पुलिस को पीड़ित पक्ष के रूप में पेश करना उचित नहीं
दिल्ली में 6 और 7 अक्तूबर के कांग्रेस के प्रदर्शन और राहुल व प्रियंका को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं के बाद कुछ वीडियो वायरल हुए, जिनमें दिखाया गया कि कैसे प्रियंका गांधी वाड्रा महिला पुलिसकर्मी को कोहनी मार रही है। दिल्ली पुलिस ने रील्स और वीडियो जारी कर दिए, जिनमें पुलिस को पीड़ित की तरह दिखाते हुए संदेश दिया गया कि पुलिस वाले भी इंसान हैं और उनके साथ भी दुर्व्यवहार नहीं होनी चाहिए। इससे पहले कॉकरोच जनता पार्टी के 20 जुलाई के प्रदर्शन के बाद भी एक प्रैस कॉन्फ्रैंस कराई गई थी, जिसमें पुलिसकर्मियों और उनके परिवार के लोगों का दर्द सुनाया गया था। कांग्रेस के प्रदर्शन के बाद जब पुलिस को पीड़ित बनाने वाले वीडियो वायरल हुए तो कई लोगों ने कहा कि दिल्ली पुलिस का भी विलय भाजपा में कर देना चाहिए और दिल्ली पुलिस को भाजपा का सुरक्षा प्रकोष्ठ बना दिया जाए। इससे पहले कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि पुलिस या अर्धसैनिक बल को पीड़ित की तरह पेश किया गया हो। क्योंकि ऐसा करने से सुरक्षा बलों के मनोबल पर असर होता और उनका इकबाल कम होता है। केन्द्र सरकार पुलिस को भी पीड़ित बताने लगी है। भले पुलिस को पीड़ित बनाने के पीछे विपक्ष के नेताओं की छवि खराब करने और उनके ऊपर किसी बर्बर कार्रवाई की आधारभूमि तैयार करने की रणनीति हो, लेकिन यह पुलिस की विश्वसनीयता व साख पर विपरीत प्रभाव डाल रही है।
देश के व्यापारी परेशान
देश के कई हिस्सों में बीती दो अक्तूबर को एक अलग किस्म का प्रदर्शन हुआ। एक तरफ मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ राजनीतिक पार्टियों का प्रदर्शन चल रहा था तो दूसरी ओर देश के व्यापारियों ने अलग प्रदर्शन किया। उन्होंने ‘नो यूपीआई डे’ मनाया। दुकान पर लगे स्कैनर को काले कपड़े से ढक दिया और सिर्फ नकद में कारोबार किया। व्यापारी यूपीआई ट्रांजेक्शन पर शुल्क लगाने का विरोध कर रहे थे। अब व्यापारियों को अलग किस्म की चिंता परेशान कर रही है। उनको लग रहा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई बढ़ सकती है। व्यापारी इस बात से परेशान हैं कि त्योहारों के सीज़न में खरीद बढ़ेगी तो बड़ी संख्या में लोग नकद खरीद करेंगे। इसका कारण यह है कि दो हज़ार रुपये से ज्यादा की खरीद पर शुल्क लगना है। शुल्क ग्राहक से नहीं लेना है। इसलिए व्यापारियों की समस्या है कि अगर यूपीआई से खरीद हुई तो पैसे देने होंगे और अगर नकद व्यापार हुआ तो फिर से वैट के ज़माने की तरह छापे और जांच की प्रक्रिया बढ़ जाएगी। दोनों स्थितियों में व्यापारियों को नुकसान होना है। हालांकि इस बीच 7 अक्तूबर को जीएसटी काउंसिल में एक बड़ा फैसला हुआ है, जिसमें जीएसटी कानून से गिरफ्तारी के प्रावधान को हटाने की सिफारिश की गई है। इससे व्यापारियों को बड़ी राहत मिलेगी।
राहुल गांधी का ‘सत्याग्रह’
देश भर में अपने हक के लिए लड़ रहे लोगों के संघर्षों को एक मंच पर लाने की राहुल गांधी की पहल सराहनीय है। इसके लिए उन्होंने ‘सत्याग्रह’ नाम से एक वेबसाइट लॉन्च की है, और कहा है, ‘आपकी कहानी नक्शे पर आएगी। आप देखेंगे कि आपकी तरह और कौन-कौन लड़ रहा है। और मैं जो कर सकता हूं, करुंगा—संसद में, सड़क पर, खत लिखकर, जहां भी मेरी ज़रूरत होगी, वहां आपके साथ खड़े होकर। नेता विपक्ष के रूप में यह मेरी ज़िम्मेदारी है।’ इस नई भूमिका से राहुल गांधी ने नेता विपक्ष के कर्त्तव्य दायरे का विस्तार किया है। पिछले तीन दिन के अंदर 30 हज़ार से ज्यादा ऐसी कहानियां वेबसाइट पर दर्ज कराई गईं। सामान्यत: सत्ताधारी दलों की कोशिश ऐसी कहानियों की अनदेखी करना होती है। वर्तमान सत्ताधारी दल को तो ऐसा करने में अपनी खास महारत है। जन-संघर्षों की कहानियों को चर्चा के केंद्र में लाने की नेता विपक्ष की कोशिश महत्वपूर्ण मालूम पड़ती है, लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक पक्ष है। दूसरा पहलू समाधान की नीतियों से जुड़ा है। ‘सत्याग्रह’ पर सबसे ज्यादा शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातिगत भेदभाव और स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव से संबंधित मामले दर्ज कराए गए है। सवाल है कि क्या राहुल गांधी या उनकी पार्टी के पास इन समस्याओं का नीतिगत समाधान है?
20 साल पुराना मामला खोला
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में व्यापक गड़बड़ी के आरोपों को लेकर मुश्किल में फंसे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं। एक ओर जहां विपक्षी दलों और छात्र-नौजवानों ने उनके इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन छेड रखा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक नया मोर्चा खोल दिया है। हालांकि किसी ने उनका नाम नहीं लिया है लेकिन ऐसा लग रहा है कि निशाने पर ज्ञानेश कुमार ही है। केरल की कांग्रेस सरकार ने 2006 के ज्ञानेश कुमार से जुड़े एक मामले को खोलते हुए विजिलेंस जांच के आदेश दिए हैं। मामला सड़क निर्माण से जुड़ा है। असल में भारत और मलेशिया की सरकार मिल कर एक सड़क बना रही थी, जो पीडब्ल्यूडी की सड़क थी। इस मामले से जुड़े मलेशिया के एक इंजीनियर ने आत्म-हत्या कर ली थी। उस समय केरल सरकार के पीडब्ल्यूडी सचिव ज्ञानेश कुमार थे। आत्म-हत्या करने वाले मलेशियाई इंजीनियर ने आरोप लगाया था कि सरकारी अधिकारी रिश्वत मांग रहे थे और रिश्वत नहीं देने पर काम में अड़ंगा लगा रहे थे। उस समय मामले को दबा दिया गया था। अब राज्य सरकार ने इस मामले की जांच विजिलेंस को सौंप दी है। 20 साल बाद पता नहीं क्या सबूत मिलेंगे और क्या जांच होगी, लेकिन इससे एक और मामला ज्ञानेश कुमार पर केन्द्रित हो गया है।
कोई अल्पसंख्यक मंत्री नहीं रहेगा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के इकलौते सिख मंत्री हरदीप सिंह पुरी की सरकार से छुट्टी हो रही है। उनका राज्यसभा का कार्यकाल अगले महीने 25 नवम्बर को खत्म हो रहा है। वह उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के सदस्य हैं, लेकिन भाजपा ने इस बार उन्हें राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनाया है। हालांकि वह 25 नवम्बर के बाद भी छह महीने तक मंत्री बने रह सकते हैं, लेकिन उसके बाद उन्हें इस्तीफा देना होगा। उनसे पहले रवनीत सिंह बिट्टू भी एक सिख मंत्री थे, लेकिन उन्हें भी राज्यसभा का दूसरा कार्यकाल नहीं मिला। इस साल अप्रैल में राज्यसभा के दोवार्षिक चुनाव हुए थे तो जॉर्ज कुरियन की राज्यसभा रिन्यू नहीं हुई थी और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। वह मोदी सरकार के इकलौते ईसाई मंत्री थे। जहां तक मुस्लिम मंत्रियों की बात है तो पिछली सरकार में ही इकलौते मुस्लिम मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी की छुट्टी हो गई थी। इसलिए अगर हरदीप पुरी के इस्तीफे के समय तक कोई सिख मंत्री नहीं बनता है तो मोदी सरकार में देश के तीन सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूहों मुस्लिम, ईसाई और सिख का कोई मंत्री नहीं रहेगा।





