पंजाब को नशा मुक्त कैसे बनाया जाए ?

तुमने जिस खून को म़कतल में दबाना चाहा,
आज वह कूचा-ओ-बाज़ार में आ निकला है।
कहीं शोला, कहीं नाअरा, कहीं पत्थर बन कर,
खून चलता है तो रुकता नहीं संगीनों से।
साहिर लुधियानवी की नज़्म का यह हिस्सा कत्ल किए गए परविन्दर सिंह झोटा को समर्पित कर रहा हूं। इस हत्या की कहानी तो सभी पाठकों को पता ही होगी। इसलिए यहां दोहराने का कोई अर्थ नहीं है, परन्तु इस हत्या ने जो सवाल खड़े किए हैं, उनका ज़िक्र करना बहुत ज़रूरी है। नि:संदेह यह सवाल भी गम्भीर है कि हत्यारे ने हत्या करने से पहले किसे फोन किया? क्या उसे किसी ने शह दी? हत्यारे के खिलाफ मामला दर्ज होने के बावजूद उसका असला लाइसैंस कैसे बना? ये स्थानीय और सिर्फ एक हत्या से संबंधित सवाल हैं। अधिक बड़ा सवाल है कि क्या पंजाब में नशे के खिलाफ लड़ाई वास्तव में हो भी रही है या यह सिर्फ राजनीतिक नारा ही है? पहले कैप्टन अमरेन्द्र सिंह शपथ लेकर नशा खत्म करने के नाम पर सत्ता में आए। फिर आम आदमी पार्टी ने यह नारा लगाया और अब भाजपा भी यही नारा लगा कर सत्ता में आने की इच्छुक दिखाई दे रही है। सवाल यह भी पैदा होता है कि क्या पंजाब के युवाओं को नशे से बचाने वाली ताकतें खत्म हो रही हैं? हां, यदि कोई नशे का विरोध करने वाले की इस तरह लाइव चलती वीडियो के बावजूद हत्या कर सकता है तो स्वाभाविक है कि समाज में नशा तस्करों एवं विक्रेताओं का भय बढ़ेगा। मैडीकल स्टोरों पर नशीली दवाओं की बिक्री एक ‘ओपन सीक्रेट’ है, परन्तु इसे रोकने वाली मशीनरी शायद इसके मुनाफे की हिस्सेदार बन चुकी है या यह ढांचा पूरी तरह विफल हो गया है। यह सवाल भी छोटा नहीं कि पंजाब में कानून का शासन है या नहीं। भीड़ स्वयं सज़ा देने लग पड़ती है। सरकार बुलडोज़र तथा पुलिस राज को उत्साहित करती है। न्याय करने का सिस्टम बड़ी सीमा तक विफल दिखाई देता है। वास्तव में नशा चाहे वह दवाओं, चिट्टे, शराब या अफीम का नशा है, राजनीति का हथियार बना दिखाई देता है। प्रत्येक राजनीतिक दल इसके खिलाफ बातें का करता है, परन्तु इस नैटवर्क को खत्म करने की बजाय इसमें से हिस्सा व राजनीतिक लाभ लेने का खेल ज़्यादा खेला जाता है।
जब कोई सरेआम नशा बेचने का दुसाहस करता है तो उसमें यह हिम्मत इसलिए भी आती है कि उसके पीछे बचाने वाले कई ताकतवर हाथ होते हैं। यदि झोटा की हत्या के बाद सिर्फ अश्विनी के खिलाफ कार्रवाई करके मामला खत्म हो जाता है तो पुलिस, प्रशासन, राजनीतिज्ञ तथा नशा तस्करों का गठजोड़ चलता रहेगा। वैसे यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि अश्विनी की दुकान जलाने के पीछे जन-आक्रेश ही है या वहां मौजूद सबूतों को खत्म करने का एक यत्न है?
कत्ल-ए-जीसत तो कर दिया पर मेरी सोचों का क्या
मेरी सोचें तो अब हर ज़ुबां पे तारी हैं।
—लाल फिरोज़पुरी
पुलिस, नेताओं तथा तस्करों का गठजोड़ कैसे टूटे?
पुलिस, अफसरशाही, तस्करों तथा नेताओं का गठजोड़ चाहे एक दिन में नहीं बना। इसे दशक लगे होंगे, परन्तु इसे खत्म करने के लिए दशकों की नहीं, मात्र कुछ महीनों की ही ज़रूरत है, बशर्ते सरकार की इच्छा-शक्ति तथा ईमानदारी हो। कुछ सुझाव पेश हैं। 
एक स्वंतत्र और शक्तिशाली जांच एजेंसी की ज़रूरत है जो पुलिस के प्रभाव में न हो। इसमें जांचे-परखे ईमानदार अधिकारी शामिल हों। यह पंजाब की अपनी ‘एंटी नार्कोटिक्स एवं भ्रष्टाचार जांच ब्यूरो’ हो सकती है, जो प्रत्यक्ष रूप में हाईकोर्ट की देखरेख में काम करे, जबकि यह केन्द्रीय एजेंसियों ई.डी. तथा आई.एन.ए. आदि से प्रत्यक्ष रूप में जानकारी देने-लेने के भी समर्थ हो ताकि पैसे के लेन-देन पर भी नज़र रख सके, विशेषकर जहां बड़ी राशि का लेन-देन होता है, वहीं बड़े भ्रष्टाचार की भी सम्भावना होती है। इस नार्कोटिक्स ब्यूरो में बहुत लम्बे समय तक अधिकारी नियुक्त न रहें, अपितु तबादले होते रहें ताकि वे नशा तस्कारों के साथ पक्के संबंध न बना सकें। नेताओं एवं उम्मीदवारों के चुनाव खर्चे पर नज़र रखी जाए कि वास्तव में इतना पैसा कहां से आया? प्रत्येक सरकारी अधिकारी की सम्पत्ति तथा बैंक खातों पर नज़र रखना सुनिश्चित बनाया जाए और प्रत्येक जायदाद की तबदीली की जांच ज़रूरी हो कि पैसा किसका है, कहां से आया है ताकि बेनामी सम्पत्ति पर रोक लगे। यदि कोई अधिकारी या नेता नशा माफिया से जुड़ा पाया जाता है तो तबादला कोई सज़ा नहीं है। उसकी नौकरी के बाद बनी सम्पत्ति की ज़ब्ती तथा नौकरी से छुट्टी ही सज़ा हो। 
नशा विरोधी कार्यकर्ताओं, लोगों तथा ह्विसल ब्लोअरों की पहुंच बड़े अधिकारियों तक आसान बनाई जाए। यदि कोई कार्यकर्ता इस प्रकार मारा जाता है तो उसकी जांच केन्द्रीय जांच एजेंसी से करवाना आवश्यक बना दिया जाए। जब भी नशे की कोई बड़ी खेप पकड़ी जाए तो उसके राजनीतिक तथा अधिकारियों से संबंध की जांच करना ज़रूरी हो। यदि कोई राजनीतिक नेता या अधिकारी उसमें पकड़ा जाता है तो पार्टी भी उसे निकालने की ओर ध्यान दे तथा कानूनी कार्रवाई भी ज़रूर हो। सबसे ज़रूरी बात यह कि नशे के प्रत्येक व्यापारिक मात्रा के मामले की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक अदालतें हों और हर मामले का पुलिस फैसला 3 महीने में तथा मामले की रिपोर्ट दाखिल करने का समय एक महीने से अधिक न हो। इसके साथ ही किसी पर किसी साज़िश के तहत नशे का मामला डालने वाले अधिकारी के खिलाफ सज़ा का बड़ा प्रावधान भी हो। नशा खत्म करने के लिए समाज, मीडिया तथा सिविल सोसाइटी की भूमिका को भी महत्व दिया जाए। 
तोड़ना लाज़िम है ये एतहाद-ए-यम मगर,
रहनुमा अपना कोई भी पारसा दिखता नहीं।
बंदी सिंहों का मामला
अभी पिछले सप्ताह ही इसी कालम में लिखा गया था कि बंदी सिंहों की रिहाई के लिए बने कौमी इन्साफ मोर्चा के वकील जसपाल सिंह मंझपुर ने जो बयान दिया था कि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा है कि वह किसी बंदी सिंह की रिहाई या पैरोल देने के मामले पर केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बात करेंगे। मैंने लिखा था कि इस घटनाक्रम की मुझे कुछ समझ नहीं आई, परन्तु अब 13 अक्तूबर, 2026 को सुप्रीम कोर्ट में बेअंत सिंह हत्या के मामले तिहाड़ जेल में बंद भाई जगतार सिंह हवारा को पंजाब की किसी उच्च सुरक्षित जेल में तबदील करने की याचिका संबंधी आए समाचार ने बड़ी हद तक यह स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में केन्द्र सरकार, दिल्ली सरकार तथा पंजाब सरकार तीनों एक ही कतार में खड़ी हैं, क्योंकि पहले पंजाब सरकार ने भाई हवारा को 10 दिन की पैरोल देने के लिए पंजाब के राज्यपाल को पत्र लिखा था और कहा था कि राज्य कानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी लेगा, परन्तु अब भाई हवारा को पंजाब तबदील करने का विरोध पंजाब सहित तीनों सरकारों ने ही किया है। पंजाब सरकार ने कहा है कि इससे शांति, साझीवालता तथा कानून व्यवस्था प्रभावित हो सकती है, जिस कारण सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ ने आई.बी. से रिपोर्ट मांगी है। भाई हवारा के वकील का स्टैंड है कि भाई हवारा का व्यवहार अच्छा है और उसे पंजाब की जेल में तबदील किया जाना चाहिए।
गुनहगारों में शामिल मुद्दई भी और मुलज़िम भी,
तेरा इन्साफ देखा और अदालत छोड़ दी हमने।
—शहज़ाद अहमद

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