अभी थमेगा नहीं चढ़ावा चोरी का मामला

अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला भारतीय जनता पार्टी के गले की हड्डी बना हुआ है। जैसे ही मामला थमने लगता है कि कोई नई खबर आ जाती है। भाजपा के प्रदेश की सरकार और योगी आदित्यनाथ के करीबी मान रहे थे कि अब यह मामला थम गया है। मंदिर का प्रबंधन संभालने के लिए वायु सेना के पूर्व अधिकारी जितेंद्र मिश्र को ज़िम्मेदारी सौंप दी गई है। 
सीईओ वाली व्यवस्था बनने के बाद सारी बाते समाप्त हो गईं। लेकिन इसी बीच इस मामले की जांच के लिए बनी एसआईटी की रिपोर्ट की बातें सामने आ गईं। पहले कहा जा रहा है कि 25 से 30 बार पैसे चुराने की घटना हुई है, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई रिपोर्ट में एसआईटी ने कहा है कि मंदिर मे 105 बार पैसे चुराने की घटना हुई है और इन सबके वीडियो फुटेज मौजूद हैं। पहले यह भी कहा जा रहा था कि वीडियो फुटेज डिलीट कर दी गई हैं, लेकिन अब फुटेज मौजूद हैं और सौ बार से ज्यादा चोरी हुई है तो इसका जवाब देना होगा। इस बात की चौतरफा कोशिश हो रही है कि चंपत राय से लेकर अनिल मिश्रा और गोपाल राव जैसे बड़ं लोगों को क्लीन चिट मिल जाए और गिरफ्तार किए गए आठ लोगों को ही चोरी के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाए। लेकिन जिस बड़े पैमाने पर चोरी की रिपोर्ट एसआईटी ने दी है, उसके बाद श्रद्धालुओं का भरोसा तभी बनेगा, जब कुछ बड़े लोगों पर कार्रवाई होगी। 
बहुत गहरी है समस्या
आईआईटी बॉम्बे ने डीन (प्रशासनिक मामले) को हटा कर और अपनी आरंभिक टिप्पणी के लिए माफी मांग कर बी-टेक छात्र साहिल वाकोडे की कथित आत्म-हत्या से भड़के विवाद को शांत करने की पहल की है। मुमकिन है कि इससे छात्रों का गुस्सा फिलहाल शांत हो जाए। फिर भी यह प्रश्न अनुत्तरित रहेगा कि आखिर छात्र आत्म-हत्याओं के मामले क्यों तेजी से बढ़े हैं? सिर्फ ऊंचे तकनीकी संस्थानों की बात करें तो आईआईटी बॉम्बे में इस वर्ष छात्र आत्म-हत्या की यह तीसरी घटना है। जब लगातार ऐसी घटनाएं हों, तो चुनौती कारणों की जड़ तक जाने की होती है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने भी यह ज़रूरत समझी। उसने एक टास्क फोर्स बनाई, जिसकी अंतरिम रिपोर्ट में उच्च संस्थानों में मौजूद कथित ‘वाइब्स चेक’ के माहौल का उल्लेख महत्वपूर्ण है। यानी वंचित तबकों से आए छात्रों का आसपास होना संपन्न परिवारों से आए छात्रों को खराब एहसास देता है। इस कारण कमज़ोर पृष्ठभूमि से आए छात्र बहिष्कार, अलगाव, और अपमानजनक स्थितियों का शिकार होने लगते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2018-23 के बीच 13,600 से ज्यादा वंचित समुदायों के छात्रों ने प्रमुख संस्थानों में पढ़ाई बीच में छोड़ दी। बहरहाल, इस परिघटना को भारतीय शिक्षा की व्यापक परिस्थितियों के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में 14,488 छात्रों ने आत्महत्या की। हायर सैकेंडरी और कॉलेज स्तर पर ड्राप आउट करने वाले छात्रों का ऊंचा अनुपात बना हुआ है। अत: यह सिर्फ हाई टेक संस्थानों की समस्या नहीं है, न ही इसे सिर्फ  जातिवाद के कथानक से समझा जा सकता है। माहौल से तालमेल बनाने की चुनौती ज़रूर एक कारण है, मगर आम अवसरहीनता के कारण बढ़ते दबाव पर भी अवश्य ध्यान टिका रहना चाहिए।
हरदीप पुरी का क्या होगा?
राज्यसभा चुनाव की घोषणा के बाद जिस एक चेहरे को लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं, वह पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी का है। वह उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के सांसद हैं। चार महीने बाद पंजाब में विधानसभा का चुनाव होने वाला है। गौरतलब है कि हरदीप पुरी केंद्र सरकार में सिख राजनीति का चेहरा है। पिछले दिनों उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह और माता साहिब कौर का जोड़ा साहिब (चरण पादुकाएं) पटना पहुंचाया है, जो 300 वर्षों से उनके परिवार के पास सुरक्षित रखा था। इसलिए पंजाब चुनाव से पहले हरदीप पुरी मंत्रिमंडल से हटाने का फैसला आसान नहीं होगा। 
दूसरी ओर उनको लेकर बहुत-से विवाद अलग हैं। उनका नाम एपस्टीन फाइल्स में आया था। हालांकि उसके बाद भी वह सरकार में बने रहे। अगर उन्हें मंत्रिमंडल में बनाए रखना है तो राज्यसभा भेजा जाएगा। दूसरी चर्चा इस बात की है कि उन्हें मंत्रिमंडल में रखने की बजाय किसी राज्य का राज्यपाल बनाया जाए या कहीं राजदूत या उच्चायुक्त बना कर भेजा जाए। दोनों विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश से सिख नेता को राज्यसभा भेजने का कोई फायदा नहीं है। एक सीट खाली होगी तो उस पर राज्य की राजनीति के हिसाब से पिछड़े वर्ग के किसी नेता को भेजा जाएगा।
दिल्ली में सिर्फ नोटिस, बंगाल में सीधे नाम कटे 
राजधानी दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के पहले चरण के बाद मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित हो गई है। दिल्ली में लगभग 33 फीसदी लोगों के नाम काट दिए गए हैं। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में दिल्ली में 1.45 करोड़ मतदाता थे, लेकिन अब जो मसौदा सूची प्रकाशित हुई है उसमें सिर्फ  97 लाख मतदाता हैं। करीब 47 लाख नाम काट दिए गए हैं। इनके अलावा बड़ी संख्या में विभिन्न कारणों से लाखों लोगों को नोटिस भेज कर जवाब तलब किया गया है। इसकी खूब चर्चा हो रही है कि चुनाव आयुक्त एस.एस. संधु और उनके परिजनों को नोटिस चला गया तो भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी, दिल्ली के उप-राज्यपाल तरणजीत सिंह संधु, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी नोटिस भेजा गया। 
यह भी कहा जा रहा है कि सिस्टम में जो गड़बड़ी की गई, उसका खमियाज़ा अब बड़े लोग भी भुगत रहे हैं। लेकिन असल में भी क्या ऐसा ही है? ऐसा लग रहा है कि यह पश्चिम बंगाल में लाखों लोगों को नोटिस भेजने और नाम, पता या उम्र में गड़बड़ी के आधार पर लाखों लोगों के नाम काट देने के फैसले का औचित्य स्थापित करने के लिए जान बूझकर किया जा रहा है। गौरतलब है कि जिन गड़बड़ियों पर दिल्ली में नोटिस भेजे जा रहे हैं, वैसी ही गड़बड़ियों पर बंगाल में नाम काट दिए गए। यह उसी प्रक्रिया को मुख्यधारा में लाने का प्रयास है। इसके ज़रिए दिखाया जा रहा है कि बंगाल में कोई गड़बड़ी नहीं हुई, बल्कि वह सामान्य प्रक्रिया थी।

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