डाक्टर और मरीज : एक पवित्र रिश्ता


डाक्टर तथा मरीज के बीच का संबंध पवित्र होता है। यही कारण है कि यह नैतिकता पर आधारित होता है। यही वजह है कि  मरीज किसी खास डाक्टर के पास जाने पर अच्छा महसूस करता है। वही दवा अगर उसे दूसरे डाक्टर से मिले तो शायद वह सुधार न दिखाई दे। यह संबंध महत्वपूर्ण है क्योंकि सवाल अपने या अपने रिश्ते-नाते वालों के शरीर का रहता है। ईलाज के दौरान किसी भी तरह की समस्या को लोग स्वीकार नहीं कर सकते। लेकिन अगर डाक्टर-मरीज के संबंध मजबूत  हों तो मेल-मिलाप की संभावना रहती है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि आज भी मरीज भगवान के बाद डाक्टर को ही मानता है। डाक्टरों पर मरीज का भरोसा ही है जिसके कारण डाक्टर रोग दूर करने वाला ही नहीं दिखाई देता, व्यक्तिगत तथा पारिवारिक मामलों में सलाह देने वाला भी बन जाता है । डाक्टर की भगवान जैसी छवि मरीज की अांखों में इसलिए उभरती है कि उसे विश्वास रहता है कि डाक्टर हमेशा नैतिक होगा और उसके आचरण नैतिक सिद्धांतों पर आधारित होंगे।
लेकिन पिछले कुछ सालों में यह रिश्ता कमजोर हुआ है। कई डाक्टरों के अनैतिक होने की काफ ी चर्चा है। लोगों के मन में यह भावना आ गई है कि ज्यादा फीस तथा अधिक दवाइयां देकर डाक्टर ठग रहे हैं। व्यापक सोच के तहत इसकी पड़ताल होनी चाहिए। कोई भी पेशा समकालीन सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को दर्शाता है। एक समय था, जब हमारे इलाके का डाक्टर-वैद्य मरीज से कोई फ ीस नहीं लेता था और मरीज उसे दक्षिणा के रूप में  जो भी कुछ दे देता था उसी से संतोष कर लेता था। यही बात शिक्षक यानि गुरु के साथ थी। वह सीमित ज्ञान तथा संसाधनों का काल था।  शिक्षा केवल कुछ तथाकथित उच्च जातियों तक ही सीमित थी। हालांकि आबादी का बड़़ा हिस्सा मंत्रों से इलाज करने वालों की दया पर निर्भर था, आम लोगों, खासकर गरीब तथा हाशिये के लोगों को चिकित्सकीय सुविधा तुलनात्मक रूप से ज्यादा उदारतापूर्वक मिली हुई थी। व्यवस्था में परिवर्तन तथा चिकित्सा में आधुनिक वैज्ञानिक दवाओं के प्रवेश के बाद स्थिति बदलने लगी। काफी शोध तथा नई दवाएं आ गईं जिसके प्रचार की ज़रूरत थी। इसलिए दवा व्यापार बनने लगा। एक समय था जब नौजवान छात्र डाक्टर बनना चाहते थे, क्योंकि उन्हें यह एक सम्मानित पेशा लगता था जिसमें वे लोगों की तकलीफ  दूर और समाज की सेवा कर सकते थे। इसके साथ ही एक सुरक्षित आर्थिक जीवन तथा डाक्टर के रूप में सामाजिक सुरक्षा पा सकते थे। यह एक खुली भावना थी। 
हमारे देश में सामाजिक-आर्थिक संबंधों के फि र से परिभाषित होने के साथ ही इसमें बदलाव आना शुरू हो गया। इसमें 1980 के दशक में वैचारिक परिवर्तन आ गया। सरकार स्वास्थ्य सुविधा की ज़िम्मेदारी से हटने लगी तथा इसने स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने की अपनी भूमिका बदलने और सिर्फ  सहायक की भूमिका अपनाने का फैसला किया। हालांकि, निजी क्षेत्र पहले भी मुख्य सुविधा प्रदान करने वाला था, लेकिन उसकी भूमिका सिर्फ  प्राथमिक तथा माध्यमिक चिकित्सा सुविधा प्रदान करने तक सीमित थी। उच्च स्तर की चिकित्सा सुविधा सरकार के जिम्मे ही थी। अब निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका दे दी गई है। सरकार को जो सुविधा प्रदान करनी थी उसे कारपोरेट सैक्टर ने अपने हाथ में लिया। जिसके लिए मुनाफ ा कमाना ही एकमात्र उद्देश्य है। उसे हाशिए पर के लोगों से कोई लेना-देना नहीं है।
यह एक ऐसा समय है जब प्रतिस्पर्धा वाले बाजार में चिकित्सकीय पेशेवर भी प्रभावित होते हैं। जांच में कमीशन और दलाली शुरू हुआ और उसके बाद किसी दूसरे डाक्टर के पास जाने की सिफ ारिश में भी यह होने लगा।
चिकित्सा एक साफ -सुथरा पेशा है जहां हम बीमार तथा लाचार लोगों की सेवा करते हैं। इसकी बड़ी ज़िम्मेदारी है और इसे इतना मजबूत होना चाहिए कि यह बाजार के दबाव को सहन कर सके। डाक्टरों की ज़िम्मेदारी है कि वे डाक्टर-मरीज संबंध को एक मजबूत आधार दें। समाज का भी दायित्व है कि वह डाक्टरों की आकांक्षाओं को पूरा करे और सभी डाक्टर एक ही रूप में न देखें जाएं। (संवाद)