ‘जेन ज़ी आंदोलन राष्ट्र विरोधी नहीं है। वो हमसे कहीं अधिक ईमानदार है।’ ये बयान संघ के तीसरे नंबर के नेता सह सरकार्यवाह अतुल लिमये को तगड़ी फटकार है जिन्होंने दो दिन पहले ही जंतर मंतर आंदोलन को राष्ट्र विरोधी और संविधान विरोधी कहा था। अतुल लिमये के बयान ने भाजपा सरकार और संघ के दूसरे संगठनों के उन बयानों को वैधता प्रदान की थी जो लगातार अपने वक्तव्यों से आंदोलन को राष्ट्रविरोधी और विदेशी साजिश बताने में जुटे थे। 
संघ में लिमये के स्तर का नेता बहुत सोच समझ कर बयान देता है। और जब वो देता है तो फिर उसको काटा नहीं जाता। ऐसे में सर संघचालक का सीधे तौर पर लिमये के बयान से बिल्कुल उलट पूरे आंदोलन को सही ठहराना, संघ परिवार के लिये एक बड़ी घटना है जो इस बात का प्रमाण है कि संघ में आंदोलन को लेकर एक राय नहीं है और आरएसएस के अंदर एक बड़ा तबका है जो सच्चाई को देखना नहीं चाहता या फिर विचारधारा में अंधा हो गया है। भागवत का बयान ऐसे लोगों को तगड़ी चेतावनी है कि अभी भी वक्त है, जाग जाओ, नहीं तो संघ परिवार को कोई बचा नहीं पायेगा। 
दो, भागवत ने अपने बयान के जरिये लोकतंत्र और लोक आंदोलन के रिश्ते को बहुत बारीकी से रेखांकित करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा है, ‘लोकतंत्र में प्रोटेस्ट करना भी वार्तालाप है। जब कोई नहीं सुनता तो चिल्लाना पड़ता है।’ पिछले 12 साल में भारतीय लोकतंत्र में लगातार ये नैरेटिव बनाने का प्रयास किया गया है कि प्रोटेस्ट, धरना प्रदर्शन और आंदोलन देश में अस्थिरता पैदा करते हैं, अराजकता फैलाते हैं और आम जन जीवन को अस्त व्यस्त करते हैं। लिहाजा इसकी ज़रूरत नहीं है। हर तरह के आंदोलन को फिर वो चाहे किसानों का आंदोलन हो या फिर शाहीन बाग का आंदोलन, एक विदेशी साजिश कह कर छवि को धूमिल करने की कोशिश की गई है। अनशन करने की आशंका मात्र से लोगों के घरों पर पुलिस पहुंच जाती है। गैर कानूनी तरह से ऐसे लोगों को या तो थाने में घंटों बिठाया जाता है या अपने ही घर में नज़रबंद कर दिया जाता है। बड़े पैमाने पर धरपकड़ आम है। बड़ी संख्या में कड़ी धाराओं में केस दर्ज कर डराया धमकाया जाता है और उनके सहयोगी टीवी चैनल ऐसे मौकों पर आंदोलनों का साथ देने की बजाय पुलिस, सरकार और सत्ताधारी पार्टी के साथ खड़े दिखाई देते हैं। किसान आंदोलन को खुलेआम खालिस्तानी कहा गया और शाहीन बाग आंदोलन को देश विरोधी जबकि सब जानते थे कि ये आंदोलन गांधीवादी तरीके से अपनी मांगों को लेकर सड़क पर बैठे थे। बजाये उनके मुद्दों पर चर्चा करने के टीवी पर टूल किट पर चर्चा होती है और ये बताया जाता है कि कैसे देश में अस्थिरता का वातावरण पैदा करने की कोशिश की जा रही है। 
जब से पड़ोसी देशों श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में जेन ज़ी के आंदोलन के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ तब से हर प्रदर्शन को एक बड़ी साजिश कह कर देशवासियों को डराने का इंतज़ाम किया गया। इस कड़ी में जंतर मंतर के आंदोलन को भी भाजपा के बड़े नेताओं ने लपेट लिया। धर्मेंद्र प्रधान ने आंदोलन को ‘दहशतगर्दों की बी टीम’ कहा तो भाजपा के नये नवेले अध्यक्ष नितिन नबीन ने ‘वाइरस और देश के टुकड़े करने वाला’ करार दिया। कंगना रनौत ने ‘जेन गटर’ कहा तो रमेश विधूडी ने ‘पंचर और ताला बनाने वाला बोला’। आरएसएस के एक आइडियोलाग मोहनदास ने तो सारी हदें पार कर दीं। वो बोले, ‘मैं होता तो उस इलाके में कर्फ्यू लगाकर तीन बार वार्निंग देता और गोली चलवा देता। कुछ लोग मरते तो उठवा कर अस्पताल भेजवा देता।’ भागवत ने इन सबकी बोलती बंद कर दी है और आंदोलन को जायज़ ठहरा कर सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर दिया।  
तीन, मोहन भागवत इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि आंदोलनकारियों पर वाक् हमला और बर्बरता सरकार में शीर्ष पर बैठे लोगों के इशारे के ब़गैर संभव नहीं है। लिहाजा उन्होंने उनको भी नसीहत दे दी। भागवत ने कहा, ‘लीडरशिप भाषण देने, उपदेश देने, सामने खड़े होने और चुनाव जीतने का नाम नहीं है। असली लीडर वो होता है जो पीछे रहता है और अंदर से काम करता है।’ ये वो किस के बारे में कह रहे हैं? उनकी टिप्पणी सीधे-सीधे प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह पर है जो हर मामले का क्रेडिट लेने की कोशिश करते हैं और हमेशा भाषण देने और दूसरों को उपदेश देने की मुद्रा में रहते हैं। और चुनाव जीतने को ही लोकतंत्र का पर्याय मानते हैं। मोहन भागवत ने 2024 चुनाव के बाद भी कहा था कि ‘विपक्ष दुश्मन नहीं होता, वो प्रतिपक्ष होता है’ और ‘स्वयंसेवक में अंहकार नहीं होता।’ ये बयान उसी बयान का विस्तार है। और वो अहंकार से लबालब भाजपा की लीडरशिप को चपत लगा रहे हैं, और कहीं न कहीं मौजूदा संकट के लिये वो मोदी और शाह को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। 
भागवत इस बात को समझ रहे हैं कि कॉकरोचों ने ‘खौफ आधारित सिस्टम’ को पूरी तरह से नोच कर फेंक दिया है। खौफ ही वो हथियार था जिसका बखूबी इस्तेमाल कर मोदी सरकार ने विपक्ष को डरा दिया और पूरी व्यवस्था पर कब्जा कर लिया था। ये खौफ और विचारधारा का कॉकटेल था जिसने सभी संवैधानिक संस्थाओं की कमर तोड़ दी। चाहे वो न्यायपालिका हो या फिर मीडिया, सब सरकार के सामने दंडवत् थे। आंदोलन ने खौफ का साम्राज्य छिन्न-भिन्न किया तो छोटे-छोटे बच्चे सत्ता के सामने खड़े होने लगे और अपना अधिकार मांगने लगे, और अगर अब सरकार और सत्ताधारी दल ने भूल सुधार नहीं की तो फिर जेन ज़ी का विरोध विकराल रूप अख्तियार कर लेगा जिससे न केवल सरकार के जाने का खतरा पैदा होगा बल्कि संघ की साख और विचारधारा दोनों पर कालिख पुत जायेगी। भागवत इस ऐतिहासिक हादसे को रोकने के भगीरथ प्रयास में लगे हैं। क्या वो कामयाब होंगे?

#क्या मोहन भागवत के यत्न सफल होंगे ?