शिक्षा के लिए संघर्ष से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक डा. मनमोहन सिंह

जन्मदिन पर विशेष

डा. मनमोहन सिंह का जन्म अविभाजित पंजाब के गांव गाह (अब पाकिस्तान में) में स. गुरमुख सिंह तथा श्रीमती अमृत कौर के घर 26 सितम्बर, 1932 को हुआ था। 1947 में जब पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के दादा की हत्या हुई, तो उनके पिता पेशावर में काम कर रहे थे। मई और जून के दैरान जब गैर-मुस्लिमों के लिए हालात बिगड़ रहे थे तो मनमोहन सिंह के पिता ने अपने सभी बच्चों को रेलगाड़ी से भारत के उत्तर प्रदेश के हल्द्वानी में अपने दोस्त के घर लाने का फैसला किया। हल्द्वानी आने से पहले मनमोहन सिंह के पिता ने निजी कंपनी की नौकरी छोड़ कर पेशावर में अपना छोटा-सा कारोबार शुरू किया था। जब सांप्रदायिक हालात और बिगड़े तो उनके पिता को कारोबार बंद करना पड़ा और वाघा सीमा के रास्ते आज़ाद भारत आना पड़ा। यहां उनके पास करने के लिए कुछ नहीं था, इसलिए उन्होंने अमृतसर शहर में बसने का फैसला किया और मजीठ मंडी इलाके में एक किराने की दुकाल खोल ही। 
मनमोहन सिंह ने अपनी बेटी को एक बातचीत में कहा, जिसे उन्होंने अपनी किताब में शामिल किया है, ‘हमारे बीच कोई मतभेद नहीं थे, लेकिन मुझे दुकान पर बैठना पसंद नहीं था। मैंने महसूस किया कि मुझे बनता सम्मान नहीं दिया गया।’ डॉ. मनमोहन सिंह सितम्बर 1948 में हिन्दू कॉलेज में दाखिला ले लिया। उन्होंने अर्थ-शास्त्र, राजनीतिक शास्क्ष, गणित, अंग्रेज़ी और फ्रैंच के साथ ह्यूमैनिटीज़ को चुना। 1950 में उन्होंने यूनिवर्सिटी परीक्षा में टॉप किया, जिससे उन्हें कॉलेज में दो साल की स्कॉलरशिप मिली। 
डॉ. मनमोहन सिंह की अर्थ-शास्त्र में गहरी दिलचस्पी थी। एक विद्यार्थी के तौर पर उन्हें यह जानने की उत्सुकता थी कि कुछ देश अमीर क्यों हैं और शेष गरीब क्यों हैं। इसी जिज्ञासा ने उन्हें विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री बनने की राह पर आगे बढ़ाया। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक नीति से जुड़े कई अहम पद प्राप्त किए। 1952 की बात है कि अपनी ग्रेजुएशन की परीक्षा में पहला स्थान प्राप्त करके उन्हें घर से बाहर निकलने का मौका मिला और पंजाब यूनिवर्सिटी की स्कॉलरशिप पर होशियारपुर कॉलेज में दाखिला लिया। उनके अर्थशास्त्र के सिद्धांत के अध्यापक रंगनेकर ने उनको को अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में स्कॉलरशिप के लिए आवेदन करने के लिए उत्साहित किया क्योंकि वह उनके लिए एक उज्ज्वल अकादमिक भविष्य की भविष्यवाणी करते थे। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी अर्थशास्त्र का मक्का थी। कैम्ब्रिज में अपने दाखिले का इंतज़ार करते हुए उन्होंने पंजाब कॉलेज में अपनी अनुसंधान स्कॉलरशिप शुरू की। ब्रिटेन जाने के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ों के लिए उन्हें सभी से बहुत मदद मिली। उनके उपकुलपति ने उन्हें अपनी अनुसंधान स्कॉलरशिप उनके पास रखने की इजाज़त दी, जिससे उन्हें सेंट जॉन्स कॉलेज, कैम्ब्रिज में रहने में मदद मिली, जहां उन्हें दाखिला मिला गया। मनमोहन सिंह सितम्बर 1955 में विमान से ब्रिटेन के लिए रवाना हुए।
हालांकि गांव के लड़के के लिए कैम्ब्रिज एक बड़ा बदलाव था, लेकिन उन्होंने जल्द ही स्वयं को उसके अनुकूल बना लिया। इस युवा को परेशान करने वाली एकमात्र समस्या पैसे की कमी थी। उन्होंने ब्रिटेन में अपने प्रवास के अगले दो साल में होने वाले सभी खर्चे की योजना बनाई और गणना के अनुसार कुल राशि 600 पाउंड आई। उन्हें पंजाब यूनिवर्सिटी की स्कॉलरशिप से करीब 4160 रुपये मिले थे और शेष के लिए वह अपने पिता पर निर्भर थे। 
उन्होंने कम खर्च करके रहने का फैसला किया क्योंकि वह अपने पिता को ज़्यादा परेशान नहीं करना चाहते थे। फिर भी कभी-कभी पैसों की कमी होने पर वह तंग स्थिति में रहते। उन्होंने कॉलेज में किसी से पैसे उधार न लेने का फैसला किया, एक ऐसी आदत जो उन्होंने हमेशा बनाए रखी और ज़िंदगी में कभी भी किसी से उधार नहीं लिया। हालात बहुत खराब होने पर उनकी मदद के लिए विनती कनरे वाला अकेला इन्सान उनका दोस्त मदन लाल सूदन था, जिसे वह होशियारपुर कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएशन के दिनों से जानते थे। उन्होंने उसे एक चिट्ठी लिखी जिसमें लिखा था कि यू.के. में अगले दो साल के दौरान उनके पास 25 पाउंड कम पड़ सकते हैं और इसलिए उन्हें उम्मीद है कि उनका दोस्त उन्हें इस साल 12 पाउंड और अगले साल 13 पाउंड भेज सकता है। दो महीने बाद उनके लिए 3 पाउंड का मनी ऑर्डर आया। शायद यही सब था जो उनका प्यारा दोस्त मनमोहन सिंह को भेज सकता था और मनमोहन इस मदद के लिए हमेशा अपने दोस्त के सदा के लिए धन्यवादी रहे। कॉलेज के पहले साल के आखिर में जब परीक्षा का परिणाम आया तो पता चला कि मनमोहन सिंह पास हो गए हैं। 
उन्होंने अपने दोस्त मदन को लिखा कि उन्हे और पैसे न भेजना क्योंकि उन्हें 20 पाउंड का इनाम मिलेगा, जो बजट में अंदाज़न कमी को पूरा करेगा। 1991 में जब मनमोहन सिंह को भारत का 22वां वित्त मंत्री बनाया गया और उन्होंने संसद में एक ऐतिहासिक बजट पेश किया, तो उन्हें देश में एक बड़े वित्तीय संकट को टालने वाले अर्थशास्त्री के तौर पर सराहा गया, क्योंकि भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार सप्ताह का आयात मूल्य सिर्फ दो दिन का ही बचा था। यह तब था जब उन्होंने देश में विदेशी निवेश के प्रवाह के लिए भारतीय अर्थ-व्यवस्था को नियंत्रण-मुक्त करने का सुझाव दिया था। यह आम तौर पर माना जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री के पद के उम्मीदवार के तौर पर देखा था, लेकिन मैं यहां यह बताना चाहूंगा कि सोनिया गांधी ने ही उनका नाम सुझाया था और डॉ. मनमोहन सिंह को सरकार में वित्त विभाग के प्रबंधन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, क्योंकि उन्होंने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सरकारों के दौरान अलग-अलग वित्तीय और आर्थिक मामलों पर उनके काम को निकट से देखा था। आज देश-विदेश में उनके जन्मदिन पर लोग उन्हें स्नेह व सम्मान से याद कर रहे हैं।
-पूर्व राज्यसभा सांसद

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