ग्लेशियर भले फटते रहें, चीन मेगा डैम अवश्य बनायेगा

नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त, 2026 को ग्लेशियर फटने से ऐसी भयावह तबाही आयी जैसी पहले न देखी गई थी और न ही सुनी गई थी। यह काफी हद तक मानव निर्मित आपदा थी। इस त्रासदी के बाद अनुमान यह था कि चीन यारलुंग त्संगपो नदी जो अरुणाचल प्रदेश में आकर ब्रह्मपुत्र नदी बन जाती है, पर विशाल हाइड्रोइलेक्ट्रिक बांध, जिसे वह ‘प्रोजेक्ट ऑफ़ द सेंचुरी’ कहता है, के निर्माण का इरादा त्याग देगा। विशेषकर इसलिए कि निर्माण-स्थल भारत से लगी सीमा के निकट तिब्बत के भूकम्प सक्रिय क्षेत्र में है। भारत के लिए यह अत्यधिक चिंता व खतरे का विषय है। लेकिन लगता यह है कि चीन मेगा बांध बनाने की अपनी योजना को रोकने के लिए तैयार नहीं है। उसने रीन्यूएबल एनर्जी के लिए अपनी 15वीं पंचवर्षीय योजना में इस बांध को शामिल किया है, जिसे उसने 26 अगस्त के फ्लैश फ्लड व भूस्खलन से पहले 23 जुलाई, 2026 को जारी किया था। चीन यारलुंग त्संगपो नदी पर एक बांध पहले ही बना चुका है, जिसके बारे में उसका कहना है कि इस बांध से दक्षिण पश्चिम चीन के शिजंग स्वायत्त क्षेत्र (जो वास्तव में तिब्बत है) की लगभग 26 प्रतिशत बिजली मांग की पूर्ति हो गई है। हालांकि इस माह के अंत में भारत व चीन की एक्सपर्ट-लेवल मैकेनिज्म ऑन ट्रांसबॉर्डर रिवर्स बैठक होनी है, लेकिन दोनों देशों के बीच हाइड्रोलॉजिकल डाटा को साझा करना नियमित नहीं रहा है और संबंधों के कठिन अवसरों पर इसे स्थगित भी कर दिया गया है। 
बहरहाल, बीजिंग की तरफ से ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं कि प्राकृतिक आपदाओं के डर से वह अपने इस मेगा या सुपर डैम की योजना को रोकने जा रहा है। यारलुंग त्संगपो नदी संसार की सबसे बड़ी नदियों में से एक है। प्रस्तावित बांध की अनुमानित लागत 137 बिलियन डॉलर है और इससे 60 गीगावाट्स बिजली का उत्पादन होगा। इसका अर्थ यह है कि यह थ्री गोर्जेस डैम (चीन की यांग्तज़ी नदी पर बना यह बांध 22,250 मेगावाट बिजली का उत्पादन करता है, जोकि दुनिया में सबसे ज्यादा है) से भी ढाई गुना से अधिक बड़ा होगा। इस बांध का भारत पर बहुत गहरा असर पड़ेगा। सवाल यह है कि चीन यह बांध क्यों बना रहा है और इस संदर्भ में भारत को क्या करना चाहिए? यह बांध बीजिंग के विशाल ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्यों का हिस्सा है या सीमा वार्ता पर नई दिल्ली को बैकफुट पर करने की गहरी साज़िश? प्रश्न यह भी है कि उत्तरपूर्व में नई दिल्ली को अब जल प्रबंधन के संदर्भ में क्या करना चाहिए?
चीन द्वारा इस बांध को बनाने की योजना आश्चर्य के रूप में नहीं आयी है। जब मार्च 2021 में चीन ने अपनी 14वीं पंचवर्षीय योजना (2021-2025) गठित की थी, जिसमें उसने क्लाइमेट व ऊर्जा सुरक्षा के महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किये थे, तो उसने स्पष्ट रूप से यारलुंग के निचले हिस्सों में हाइड्रोपॉवर विकास को वरीयता दी थी। इसलिए अगर भारत में आज इस बात को लेकर आश्चर्य हो रहा है तो इसका मतलब है कि चीन के दीर्घकालीन इरादों को गंभीरता से नहीं लिया गया है। तथ्य यह है कि यारलुंग को लेकर चीन की महत्वाकांक्षी योजनाएं बहुत पुरानी हैं। अपनी 12वीं पंचवर्षीय योजना (2011-2015) में बीजिंग ने यारलुंग के ऊपरी व बीच के हिस्सों में अनेक बांध बनाना प्रस्तावित किया था, जिसमें डागू डैम (640 मेगावाट), ज़न्गामू डैम (510 मेगावाट) व जीअचा डैम (320 मेगावाट) के अतिरिक्त एक अन्य ज़ेक्सु डैम भी था। ज़न्गामू डैम चल रहा है जबकि तीन अन्य डैम रुके हुए हैं; क्योंकि उनमें तकनीकी व लॉजिस्टिकल चुनौतियां बाधा उत्पन्न किये हुए हैं। ऊबड़-खाबड़ ज़मीन, तीव्र ढलान वाले पहाड़ और गहरी खाइयां ‘सुपर डैम’ के निर्माण में बहुत बड़ी चुनौती हैं। इसलिए यह संभव है कि चीन की बड़ी घोषणा वास्तविक निर्माण की बजाय भारत को परेशान भर करने के लिए हो।
दरअसल, सबसे अधिक डरावनी बात यह है कि तिब्बत में भूकम्प के खतरे हमेशा बने रहते हैं। केवल 2024 में तिब्बत में 100 से अधिक भूकम्प आये, जिनकी तीव्रता कम से कम 3.0 थी। अभी कुछ दिन पहले तिनगरी के निकट 6.5 तीव्रता का भयंकर भूकम्प आया, जिसमें जान व माल का ज़बरदस्त नुकसान हुआ। मेडोग काउंटी जहां सुपर डैम बनाना प्रस्तावित है, वहां से तिनगरी लगभग 1,200 किमी के फासले पर है। क्या यह प्राकृतिक आपदाएं चीन की महत्वाकांक्षी योजना को पटरी से उतार देंगी? नहीं। चीन सुपर डैम बनाने के लिए इन खतरों को अनदेखा कर देगा। उसकी अतीत की हरकतें बताती हैं कि वह प्रकृति की सम्प्रभुता की परवाह नहीं करता है। बीजिंग के लिए सीमाओं को पार करने वाली अन्य नदियों की तरह यारलुंग भी स्ट्रेटेजिक एसेट है। भारत के साथ सीमा विवाद में नदी उसके लिए राजनीतिक हथियार बन गई है। यह सही है कि चीन की भौगोलिक ऊपरी तटवर्ती वास्तविकता को नहीं बदला जा सकता, लेकिन भारत की निचली तटवर्ती स्थिति भी आवश्यक रूप से पूर्णत: हानिकारक नहीं है। डाटा से मालूम होता है कि दोनों कम व अधिक जल प्रवाह के दौरान यारलुंग में पानी का वार्षिक आउटफ्लो ब्रह्मपुत्र से कम ही रहता है। इसलिए भारत जल संसाधनों के अनुप्रवाह विकासक के रूप में निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है। 
चीन के साथ जल समझौता होना मुश्किल लगता है। ऐसे में भारत यह कर सकता है कि पानी की मात्रा से आगे बढ़कर अपना वाटर एजेंडा तैयार करे और सीमा पर क्लाइमेट चेंज, आर्द्रभूमि व जैव-विविधता की विस्तृत चिंताओं को सामने लेकर आये। इन पर भारत व चीन दोनों ने संबंधित कन्वेंशनों में हस्ताक्षर किये हुए हैं। इससे उन एमओयू में ताज़ा पहलू आ जायेगा, जो 2002 से मौजूद हैं, जिनमें विशेषज्ञ स्तर की व्यवस्था भी शामिल है, जो पारीछु नदी की घटना के बाद स्थापित की गई थी। ग्लेशियर झील के फटने से इस नदी में बाढ़ आ गई थी और हिमाचल प्रदेश में ज़बरदस्त नुकसान हुआ था। ब्रह्मपुत्र के संदर्भ में भारत को अपनी स्ट्रेटेजिक व नीतिगत पहल को बहुत ध्यानपूर्वक संतुलित रखना चाहिए।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

#ग्लेशियर भले फटते रहें
# चीन मेगा डैम अवश्य बनायेगा