विश्व विजयी गामा पहलवान


विदेशोंमें भारतीय कुश्ती की धाक जमाने वाले ‘रुस्तमे-हिंद’ गामा की नस-नस में दांव-पेच समाये हुए थे। दुनियाभर के पहलवानों को चित करने वाले भारतीय पहलवान गामा की चुनौती का सामना करने का साहस किसी में नहीं था। अहमद बख्श गामा ने इंग्लैंड जाकर खुली चुनौती दी और वहां के अजेय पहलवान बेंजामिन लोलर को परास्त किया। तत्पश्चात गामा की कुश्ती पोलैंड के प्रसिद्ध पहलवान जेविस्को से हुई। प्रथम दिन दो घंटे पैंतालीस मिनट मल्ल युद्ध हुआ, पर जेविस्को चित नहीं किया जा सका। दूसरे दिन पुन: इनकी कुश्ती निश्चित हुई परंतु जेविस्को इंग्लैंड छोड़कर ही भाग खड़ा हुआ। दूसरे वर्ष गामा ने मारिस हेरियाज तथा आरमैंड चेयरपिलोड जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के पहलवानों को पराजित किया। 1910 में ‘रुस्तमे-हिंद’ खिताब के लिए विराट दंगल का आयोजन हुआ, जिसमें विजयी होकर गामा ‘रुस्तमे-हिंद’ घोषित हुए। 1922 में जेविस्को, गामा से मल्ल युद्ध करने भारत आया और इस बार गामा ने उसे 42 सेकेंड में ही चित कर दिया। गामा की आखिरी कुश्ती जे.सी.पीटरसन से हुई, जो अपने को विजेताओं का विजेता कहता था। गामा ने उसे एक मिनट 45 सेकेंड में ही पराजित कर दिया। शीघ्र ही गामा को विश्वविजयी कहा जाने लगा। उन्होंने लंबे समय तक दंगलों में भाग लिया और सदैव अपराजित रहे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनका स्वाभिमान था परंतु वे मिलनसार स्वभाव के थे। भारतीय कुश्ती कला की पताका को विश्व में फहराने का श्रेय गामा को जाता है। अहमद बख्श गामा का जन्म दतिया (म.प्र.) के एक कश्मीरी परिवार में हुआ था। बचपन से ही कुश्ती का अभ्यास करने वाले गामा ने 20 वर्ष की उम्र में ही देश के नामी पहलवानों को पराजित कर दिया था। गामा कुछ वर्ष पटियाला नरेश के आश्रय में भी रहे। बाद में वे लाहौर में रहने लगे। विभाजन के बाद वह लाहौर में ही रहे, जहां उनका शेष जीवन घोर निर्धनता, अभावों एवं कष्टों में बीता। 22 मई, 1960 को लाहौर में उनका निधन हुआ।

प्रस्तुति-फ्यूचर मीडिया नेटवर्क