तहसील गढ़शंकर का वारा पहरा
मेरा पैतृक गांव सोनी है। यह गढ़शंकर तहसील के माहिलपुर थाने में आता है। मैं ज़िला लुधियाना की तहसील समराला के गांव कोटला बडला में जन्मा हूं। अपने ननिहाल में, लेकिन मैं गढ़शंकर को कभी नहीं भूल सकता। देश विभाजन से पहले की कुश्तियों सहित। विभाजन से पहले गढ़शंकर इलाके के रहमा, फज़ला और दौला नामक पहलवान थे। विभाजन के बाद प्यारा सिंह कुलपुर, जोगिंदर सिंह पैंसरा, गागो गांव कुनैल का 1975 से 1985 तक गढ़शंकर और आस-पास के इलाकों में पूरा दबदबा था। प्यारा सिंह का गांव कुलपुर पहले तहसील गढ़शंकर में था, अब बलाचौर तहसील में है। प्यारा सिंह कुलपुर अपने समय के बहुत प्रसिद्ध पहलवान थे। आजकल गांव वाले अपने स्तर पर छिंज करवाते हैं, जिसमें युवा बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं।
गढ़शंकर पंजाब के ज़िला होशियारपुर की एक ऐतिहासिक तहसील (सब-डिवीज़न) और एक बड़ा विधानसभा क्षेत्र है। यह दोआबा क्षेत्र का हिस्सा है और शिवालिक पहाड़ियों की गोद में स्थित है। माना जाता है कि इस शहर की स्थापना 1000 ईस्वी में डोड राजपूत राजा शंकर सहाय द्वारा की गई थी। उनके किले (गढ़) तथा नाम से ही इसका नाम ‘गढ़शंकर’ पड़ा। ब्रिटिश काल में 1844 में इसे तहसील बनाया गया था।
इस इलाके का देश का स्वतंत्रता संग्राम में बड़ा योगदान रहा है। 1920 के दशक की ‘बब्बर अकाली मूवमेंट’ के दौरान इस धरती के योद्धाओं ने अग्रिम भूमिका निभाई। यहां का मुख्य कॉलेज भी इन शहीदों की याद में ‘बब्बर अकाली मेमोरियल खालसा कॉलेज’ के रूप में स्थापित है। गढ़शंकर होशियारपुर, नवांशहर (शहीद भगत सिंह नगर) और रूपनगर (रोपड़) को जोड़ने वाला एक अहम जंक्शन है। हिमाचल प्रदेश (ऊना और श्री आनंदपुर साहिब रोड) का रास्ता भी यहां से बहुत निकट है।
इस क्षेत्र का कुछ हिस्सा उपजाऊ मैदानी है जबकि पहाड़ियों से सटा इलाका ‘कंडी क्षेत्र’ कहलाता है, जो मक्का, गेहूं और बागवानी के लिए प्रसिद्ध है। गढ़शंकर क्षेत्र पर कभी भी किसी एक पार्टी का स्थायी कब्ज़ा नहीं रहा, यहां हमेशा बहु-कोणीय और रोमांचक मुकाबला होता आया है। दशकों तक यहां शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों (खासकर सीपीआई-एम) के बीच मुकाबला रहा है। कॉमरेड दर्शन सिंह कैनेडियन जैसे दिग्गज नेता यहां से विधायक रहे, जिसकी वजह से इस क्षेत्र में किसानों और वामपंथी विचारधारा का लंबे समय तक प्रभाव रहा।
बाद में शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस बारी-बारी से यहां से जीतते रहे। 2017 के बाद आम आदमी पार्टी (आप) ने यहां मज़बूत पकड़ बनाई।
जय कृष्ण सिंह रोड़ी यहां से ‘आप’ की टिकट पर लगातार दो बार (2017 और 2022) विधायक चुने गए, लेकिन यह बिल्कुल सबब की बात है। आगामी चुनावों में देखो कांग्रेस पार्टी बाज़ी मारती है, बहुजन समाज पार्टी या अकाली यह वक्त ही बताएगा। यह बात तो सभी मानते हैं कि ‘आप’ के खिलाफ इस बार सत्ता विरोधी रुझान भी उत्पन्न हो चुका है, चाहे कि सत्तारूढ़ पार्टी अलग-अलगी योजनाओं से मतदाताओं को प्रभावित करने हेतु यत्नशील है ।
यहां के प्रिंसिपल हरभजन सिंह का लम्बा कद कोई नहीं भूला। स्वतंत्र भारत के कैबिनेट मंत्री सरदार बलदेव सिंह उनके इतने मेधावी विद्यार्थी थे, जिनकी गूंज इस पंजाब में ही नहीं, बल्कि उस तरफ भी थी, खासकर खेल के मैदान में। जिन दिनों मैं वहां के हाई स्कूल का विद्यार्थी था, मैं वहां की रस्सा-कशी टीम को एक हाथ छोड़ कर एक हाथ से रस्सा खींचते हुए देखता रहा हूं।
मैं इस कॉलेज से ग्रेजुएशन की परीक्षा देकर 1953 के परिणाम का इंतज़ार किए बिना अपनी रोज़ी-रोटी की तलाश में दिल्ली की ओर चल पड़ा था। वैसे तो उस कॉलेज से मेरा अभी भी साझ है, खासकर प्रिंसिपल परविंदर सिंह के साथ। एक बात कभी नहीं भूलेगी कि 1953 की कॉन्वोकेशन के मुख्य मेहमान पंजाब के मुख्यमंत्री स. प्रताप सिंह कैरों थे और यह बात मैं गर्व से बताता था कि मैंने सरदार कैरों के हाथ से डिग्री प्राप्त की थी। उस मुख्यमंत्री के हाथ से जो अपनी कार के ड्राइवर को ट्रक चालक से सतर्क करने के लिए कहते थे, ‘इसके निकट से ध्यान से निकालना, आगे प्रतापा जट्ट आ रहा है। है कि नहीं माहिलपुर और गढ़शंकर के साथ मिलाप!
एक शेर कद्द लतीफा
वैसे तो जंगल और जंगल के बाहर हर कोई शेर को जंगल का राजा मानता है, लेकिन एक दिन उसके मन में आया कि स्वयं ही अपनी परीक्षा ले। वह अपने ठिकाने से निकला, तो उसके सामने एक गीदड़ आ गया। उसे देखते ही शेर ने पूछा, ‘जंगल का राजा कौन है?’ गीदड़ के मुंह से ‘हज़ूर आप’ सुन कर शेर के पांव ज़मीन पर नहीं लगे। उसने पूरे जंगल का दौरा लगाया। खच्चर, गधे, घोड़े सभी ने उसे ‘हज़ुरी’, ‘जनाब’ ‘नाम-ए-इकबाल’ कह कर मिले। शेर फूले नहीं समा रहा था कि उसके सामने जंगल का हाथी आ गया।
शेर ने हाथी से भी यही सवाल कियी। हाथी ने कोई जवाब नहीं दिया। दूसरी बार भी हाथी बिना हिले-जुले खड़ा रहा। तीसरी बार पूछने पर हाथी ने शेर को अपनी सूंड में लपेट कर ज़मीन पर पटक दिया।
शेर ने थोड़ी दूरी पर खड़ा होकर हाथी से पूछा, ‘अरे भले लोग! अगर सवाल का जवाब नहीं आता हो तो इतना गुस्सा नहीं करना चाहिए।’
अंतिका
(फिराक गोरखपुरी)
आने वाली नस्लें तुम पर
़फ़ख्र करेंगी हम-असरो
जब भी उन को ध्यान आएगा
तुम ने ‘़िफराक’ को देखा।

