‘सूचना का अधिकार’ के 21 वर्ष : उपलब्धियां और जोखिम
सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम को 12 अक्तूबर को 21 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसकी उपलब्धियों के साथ उन चुनौतियों पर भी चर्चा ज़रूरी है, जिनका सामना इस कानून का इस्तेमाल करने वाले नागरिकों को करना पड़ रहा है। 12 अक्तूबर, 2005 को लागू हुए इस कानून ने भारतीय लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की नई राह खोली। इसने आम नागरिकों को सरकारी कामकाज, सार्वजनिक धन के उपयोग और प्रशासनिक निर्णयों से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने का कानूनी अधिकार दिया। इसके माध्यम से देशभर में भ्रष्टाचार और सरकारी अनियमितताओं के अनेक मामले उजागर हुए हैं, लेकिन इस कानून की सफलता के बीच एक गंभीर सवाल आज भी कायम है कि आखिर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने और जानकारी मांगने वाले नागरिकों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? आरटीआई अधिनियम आम नागरिकों के हाथ में ऐसा औज़ार है जिसके माध्यम से वह सरकारी व्यवस्था से सवाल पूछ सकता है और सार्वजनिक धन के उपयोग का हिसाब मांग सकता है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस कानून के जरिए गरीबों, वंचितों और ज़रूरतमंदों को उनके अधिकार दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सरकारी योजनाओं में गड़बड़ी, विकास कार्यों में अनियमितता और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग जैसे मामलों को उजागर करने में आरटीआई की प्रभावी भूमिका रही है। हालांकि इस प्रक्रिया में कई कार्यकर्ताओं को धमकियों, उत्पीड़न और हिंसा का सामना भी करना पड़ा है। कुछ मामलों में उनकी हत्या तक कर दी गई। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया की स्टेट ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट 2021 सहित विभिन्न रिपोर्टों में आरटीआई आवेदकों पर हमलों और उनकी हत्याओं को लेकर गंभीर चिंता जताई गई थी। ऐसे मामले बताते हैं कि सूचना मांगने का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब उसका इस्तेमाल करने वाले नागरिक भयमुक्त होकर अपना काम कर सकेंगे।
आरटीआई कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमले केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ हिंसा नहीं हैं, बल्कि इनका असर लोकतांत्रिक व्यवस्था और नागरिकों की भागीदारी पर भी पड़ता है। जब कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार या प्रशासनिक अनियमितता को उजागर करने के कारण धमकियों का सामना करता है, तो इसका संदेश दूसरे नागरिकों तक भी पहुंचता है। ऐसे में कई लोग संभावित खतरे के कारण सूचना मांगने से पीछे हट सकते हैं। यह स्थिति पारदर्शिता और जवाबदेही की भावना को कमज़ोर करती है। लोकतंत्र में सरकार और प्रशासन से सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार है। इस अधिकार का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को प्रताड़ना या हिंसा का सामना करना पड़े, तो यह व्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न खड़े करता है। इसलिए आरटीआई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानने के बजाय लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए।
आरटीआई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सूचना के सार्वजनिक प्रसार को भी प्रभावी बनाया जा सकता है। सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4 सार्वजनिक प्राधिकरणों को विभिन्न जानकारियों का स्वप्रेरणा से खुलासा करने के लिए बाध्य करती है। यदि सरकारी विभाग अपने कामकाज, बजट, योजनाओं, निर्णयों और विकास कार्यों से संबंधित सूचना नियमित रूप से सार्वजनिक करें, तो नागरिकों को छोटी-छोटी जानकारियों के लिए भी आवेदन करने की आवश्यकता कम होगी। इसके अतिरिक्त, यदि कोई आरटीआई कार्यकर्ता सार्वजनिक हित से जुड़ी जानकारी मांगने के बाद धमकी या हमले का शिकार होता है, तो कानून के दायरे में संबंधित सूचना को सार्वजनिक करने की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है। इससे सूचना को दबाने की कोशिशों को निष्प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी। हालांकि ऐसी व्यवस्था में व्यक्तिगत गोपनीयता और कानूनी प्रतिबंधों का ध्यान रखना भी जरूरी है।
भ्रष्टाचार उजागर करने वाले लोगों को संरक्षण देने के लिए भारत में व्हिसलब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट-2014 बनाया गया था, लेकिन सूचना मांगने वाले नागरिकों और भ्रष्टाचार के मामलों का खुलासा करने वाले लोगों को प्रभावी सुरक्षा उपलब्ध कराने की चुनौती अब भी महत्वपूर्ण है। ज़रूरत है कि ऐसे मामलों में शिकायत दर्ज करने, खतरे का आकलन करने और आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराने की स्पष्ट व्यवस्था विकसित की जाए। सूचना का अधिकार अधिनियम के दो दशक पूरे होना इसकी उपलब्धियों पर गर्व करने के साथ-साथ इसकी चुनौतियों पर गंभीरता से विचार करने का अवसर है। सरकार, प्रशासन, सूचना आयोग और नागरिक समाज को मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिसमें कोई भी नागरिक सार्वजनिक हित से जुड़े सवाल पूछने में भय महसूस न करे। आखिरकार, सूचना का अधिकार केवल सरकारी दस्तावेज हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र को जवाबदेह बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन है। इस कानून की वास्तविक सफलता तभी सुनिश्चित होगी, जब सूचना मांगने वाले नागरिक को जवाब के साथ सुरक्षा भी मिले और सच उजागर करने की कीमत किसी को अपनी जान देकर न चुकानी पड़े। (एजेंसी)



