इमरान की रिहाई के लिए पाक में सड़कों पर उतरे समर्थक

पाकिस्तान की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में पहुंच गई है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई की मांग को लेकर उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के समर्थकों ने खैबर पख्तूनख्वा से इस्लामाबाद की ओर लंबा मार्च शुरू कर दिया है। हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरकर अपने नेता की रिहाई की मांग कर रहे हैं। यह केवल किसी राजनीतिक नेता की जेल से मुक्ति का आंदोलन नहीं है, बल्कि इसके पीछे इमरान खान को फिर से सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने की समर्थकों की इच्छा भी साफ दिखाई दे रही है। पीटीआई के समर्थक अपने नेता को फिर राजगद्दी सौंपना चाहते हैं और इसी उद्देश्य से सरकार पर लगातार दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
लक्की मारवत से शुरू हुआ यह मार्च लगभग 275 किलोमीटर की दूरी तय कर इस्लामाबाद की ओर बढ़ रहा है। रास्ते में खैबर पख्तूनख्वा के अलग-अलग क्षेत्रों से समर्थकों के जुड़ने की योजना है। टैंक, डेरा इस्माइल खान, दक्षिण वजीरिस्तान, उत्तर वजीरिस्तान, बन्नू और लक्की मारवत के लोग मार्च में शामिल हुए हैं। इसके बाद करक, कोहाट और पेशावर होते हुए काफिले के आगे बढ़ने की योजना है। आने वाले दिनों में कोहाट, हंगू, कुर्रम, ओरकजई, पेशावर, चरसद्दा और मोहम्मद के समर्थकों के जुड़ने की बात कही गई है। इससे स्पष्ट है कि पीटीआई इस आंदोलन को सीमित प्रदर्शन न रखकर व्यापक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन में बदलना चाहती है।
मार्च के शुरुआती चरण में ही सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई। लक्की मारवत से कुछ किलोमीटर आगे फ्रंटियर फोर्स और इमरान समर्थक आमने-सामने आ गए। दोनों तरफ से पथराव हुआ और पुलिस ने लाठीचार्ज किया। करीब एक घंटे के बाद मार्च दोबारा आगे बढ़ा। इस घटना ने यह आशंका बढ़ा दी है कि यदि प्रदर्शनकारी बड़ी संख्या में इस्लामाबाद पहुंचते हैं तो स्थिति और तनावपूर्ण हो सकती है। केंद्र सरकार ने भी राजधानी की ओर जाने वाली सड़कों पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। संसद और प्रमुख मार्गों को कंटेनर लगाकर बंद किया गया है ताकि प्रदर्शनकारियों को राजधानी के संवेदनशील क्षेत्रों में प्रवेश करने से रोका जा सके।
पंजाब में भी पीटीआई कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर धरपकड़ की खबर सामने आई है। पार्टी का दावा है कि उसके करीब 2000 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। सरकार की ओर से प्रदर्शन को रोकने की कोशिश और पीटीआई की ओर से आंदोलन जारी रखने की जिद ने दोनों पक्षों के बीच टकराव बढ़ा दिया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के राजनीतिक सलाहकार राणा सनाउल्लाह ने स्पष्ट कहा कि प्रदर्शनकारियों को इस्लामाबाद में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। सरकार का रुख बताता है कि वह राजधानी में किसी बड़े राजनीतिक जमावड़े को लेकर बेहद सतर्क है।
इमरान खान की लोकप्रियता और उनकी राजनीतिक वापसी की संभावना ही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। इमरान लंबे समय से जेल में हैं और उन पर विभिन्न मामलों में कानूनी कार्रवाई चल रही है। तोशाखाना मामले में उन्हें सजा सुनाई जा चुकी है। उनकी पत्नी बुशरा बीबी भी जेल में हैं। इमरान के परिवार के सदस्यों और समर्थकों पर भी कार्रवाई होती रही है। ऐसे माहौल में पीटीआई कार्यकर्ताओं का सड़क पर उतरना बताता है कि पार्टी का जनाधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसके विपरीत समर्थक अपने नेता के पक्ष में लगातार राजनीतिक माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
इमरान की तबीयत और उनके इलाज का मुद्दा भी आंदोलन का प्रमुख कारण बना हुआ है। पीटीआई चाहती है कि इमरान से तत्काल मुलाकात की अनुमति दी जाए और उन्हें ऐसे अस्पताल में स्थानांतरित किया जाए, जहां उनके निजी चिकित्सक उनकी जांच और इलाज कर सकें। सरकार और पीटीआई के बीच इस मुद्दे पर बातचीत के दो दौर भी हो चुके हैं लेकिन कोई सहमति नहीं बन पाई। सरकार ने प्रदर्शन समाप्त करने की शर्त रखी, जबकि पीटीआई अपनी मांगों पर कायम रही। बातचीत विफल होने के बाद सड़क का रास्ता चुनना पाकिस्तान की राजनीति में तनाव को और बढ़ाने वाला कदम है।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की सेना की भूमिका को भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। इमरान खान के राजनीतिक भविष्य पर सेना का प्रभाव लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। रिपोर्टों के अनुसार पीटीआई सांसदों और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के बीच बैठक भी हुई है। हालांकि इसके फैसलों की जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई है। यदि आंदोलन व्यापक होता है और पंजाब तथा अन्य क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होते हैं तो शहबाज शरीफ सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।
पाकिस्तान की राजनीति में सत्ता परिवर्तन केवल चुनावी आंकड़ों से तय नहीं होता। वहां राजनीतिक दलों के साथ सेना का प्रभाव भी महत्वपूर्ण रहा है। यही कारण है कि इमरान खान की रिहाई की मांग के पीछे चल रहा आंदोलन केवल विपक्ष और सरकार की लड़ाई नहीं माना जा सकता। यह पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था के भीतर प्रभाव और जनसमर्थन के संघर्ष का भी प्रतीक बन गया है। यदि मार्च को व्यापक जनसमर्थन मिलता है तो सरकार के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक तरफ उसे कानून-व्यवस्था बनाए रखनी होगी और दूसरी तरफ इमरान समर्थकों के राजनीतिक दबाव का सामना करना होगा।
इमरान समर्थकों की सबसे बड़ी ताकत उनका यह विश्वास है कि उनके नेता को राजनीतिक रूप से खत्म नहीं किया जा सकता। वे इमरान को केवल पूर्व प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जिसे दोबारा सत्ता में आना चाहिए। यही भावना उन्हें सड़कों पर ला रही है। दूसरी ओर सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह आंदोलन को नियंत्रित करते हुए इसे ऐसा स्वरूप न लेने दे जिससे इमरान की लोकप्रियता और बढ़ जाए।
इस समय पाकिस्तान एक ऐसे राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है जहां जेल में बंद एक पूर्व प्रधानमंत्री की रिहाई की मांग राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था के लिए चुनौती बन गई है। हजारों समर्थकों का इस्लामाबाद की ओर बढ़ना बताता है कि इमरान खान का राजनीतिक अध्याय अभी समाप्त नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में यह आंदोलन कितना बड़ा रूप लेता है और सरकार इसे किस तरह संभालती है, यही तय करेगा कि पाकिस्तान की राजनीति किस दिशा में जाएगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पीटीआई अपने नेता को फिर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने की कोशिश में पीछे हटने के मूड में नहीं है।
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