बच्चों के लिए बेहद खतरनाक है अधिक स्क्रीन समय

डिजिटल क्रांति ने विश्व को एक क्लिक पर ला खड़ा कर दिया है। मोबाइल फोन अब सिर्फ बातचीत का साधन नहीं रहा, बल्कि शिक्षा, कारोबार, बैंकिंग, मनोरंजन और सामाजिक सम्पर्क का अहम साधन बन गया है, लेकिन तकनीक की यह सुविधा धीरे-धीरे एक बड़ी सामाजिक चुनौती बनती जा रही है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि मोबाइल के अंधाधुंध इस्तेमाल से बच्चों के बचपन, स्वास्थ्य और मानसिक विकास को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। घरों में रोते हुए बच्चे को चुप कराने के लिए उसे मोबाइल थमा दिया जाता है, उसे खाना खिलाने के लिए कार्टून चला दिए जाते हैं और खाली समय गेम्स या सोशल मीडिया की भेंट चढ़ रहा है। धीरे-धीरे यह सुविधा आदत और लत में बदलती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) और अन्य अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों ने भी इस रूझान को गंभीर चिंता का विषय करार दिया है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार 11 प्रतिशत से अधिक किशोर (टीनएजर्स) सोशल मीडिया की ऐसी लत के शिकार हो चुके हैं। इसी तरह लगभग 12 प्रतिशत बच्चे ऑनलाइन गेमिंग की लत के गंभीर जोखिम में है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति आगामी समय में एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन सकती है। 
बाल रोग विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार लगातार स्क्रीन के सामने बैठे रहने से बच्चों की नींद प्रभावित हो रही है। मोबाइल की नीली रोशनी दिमाग के प्राकृतिक नींद चक्र पर असर डालती है, जिससे बच्चे को देर से नींद आती हैं और सुबह उठने में भी कठिनाई होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्क्रीन पर लगातार समय व्यतीत करने से बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, चिन्ता, उदासी और अकेलेपन की भावना भी बढ़ रही है।
एक समय था जब शाम होते ही सड़कों और पार्कों में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं। क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी, पिट्ठू तथा अन्य परम्परागत खेल बचपन की पहचान होते थे। आज इनकी जगह ऑनलाइन खेलों ने ले ली है। इसका नतीजा यह है कि बच्चों की शारीरिक गतिविधियां कम हो रही है और कम उम्र में ही मोटापा, आंखों की रोशनी कम होना, गर्दन और पीठ दर्द जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।
मोबाइल के ज़रिए बच्चों की पहुंच इंटरनेट की विशाल दुनिया तक हो गई है। इससे उन्हें सीखने के मौके तो मिलते हैं, लेकिन इससे साइबर धमकी, फर्जी जानकारी, ऑनलाइन ठगी और उम्र के अनुकूल न होने वाली सामग्री जैसे खतरे भी बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञ माता-पिता को सलाह देते हैं कि वे अपने बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर नज़र रखें और उन्हें सुरक्षित इंटरनेट इस्तेमाल के बारे में जानकारी दें। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखने की शुरुआत घर से ही हो सकती है। अगर माता-पिता खुद हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे तो बच्चों से अलग उम्मीद नहीं की जा सकती। इसलिए परिवार में प्रतिदिन कुछ समय ‘नो मोबाइल यूज़ टाइम’ के तौर पर निर्धारित किया जाना चाहिए। भोजन करते समय, सोने से पहले और परिवारिक बातचीत के दौरान मोबाइल के इस्तेमाल से बचना चाहिए। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को किताबें पढ़ने, संगीत सुनने, ड्राइंग करने, खेलने, बागवानी तथा अन्य रचनात्मक गतिविधियों की ओर उत्साहित करें।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों को भी डिजिटल अनुशासन के बारे में विद्यार्थियों को जागरूक करने की ज़रूरत है। बच्चों को यह सिखाना ज़रूरी है कि मोबाइल सीखने का साधन है, लेकिन इसका इस्तेमाल सीमित और उद्देश्य पूरा करने वाला होना चाहिए। स्कूलों में खेलों, पाठ्य-पुस्तकों, सांस्कृतिक गतिविधियों को अधिक उत्साह मिलना चाहिए ताकि बच्चों का ध्यान स्क्रीन से हटकर रचनात्मक कार्यों की ओर लगे। 
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