चुनाव आयोग के विरुद्ध नहीं थम रही देशव्यापी विरोध की लहर

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी की और फटकार लगाते हुए कहा कि व्यवस्था को संवैधानिक कानूनों का पालन करना चाहिए न कि सॉफ्टवेयर तर्क का। न्यायाधीश वाल्मीकि मेंजीज़ और न्यायाधीश अमित जाम्संदेकर की खंडपीठ ने कहा कि एसआईआर प्रोटोकॉल स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं को स्थगित कर रहा है जैसे जनप्रतिनिधि कानून की धारा 22 को। ऐसा प्रतीत होता है कि सिस्टम ‘कानून का नहीं बल्कि सॉफ्टवेयर का पालन’ कराना चाहता है। इसलिए अदालत ने सवाल किया कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान ईसीआई का सॉफ्टवेयर स्वत: ही फॉर्म 8 की अज़र्ियों को क्यों ठुकरा रहा है, जिनका संबंध मतदाता का पता बदलने से है? अदालत ने कहा कि बिना उचित सुनवायी या कानूनी प्रक्रिया का पालन किये किसी का भी नाम मतदाता सूची से हटाया नहीं जा सकता। अदालत की यह टिप्पणी सांताक्रूज़ विधानसभा क्षेत्र से एक स्थानीय परिवार का नाम मतदाता सूची से हटाये जाने के संदर्भ में थी, जबकि उसने अपना पता बदलने के लिए फॉर्म 8 सही ढंग से भरा था। गौरतलब है कि एसआईआर के दौरान देशभर में 13 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूचियों से हटाये गये हैं, जिनमें सबसे ज्यादा (2 करोड़ से ज्यादा) नाम महाराष्ट्र में काटे गये हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट की मुख्य बेंच के समक्ष अनेक याचिकाएं एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने और महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटे जाने के सिलसिले में दायर की गई हैं। 
कर्नाटक के बेलगावी उत्तर, भालकी, बाबलेश्वर आदि क्षेत्रों में सैंकड़ों की संख्या में प्री-प्रिंटेड फॉर्म 7 दाखिल किये गये। मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट से हटवाने के लिए और बीएलए (बूथ लेवल एजेंट्स) पर दबाव बनाया गया कि वह इन फॉर्म पर हस्ताक्षर करें। फॉर्म 7 चुनाव आयोग का आधिकारिक डॉक्यूमेंट है मतदाता सूची से किसी का नाम हटवाने के लिए। इस पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार का कहना है कि पहले से भरे हुए और प्री-प्रिंटेड फॉर्म 7 थोक के भाव में जमा किये गये थे गलत तरह से मतदाताओं का नाम कटवाने के लिए, विशेषकर अल्पसंख्यकों, दलितों व पिछड़े समुदायों को निशाना बनाया गया था। इस विवाद पर ज़बरदस्त विरोध प्रदर्शन और पुलिस में रिपोर्ट के बाद मुख्य चुनाव अधिकारी ने राज्य की सभी 224 विधानसभा सीटों पर विस्तृत जांच के आदेश दिये हैं। 
चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया के दौरान फॉर्म 6 के साथ अतिरिक्त घोषणा पत्र या एनेक्सचर-डी को अनिवार्य कर दिया था, जबकि ऐसा संसद द्वारा संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता था। इस बात पर भी जब हंगामा हुआ, विशेषकर इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट के बाद, जिसमें चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर 14 प्रश्न उठाये गये थे, खासकर यह कि किस तरह मनमाने ढंग से मतदाता सूचियों में नाम घटाये या बढ़ाये जा रहे हैं और ईआरओ (इलेक्ट्रोलर रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) की भूमिका को नगण्य बना दिया गया है, तो फॉर्म 6 के मूल प्रारूप को ही बहाल कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट के कुछ आदेश भी चौंका देने वाले रहे। मसलन पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट से हटाये गये लगभग 27 लाख मतदाताओं के बारे में उसने कहा कि वे अगली बार मतदान कर सकते हैं। फिर उपचुनाव में 18,000 मतदाताओं के अधिकार के बार में भी उसने कहा कि ‘यह सिर्फ उपचुनाव ही तो है’ और इन वोटर्स को फिलहाल के लिए उनके संवैधानिक अधिकार के प्रयोग से रोक दिया गया। 
इस पृष्ठभूमि में विपक्षी दलों और नव गठित दबाव गुट कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को लगता है कि चुनाव आयोग, विशेषकर उसके प्रमुख ज्ञानेश कुमार, सत्तारूढ़ दल को चुनाव जिताने में सहयोग कर रहे हैं। इनका यह अंदाज़ा सही है या गलत है, यह एक अलग बहस है, लेकिन इसको बल मुख्यत: तीन बातों से मिल रहा है। एक, 2023 में विपक्ष के लगभग 150 सांसदों को संसद से बाहर निकालकर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में संशोधन किया गया कि यह नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता व एक काबिना मंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जायेगी। पहले इस उच्चस्तरीय चयन समिति में प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त काबिना मंत्री की जगह भारत के मुख्य न्यायाधीश थे। इससे हुआ यह कि सरकार अपनी पसंद का चुनाव आयुक्त नियुक्त कर लेगी। दूसरा यह कि चुनाव आयुक्त पर उसके गलत फैसलों के बावजूद आपराधिक या दीवानी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता यानी उसे कानूनी इम्यूनिटी प्रदान कर दी गई है, जिससे उसे मनमज़र्ी करने का अवसर मिल जाता है। तीसरा चुनाव आयोग में आईटी की महानिदेशक सीमा खन्ना, जिनके तहत ईसीआईनेट भी आता है, की भूमिका को लेकर भी ज़बरदस्त विवाद है। उनकी अनुमति के बिना ईआरओ भी किसी का नाम मतदाता सूची में पंजीकृत नहीं कर सकते, जबकि उनका काम ही यही है। 
इन सब बातों की वजह से विपक्षी दलों, सिविल सोसाइटी, सीजेपी आदि विभिन्न संगठनों ने गांधी जयंती पर विशेषरूप से दिल्ली के जंतर-मंतर पर मुंबई के शिवाजी पार्क में विरोध प्रदर्शन किया। इनकी मांगों में यह भी शामिल है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने पद से इस्तीफा दें, जिन 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम एसआईआर में हटाये गये हैं, उन्हें वापस वोटर लिस्ट में जोड़ा जाये, मतदान ईवीएम की जगह बैलट पेपर से कराया जाये, आदि। हालांकि जंतर-मंतर पर हज़ारों की तादाद में लोग पहुंचे, लेकिन भारी पुलिस बंदोबस्त की वजह से उन्हें विरोध प्रदर्शन नहीं करने दिया गया। पुलिस ने कहा कि प्रदर्शनकारियों के पास प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्हें हिरासत में लेकर बाद में छोड़ दिया गया। उधर मुंबई के शिवाजी पार्क में भी प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई थी, लेकिन जब बहुत बड़ी संख्या में सीजेपी के कार्यकर्ता शाम को वहां एकत्र हुए तो पुलिस ने बल प्रयोग न करना ही मुनासिब समझा। सीजेपी ने चुनाव सुधार के लिए अपना यह अभियान मुंबई से शुरू किया है, जिसका विस्तार हर गुजरते दिन के साथ पूरे देशभर में होता जा रहा है।     -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

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