आधुनिक चमक-दमक के बीच गुम हो रहे मिट्टी के दीये
कभी दिवाली मिट्टी के दीयों की सौंधी महक, घर में बनते पकवानों की मिठास, आंगन में उकेरे जाते मांडणों, रिश्तों के अपनत्व और लोक परंपराओं की जीवंतता का पर्व हुआ करती थी। त्योहार आने से कई दिन पहले ही घरों में तैयारियां शुरू हो जाती थीं। बच्चों के चेहरों पर उत्साह होता था, महिलाओं के हाथों में काम की व्यस्तता और बुजुर्गों के पास परंपराओं से जुड़ी अनगिनत स्मृतियां होती थीं। समय बदला, जीवनशैली बदली और दिवाली मनाने के तौर-तरीके भी बदल गए। आज बिजली की रंग-बिरंगी लड़ियां, आकर्षक सजावट, महंगे उपहार, मिठाइयों के सुंदर डिब्बे, पटाखों का शोर और इंटरनेट पर शुभकामनाओं की भरमार इस पर्व का हिस्सा बन चुके हैं। आधुनिकता ने त्योहार को नया स्वरूप तो दिया है, लेकिन इस चमक-दमक के बीच एक सवाल भी उठता है कि क्या हमने दिवाली की मूल आत्मा को कहीं पीछे छोड़ दिया है? दिवाली केवल अमावस्या की रात को रोशन करने का पर्व नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और दूरियों पर अपनत्व की विजय का प्रतीक है।
दिवाली की सबसे सुंदर और विशिष्ट पहचान मिट्टी के दीये हुआ करते थे। त्योहार से कई दिन पहले बाज़ारों में कुम्हारों की दुकानें सज जाती थीं। बच्चे अपने माता-पिता के साथ दीये खरीदने जाते और घर लौटकर उन्हें पानी में भिगोने, सुखाने तथा व्यवस्थित करने में हाथ बंटाते थे। फिर उनमें तेल और बाती डालकर घर के कोने-कोने में जलाया जाता था। मिट्टी के इन छोटे-छोटे दीयों की टिमटिमाती लौ में केवल रोशनी नहीं, बल्कि मिट्टी से जुड़ाव, श्रम का सम्मान और अपनी परंपराओं के प्रति आत्मीयता भी समाहित होती थी। गांवों में कुम्हार अपने चाक पर मिट्टी से दीये, कुल्हड़, खिलौने और अन्य उपयोगी वस्तुएं बनाते थे। कई स्थानों पर किसान अनाज के बदले कुम्हारों से दीये लेते थे। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारस्परिक सहयोग की ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें एक परिवार की खुशियां दूसरे परिवार की आजीविका से जुड़ी होती थीं। आज बिजली की झालरों और सजावटी रोशनियों ने मिट्टी के दीयों का स्थान काफी हद तक ले लिया है। हम घर की सजावट पर हज़ारों रुपये खर्च करने से नहीं हिचकिचाते, लेकिन मिट्टी का दीया खरीदते समय उसकी कीमत पर मोलभाव करते हैं। ऐसे में मिट्टी के दीये खरीदना महज परंपरा निभाना नहीं, बल्कि स्थानीय कारीगरों की आजीविका, आत्मसम्मान और पारंपरिक हुनर को बचाने का छोटा लेकिन सार्थक प्रयास है।
दिवाली की तैयारियों में कभी घर की रसोई भी उत्सव का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। महिलाएं कई दिन पहले ही पकवान बनाने में जुट जाती थीं। इन पकवानों में केवल आटा, घी और चीनी नहीं, बल्कि परिवार का सामूहिक श्रम, प्रेम और अपनापन भी घुला होता था। आज समय की कमी और बदलती जीवनशैली के कारण बाज़ार की मिठाइयों तथा पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर निर्भरता बढ़ गई है। बाज़ार से मिठाई खरीदना गलत नहीं है, लेकिन घर में कुछ पारंपरिक पकवान बनाकर परिवार के साथ बांटने का आनंद किसी महंगे मिठाई के डिब्बे में नहीं मिल सकता। आखिर मिठास केवल मिठाई में नहीं, बल्कि उसे बनाने, परोसने और अपनों के साथ बांटने के भाव में भी होती है। आज बाज़ार की सजावटी वस्तुओं और ऑनलाइन खरीदारी ने इन सामूहिक गतिविधियों का स्थान ले लिया है। सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन परिवार के साथ बिताए जाने वाले आत्मीय पल धीरे-धीरे कम हुए हैं।
दिवाली के बदलते स्वरूप का एक चिंताजनक पक्ष पटाखों का बढ़ता शोर और प्रदूषण भी है। कुछ घंटों की आतिशबाज़ी के लिए बड़ी मात्रा में धन खर्च किया जाता है जबकि इससे निकलने वाला धुआं वायु की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। तेज़ आवाज़ बुज़ुर्गों छोटे बच्चों और ध्वनि के प्रति संवेदनशील लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती है। पशु-पक्षी भी इस शोर से भयभीत होते हैं। त्योहार की खुशी ऐसी नहीं होनी चाहिए जो किसी दूसरे जीव या व्यक्ति के लिए कष्ट का कारण बन जाए। हमें यह समझना होगा कि उत्सव का अर्थ केवल शोर करना और धन खर्च करना नहीं है। कम पटाखे चलाना, पर्यावरण के अनुकूल सजावट करना, ऊर्जा की बचत करना और आसपास स्वच्छता बनाए रखना ज़िम्मेदार नागरिक होने के साथ-साथ हरित दिवाली की दिशा में भी आवश्यक कदम हैं।
तकनीक ने भी दिवाली के स्वरूप को काफी प्रभावित किया है। इंटरनेट, फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप के माध्यम से कुछ ही क्षणों में शुभकामना संदेश हज़ारों लोगों तक पहुंच जाते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से आकर्षक चित्र, संदेश और शुभकामना पत्र भी तैयार किए जा रहे हैं। नि:संदेह तकनीक ने दूर बैठे परिजनों और मित्रों से संपर्क आसान बनाया है, लेकिन डिजिटल संदेश आत्मीय मुलाकात का विकल्प नहीं हो सकते।
आखिरकार, बिजली की लड़ियां घर को रोशन कर सकती हैं, लेकिन रिश्तों में उजाला नहीं भर सकतीं। महंगे उपहार चेहरे पर क्षणिक मुस्कान ला सकते हैं, लेकिन मन को सच्ची खुशी अपनत्व से ही मिलती है। पटाखों का शोर उत्सव का एहसास करा सकता है, लेकिन किसी के मन का सन्नाटा दूर नहीं कर सकता। इसलिए इस दिवाली केवल घर नहीं, दिल भी रोशन करें। मिट्टी के दीये जलाएं और अपनी संस्कृति संभालें। झिलमिलाती झालरों के बीच मिट्टी के दीयों की लौ बुझने न पाए, यही हमारी परंपरा, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के प्रति सच्चा संकल्प होना चाहिए। (एजेंसी)

