भारतीय जीवन पद्धति में गुरु का महत्व


भारतीय जीवन परम्परावादी है। हमारे ऋ षि-मुनियों ने बहुत सोच विचार कर ज्ञान,विज्ञान और समय की कसौटी पर सौ प्रतिशत कस कर कुछ परम्पराओं का निर्माण किया। इन्हीं के कारण हजारों सालों के विदेशी और विधर्मी आक्र मण के बाद भी भारत बचा हुआ है। ऐसी ही एक परम्परा है श्री गुरुपूर्णिमा उत्सव। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहते हैं। वेदों के संकलनकर्ता और संपादक तथा महाभारत के लेखक महर्षि व्यास का जन्म इसी दिन हुआ था। व्यास जी का महत्त्व इससे भी प्रकट होता है कि संपूर्ण विश्व के साहित्य पर उनके साहित्य को श्रेष्ठ कहा जाता है। स्पष्ट है कि व्यास जी ने अपने जीवन में इतना अधिक काम किया कि उनका नाम एक संस्था और पदवी बन गया। आज भी जब कोई कथा होती है तो प्रवचनकार को कथा व्यास और उसके मंच को व्यासपीठ कहा जाता है। यह व्यास जी के महान कार्यों को आज तक दिया जाना वाला सादर सम्मान ही है। ऐसे श्रेष्ठ महापुरुष के जन्मदिवस को व्यास पूर्णिमा और आदि गुरु होने के कारण गुरु पूर्णिमा कहना स्वाभाविक ही है। प्राचीन काल में इसी दिन विद्यार्थी अपनी विद्या आरंभ करते थे। उनके अभिभावक बच्चे को गुरु के पास ले जाकर उसे गुरु को सौंपते थे। गुरु भी बच्चे को अपनी संतान के समान प्रेम देने के आश्वासन के साथ स्वीकार करते थे। छोटी अवस्था में तो बच्चे अपने घर के निकटवर्ती विद्यालय में जाते थे पर कुछ बड़े होने पर वे गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। इस प्रकार व्यास पूर्णिमा का पर्व हर गांव और मोहल्ले में विद्यारम्भ का एक वृहत उत्सव बन जाता। शिक्षा का प्राचीन भारत में कितना महत्त्व था, इसे इसी से समझा जा सकूता है कि गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक के 16 संस्कारों में विद्यारम्भ’ को एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया। बच्चा किसी भी वर्ग,वर्ण या लिंग का हो, उसके लिए शिक्षा अनिवार्य और नि:शुल्क थी। निर्धन बालक सुदामा और राजपरिवार के श्रीकृष्ण सांदीपनि गुरु के पास एक साथ पढ़ते थे। गुरुकुल में गुरु और गुरुपत्नी के सान्निध्य में सब बच्चे एक परिवार की तरह रहते थे। इस प्रकार मिले संस्कारों का जीवन भर अमिट रहना स्वाभाविक ही है। तब शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान नहीं था। इसलिए भाषा, राजनीति, भौतिकी,कला, चिकित्सा, रसायन विज्ञान, कूटनीति और तंत्र-मंत्र की शिक्षा के साथ ही लकड़ी काटने, खेती करने, गो-पालन से लेकर रसोई तक के काम छात्र प्रसन्नता से करते थे। शिक्षा पूरी होने पर बच्चे के अभिभावक अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार गुरु को जो भी देते थे, वे उसे प्रेम से स्वीकार करते थे। वह गांवों की जागीर से लेकर लौंग के दो दाने तक कुछ भी हो सकता था। साम्यवादी भले ही कितना ढिंढोरा पीटें पर समता और समानता का ऐसा उदाहरण इतिहास में मिलना कठिन है। यहां हमें शिक्षा और विद्या का अंतर भी समझना होगा। शिक्षा का अर्थ जहां व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी ज्ञान है, वहां का अर्थ व्यवहारिक के साथ ही सामाजिक ज्ञान भी है। विद्या में वे सब संस्कार आते हैं, जिनसे व्यक्ति सामाजिक और राष्ट्रीय प्राणी बनता है। विद्या हर व्यक्ति को ‘मैं और मेरा’ से ऊपर उठकर ‘हम और हमारा’ की ओर जाने हेतु प्रेरित करती है। इसीलिए कहा है : सा विद्या या विमुक्तये, अर्थात विद्या व्यक्ति को उसके जीवन में व्याप्त दूषित पूर्वाग्रहों से मुक्त करती है इसलिए इस महत्त्वपूर्ण संस्कार का नाम विद्यारम्भ रखा गया, शिक्षारम्भ नहीं।गुरु का भारतीय जीवन पद्धति में और भी अनेक कारणाें से महत्त्व है। सबसे पहली बात तो यह है कि न केवल शिक्षा अपितु समाज जीवन के हर क्षेत्र में गुरु की आवश्यकता बताई गई है। मां अपने बच्चों की प्रथम गुरु कही जाती है क्योंकि वही उसे चलना, बोलना और किस से क्या व्यवहार करना है, यह बताती है। बालिकाओं को मां और बालकों को प्राय: पिता भावी जीवन के लिए तैयार करते हैं। इसलिए बच्चे का पहला विद्यालय उसका घर कहा जाता है।इस घर के बाद किताबी ज्ञान के लिए बच्चा घर से कुछ दूर के विद्यालय में अध्यापक के निर्देशन में शिक्षा पाता है। भारतीय परम्परा में शिक्षा समाप्ति के बाद दीक्षा का भी बड़ा महत्त्व है। दीक्षा से ही शिक्षित युवा यह जान पाता है कि उसे शिक्षा का उपयोग किस दिशा में करना है। दीक्षा के अभाव में शिक्षा का कैसा दुरुपयोग होता है, इसके हर दिन सैंकड़ों उदाहरण हम देखते हैं। बंदूक चलाने की शिक्षा के बाद यदि दीक्षा न हो तो वह किसी निरपराध की हत्या कर देती है जबकि सही दीक्षा हो तो उससे देश की रक्षा की जा सकती है। इसलिए शिक्षा के बराबर ही दीक्षा का भी महत्त्व है।केवल किताबी ज्ञान ही क्यों,गीत-संगीत, लेखन, संपादन से लेकर कपड़े सिलने और मिस्त्री बनने जैसे काम भी गुरु के निर्देशन में ही सीखे जा सकते हैं। आज भात में जो भी ख्यातिप्राप्त कलाकार हैं, वे अपने गुरु का स्मरण कर धन्यता का अनुभव करते हैं। सच तो यह है कि जीवन का कोई भी क्षेत्र हो, गुरु के सान्निध्य के बिना उद्धार संभव नहीं है इसीलिए जब दशरथ के दरबार में ऋषि गुरु विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को मांगने आए तो वे संकोच में पड़ गए। ऐसे में गुरु वशिष्ठ ने राजा को आश्वस्त किया क्योंकि वह जानते थे कि राम का अवतार जिस काम के लिए हुआ है, उसके लिए उन्हें विश्वामित्र जैसे गुरु का सान्निध्य मिलना आवश्यक है। कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य और कर्ण के गुरु परशुराम की कहानी कौन नहीं जानता। शिवाजी के जीवन में परिवर्तन तब हुआ, जब उन्हें समर्थ स्वामी रामदास जैसा श्रेष्ठ गुरु मिला। विजयनगर साम्राज्य के निर्माता हरिहर और बुक्क के जीवन में स्वामी विद्यजीवन को सही दिशा गुरु गोबिंद सिंह जी ने दी।रामकृष्ण परमहंस के कारण विवेकानंद का, विवेकानंद के कारण मार्ग्रेट नोबेल (भगिनी निवेदिता) का और स्वामी विरजानंद के कारण ऋषि दयानंद का जीवन बदल गया। भाई परमानंद, वीर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा ने न जाने कितने युवकों के मन में क्रांति का बीज बोया। गुरु शिष्य के अंतर्मन में छिपी प्रतिभा को पहचान कर उसे पल्लवित,पुष्पित और प्रस्फुटित होने का अवसर प्रदान करता है। वह शिष्य की कमियों को प्रेम से दूर करता है और फिर उसे अपने से भी आगे बढ़ता देखकर प्रसन्न होता है। पश्चिमी चिंतन में गुरु का इतना महत्त्व नहीं है। वहां शिक्षक और छात्र तो हैं पर गुरु और शिष्य नहीं। शिक्षक अपने परिवार का पेट भरने के लिए पढ़ाता है और छात्र भी इसलिए पढ़ता है कि वह भविष्य में परिवार पाल सके। इसी में से वेतन ट्यूशन,नकल,नंबर बढ़ाने और हिंसक आंदोलन जैसी प्रवृत्तियां जन्मी हैं जिन्होंने शिक्षा जगत का कबाड़ा कर दिया है। इसीलिए अब शिक्षक छात्रों से डरते हैं। विद्यालय नग्नता, गुंडागर्दी, दलाली और राजनीति के अड्डे बन गए हैं। यदि इस दृश्य को बदलना है तो गुरु परम्परा को पुनर्जीवित करना होगा। (युवराज)

—विजय कुमार