एआई के भविष्य पर मतभेद, व्यापार और वैश्विक शांति के मुद्दे पर सहयोग
अमरीका-चीन वार्ता
वॉशिंगटन में 24 सितम्बर को अमरीका-चीन शिखर सम्मेलन में हुई डोनाल्ड ट्रम्प और शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बातचीत से व्यापार, एआई के भविष्य, पश्चिम एशिया के युद्धों और ताइवान के भविष्य जैसे मुद्दों को सुलझाने में कोई बड़ी कामयाबी तो नहीं मिली, लेकिन दोनों नेताओं के बीच दिखी गर्मजोशी ने एक मज़बूत समझ की नींव रखी है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतें वैश्विक शांति बहाल करने के लिए सहयोग करेंगी।
वॉशिंगटन शिखर सम्मेलन इस साल मई में बीजिंग में हुई ट्रम्प-शी वार्ता के ठीक चार महीने बाद हुआ। यह मई के शिखर सम्मेलन में हुई बातचीत का ही अगला चरण था। इसके बाद दोनों नेता मध्य दिसम्बर में मियामी में होने वाली जी-20शिखर सम्मेलन में फिर मिलेंगे, जिसकी मेज़बानी अमरीकी राष्ट्रपति करेंगे। मियामी बैठक में वॉशिंगटन शिखर सम्मेलन के नतीजों को और आगे ले जाने की संभावना है।
वॉशिंगटन शिखर सम्मेलन में हुई बातचीत से दो बातें खास तौर पर उभरकर सामने आईं। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एजेंडा तय किया और कई नए प्रस्ताव पेश किए। ट्रम्प ने सिर्फ अपने अंदाज़ में प्रतिक्रिया दी, लेकिन बातचीत के दौरान वे कोई नया सुझाव नहीं दे पाए। उन्होंने बस सभी लंबित मुद्दों पर अमरीका का रुख़ दोहराया। असल में, शिखर सम्मेलन की शुरुआत में राष्ट्रपति शी ने यह बात कही कि टकराव के बजाय चीनी राष्ट्र के ‘महान पुनरुद्धार’ और ‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ (मगा) के लक्ष्यों को हासिल करना साथ-साथ चले, यही लक्ष्य होना चाहिए।
राष्ट्रपति शी की यह टिप्पणी ट्रम्प को बहुत अच्छी लगी, क्योंकि उनके मगा कार्यक्रम के लिए वामपंथी डेमोक्रेटिक राजनेता लगातार उनकी आलोचना करते रहे हैं। ट्रम्प नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में अपने मगा कार्यक्रम के आधार पर अपने उम्मीदवारों के लिए वोट मांग रहे हैं। मध्यावधि चुनावों से ठीक पहले राष्ट्रपति शी द्वारा मगा का समर्थन करने से बर्नी सैंडर्स और ममदानी जैसे वामपंथी डेमोक्रेट्स ज़रूर नाराज़ हुए होंगे, लेकिन चीनी राष्ट्रपति को इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि उनकी टिप्पणी पर वामपंथी क्या सोचेंगे। शी तो ट्रम्प के साथ अपने रिश्तों का इस्तेमाल करके चीन के लिए ज़्यादा से ज़्यादा फायदा उठाना चाहते थे।
यह देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रपति शी ने अमरीका को एक प्रतिस्पर्धी महाशक्ति के बजाय एक साझेदार के तौर पर साथ लाने पर ज़ोर दिया था। यह नया नज़रिया असल में शी की उस भविष्य की योजना की समझ है, जिसके तहत 2049 में—जो कम्युनिस्ट चीन की स्थापना का 100वां साल होगा, चीन अमरीका को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। भारत के मामले में भी राष्ट्रपति शी ने इस साझेदारी पर ज़ोर दिया, न कि उस दोस्ताना प्रतिस्पर्धा पर, जिसका जिक्र चीनी विश्लेषक हाल तक करते रहे थे। यह नज़रिया शी के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी की उस ताज़ा सोच से निकला है कि अमरीका के साथ शांति और सहयोग की स्थिति में चीन की आर्थिक विकास दर तेज़ी से बढ़ सकती है। इसलिए शी ने शिखर सम्मेलन में कहा, ‘हमें शांति से साथ रहना चाहिए। चीन और अमरीका, दो बड़े देशों के तौर पर सहयोग से फायदा उठा सकते हैं और टकराव से दोनों को नुकसान होगा। हमारी दोनों सेनाओं के बीच नियमित बातचीत होनी चाहिए और संकट के समय बातचीत और उसे रोकने के तरीकों को बेहतर बनाना चाहिए।’ शी जिनपिंग का यह नज़रिया नई सदी में चीनी अर्थव्यवस्था की लगातार हो रही बढ़त और सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति अमरीका के साथ अंतर को कम करने की कोशिश से निकला है। साल 2000 में चीन की कुल जीडीपी (वर्तमान मूल्य में) का अनुमान 1.22 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर था, जबकि अमरीका की जीडीपी 10.25 ट्रिलियन डॉलर थी। पिछले 26 सालों में चीन की जीडीपी बढ़कर 20.85 ट्रिलियन डॉलर हो गई है, जबकि अमरीका की कुल जीडीपी का अनुमानित मूल्य 32.38 ट्रिलियन डॉलर है। राष्ट्रपति शी 2049 तक चीन के लिए अपनी सोच के ज़रिए जीडीपी के अंतर को कम करना चाहते हैं और अमरीका को पीछे छोड़कर चीन को दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनाना चाहते हैं।
तनाव कम करने के उनके प्रस्ताव—जिनमें छात्रों को एक-दूसरे देशों में भेजने के कार्यक्रम के तहत 100,000 युवा अमरीकियों को चीन आने का न्योता देना भी शामिल था, ऐसे समय में आए हैं जब दोनों ताकतों के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और व्यापार को लेकर कड़ी प्रतिस्पर्धा चल रही है और दोनों पक्ष एक-दूसरे पर टैरिफ लगा रहे हैं। फिर भी, युवा अमरीकियों को युवा चीनी ‘जेन ज़ी’ के साथ घुलने-मिलने देने का शी का प्रस्ताव उनके आत्मविश्वास को दिखाता था कि युवा अमरीकियों के आने से युवा चीनी लोगों की सोच पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।
चीनी राष्ट्रपति और मैडम पेंग के सम्मान में आयोजित रात्रि भोज में ट्रम्प का भाषण, जिसमें अमरीकी प्रौद्योगिकी उद्योग के दिग्गज शामिल हुए थे, अमरीका-चीन संबंधों के इतिहास के नज़रिए से काफी अहम था।
एआई के मुद्दे पर शी जिनपिंग ने एआई विकास पर ज़रूरत से ज़्यादा नियंत्रण का विरोध किया और ओपन-सोर्स एआई का समर्थन किया जबकि अमरीका ने चीन के एआई विकास को धीमा करने के मकसद से माइक्रोचिप, सेमी-कंडक्टर, सॉफ्टवेयर और चिप बनाने वाले उपकरणों पर सख्त निर्यात नियंत्रण बनाए रखने पर ज़ोर दिया।
व्यापार की बात करें तो पिछले साल बुसान में हुए शिखर सम्मेलन में टैरिफ कम रखने के लिए जो समझौता हुआ था, वह इस साल नवम्बर में खत्म होने वाला है। इस समझौते को फरवरी, 2027 तक बढ़ा दिया गया है। व्यापार युद्ध के बावजूद अमरीकी बाज़ार में चीनी उत्पादों की बिक्री बढ़ रही है। कुल मिलाकर, 24 सितम्बर के शिखर सम्मेलन में हुई बातचीत से विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था को सकारात्मक संकेत मिले हैं। दोनों देशों के बीच बातचीत लंबी चलेगी, लेकिन अच्छी बात यह है कि दोनों सरकारें टकराव की सीमाओं को समझती हैं। ट्रम्प और शी जिनपिंग दोनों ही लेन-देन पर ध्यान देने वाले हैं। वे अपने देश के हितों को आगे बढ़ाने पर ध्यान देते हैं। बड़े मुद्दों को इसी समझ के दायरे में रखा जाएगा। ट्रम्प इसे जी-2 कहना पसंद कर सकते हैं, लेकिन राष्ट्रपति शी बहुपक्षवाद के लिए प्रतिबद्ध हैं। वह आधिकारिक तौर पर जी-2 का समर्थन नहीं करेंगे। विश्व राजनीति कम से कम अगले दो साल तक यानी नवम्बर 2028 में होने वाले अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव तक इन दो नेताओं के इर्द-गिर्द ही घूमेगी। (संवाद)



