फारूक अब्दुल्ला का बड़बोलापन
फारूक अब्दुल्ला अक्सर अपने बड़बोलेपन के लिए जाने जाते हैं। उनके संबंध में यह आशंका अक्सर बनी रहती है कि पता नहीं वह किस वक्त किस तरह का और किस महत्व का बयान दे दें। वह समय और स्थान के अनुसार अपना बयान बदलते रहते हैं। एक तरफ वह जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग समझते हैं और इसी को आधार बना कर वह प्रदेश की सत्ता का आनंद भी मानते रहे हैं। देश की अन्य पार्टियों के साथ मिलकर यहां की राजनीतिक सक्रियता का भी हिस्सा बने रहे हैं। वह नैशनल कान्फ्रैंस के अध्यक्ष हैं। उनकी पार्टी की ओर से उनके बेटे उमर अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के चुने हुए मुख्यमंत्री हैं। कांग्रेस के साथ उनकी पार्टी की भागीदारी है। फारूक अब्दुल्ला को इस बात का शिकवा हो सकता है कि केन्द्र में भाजपा के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को खत्म करके जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को दो केन्द्र शासित प्रदेशों में बदल दिया था, परन्तु इस स्थिति के होते हुए भी नैशनल कान्फ्रैंस ने कांग्रेस, भाजपा और अन्य पार्टियों सहित यहां के विधानसभा चुनाव लड़े थे और वहां उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार बनी थी।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला देश के प्रत्येक मंच से जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग उठा रहे हैं। अन्य पार्टियां भी नैशनल कान्फ्रैंस के साथ इस मामले पर पूरी सहमत हैं। प्रदेश के चुनावों के दौरान भाजपा नेताओं ने भी बार-बार यह घोषणा की थी कि वे शीघ्र ही जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की घोषणा करवाएंगे, जो अभी तक सम्भव नहीं हो सका। उमर अब्दुल्ला की ओर से इसके विरोध में उठाई आवाज़ की समझ तो आती है परन्तु फारूक अब्दुल्ला अनेक बार अपने बड़बोलेपन से स्थिति को और बिगाड़ने और जटिल बनाने में ही सहायक होते रहे हैं। इसी संबंध में विगत दिवस उन्होंने जो बयान दिया है, उसकी देश भर में कड़ी आलोचना हुई है और अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उससे गलत संदेश भी गया है। विगत दिवस बारामूल्ला में बोलते हुए उन्होंने कहा कि, ‘पूरी दुनिया में हमारा पड़ोसी (पाकिस्तान) पीछे लगा हुआ है। वह पड़ोसी जगह-जगह पर जाकर कश्मीर और कश्मीरियों के संबंध में बातें कर रहा है। इसी कारण कश्मीर के लोगों की जान बच रही है, नहीं तो कश्मीरियों को लेकर भारत की सोच सही नहीं है। केन्द्र सरकार जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर इसलिए चुप है, क्योंकि उस पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव है।’ फारूक के इस बयान को ज्यादातर पार्टियों की ओर से खुला विद्रोह कहा जा रहा है।
यहां तक कि उसकी नैशनल कान्फ्रैंस की सहयोगी पार्टी कांग्रेस ने भी फारूक के इस बयान से दूरी बना ली है। कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान को हमारे आंतरिक मामलों संबंधी बात करने या उसमें हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं, क्योंकि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न भाग है। कश्मीरी पंडितों के संगठनों ‘पनून कश्मीर’ और ‘जम्मू स्टेट पीपल्ज़ मूवमैंट’ ने भी फारूक अब्दुल्ला के विरुद्ध पुलिस थाने में शिकायकत दर्ज करवाई है और उनके बयान को जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति और धर्म के आधार पर लोगों में दरार डालने वाला करार देकर इसकी पुलिस जांच करने की मांग की है। ऐसी बयानबाज़ी के कारण फारूक अब्दुल्ला ने एक बार फिर न सिर्फ अपनी सहयोगी पार्टियों को ही अपने से अलग कर लिया है, अपितु नैशनल कान्फ्रैंस के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की स्थिति को भी और नाज़ुक बना दिया है, और स्वयं भी अपनी स्थिति हास्यस्पद बना ली है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

