हिमालय की सुरक्षा किसी एक देश की ज़िम्मेदारी नहीं

हिमालय लगातार चेतावनी दे रहा है। कभी अचानक आई बाढ़ के रूप में, कभी हिमस्खलन, कभी ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़, कभी बादल फटने और भूस्खलन के रूप में। केदारनाथ, धौलीगंगा, जोशीमठ, सिक्किम और अब नेपाल की त्रासदियों ने बार-बार बताया है कि पहाड़ केवल भौगोलिक संरचना नहीं हैं, वे एशिया की जल-सुरक्षा, खाद्य-सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका के आधार हैं। लेकिन हम हर आपदा के बाद कुछ समय के लिए चिंतित होते हैं और फिर अपनी विकास-यात्रा में लौट जाते हैं।
हिमालय की त्रासदी का सबसे बड़ा संकट यह है कि उसकी सीमाएं राजनीतिक नहीं हैं। पहाड़ भारत, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और चीन की सीमाओं में बंटे हो सकते हैं, लेकिन हिमालय की पारिस्थितिकी किसी सीमा को नहीं मानती। उसकी बर्फ  पिघलती है तो पानी नीचे आता है। नदी सीमा पार करती है तो उसके साथ बाढ़ व गाद भी सीमा पार करती हैं। सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेकांग जैसी बड़ी नदियां अनेक देशों के जीवन को जोड़ती हैं। इसलिए हिमालय की सुरक्षा किसी एक देश की ज़िम्मेदारी नहीं हो सकती।
विडम्बना यह है कि जिस क्षेत्र को साझा प्राकृतिक संपदा के रूप में देखा जाना चाहिए, वहां क्षेत्रीय सहयोग अभी भी अपेक्षाकृत कमज़ोर है। जलवायु और पर्यावरण से जुड़ी आपदाएं राजनीतिक सीमाओं की अनुमति लेकर नहीं आतीं। नेपाल में हुई त्रासदी ने फिर यह याद दिलाया है कि एक देश में पहाड़ की घटना दूसरे देश के मैदान में संकट बन सकती है। इसलिए आपदा प्रबंधन को भी राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर निकालकर साझा क्षेत्रीय व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा।
इस आवश्यकता को विज्ञान लगातार प्रमाणित कर रहा है। काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डिवेल्पमेंट (आईसीआईएमओडी) की मार्च 2026 में जारी रिपोर्टों ने हिमालय के ग्लेशियरों की स्थिति को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। अध्ययन के अनुसार हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 1990 से 2020 के बीच ग्लेशियरों के कुल क्षेत्रफल में लगभग 12 प्रतिशत और अनुमानित बर्फ  भंडार में 9 प्रतिशत की कमी आई है। इस क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर लगभग 55,782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं और उनमें करीब 5,736 घन किलोमीटर बर्फ  का अनुमानित भंडार है।
चिंता केवल बर्फ के घटने की नहीं है। आईसीआईएमओडी के अनुसार वर्ष 2000 के बाद ग्लेशियरों के पिघलने की दर लगभग दोगुनी हुई है। 1975 से निगरानी किए गए 38 ग्लेशियरों के अध्ययन में कुछ स्थानों पर बर्फ  की मोटाई में 27 मीटर तक की कुल कमी सामने आई है, लेकिन उससे भी बड़ा संकट यह है कि इतने विशाल हिमालयी क्षेत्र में दीर्घकालिक और उच्च गुणवत्ता वाली निगरानी अभी बहुत सीमित है। 38 निगरानी वाले ग्लेशियरों में केवल 7 ही विश्व ग्लेशियर निगरानी सेवा के निर्धारित बेंचमार्क मानकों को पूरा करते हैं। अर्थात हमारे सामने संकट बड़ा है और हमारी निगरानी व्यवस्था अभी छोटी।
भारत में उपग्रह आधारित निगरानी, ग्लेशियल झीलों की पहचान और ग्लेशियल झील से फटने वाली बाढ़ यानी जीएलओएफ  के जोखिम का आकलन करने की दिशा में काम हुआ है। इसरो के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र ने भारतीय हिमालय में चुनिंदा ग्लेशियल झीलों के लिए जीएलओएफ मॉडलिंग और जोखिम आकलन भी किया है, लेकिन हिमालय की जटिलता को देखते हुए केवल तकनीक पर्याप्त नहीं होगी।  वैज्ञानिक जानकारी को स्थानीय प्रशासन, गांवों और सीमापार संस्थाओं तक पहुंचाने की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
हिमालय के संदर्भ में इसका सीधा अर्थ है—सड़क, बिजली, पर्यटन, बांध और संचार की ज़रूरतों से इनकार नहीं, लेकिन उनके निर्माण का तरीका ऐसा हो जो पहाड़ की वहन क्षमता, स्थानीय समाज और प्रकृति को नष्ट न करे।
 आपदा प्रबंधन केवल राजधानी या जिला मुख्यालय से नहीं हो सकता। जिस गांव के ऊपर ग्लेशियल झील है, जिस बस्ती के नीचे नदी बहती है या जिस पहाड़ी ढलान पर भूस्खलन का खतरा है, उस गांव के लोगों को जोखिम की जानकारी सबसे पहले मिलनी चाहिए। स्थानीय समुदायों को चेतावनी प्रणाली, आपदा तैयारी और बचाव योजना का हिस्सा बनाना होगा।(एजेंसी) 

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