भारत-पाकिस्तान संबंधों का अलग-सा दौर
भारत के लिए यह सवाल अभी भी सामने की दीवार पर लिखा है कि पाकिस्तान प्रायोजित हिंसा अगली बार भारत में कहीं भी अपनी मनहूस छाप छोड़ती है तो हमारी प्रतिक्रिया क्या होगी? मुनीर को अथाह शक्तियां मिल चुकी हैं और किसी भी तरह उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। दूसरे, दिल्ली में हुए बम बलास्ट ने स्पष्ट रूप में चिंता बढ़ा दी है? मुख्य एजेंसियों का मानना है कि यह षड्यंत्र इससे ज्यादा मार्क हो सकता था, लेकिन उसे बीच में ही रोक दिया गया। ऐसे में पाकिस्तान की मदद से उभरे आतंकवाद को हल्के में कैसे लिया जा सकता है?
भारत और पाकिस्तान के संबंधों में आशंका बनी ही रहती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद दोनों में कोई बड़ी लड़ाई तो नहीं हुई। फिर भी राजनीतिक बदलाव तो दोनों तरफ देखे जा सकते हैं। दोनों देश कठोर सच्चाई के अनुरूप अपने बयान दे रहे हैं।
ऑपरेशन सिंदूर की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। इसमें हमारा माइंड सेट सामने आ गया। भारत को दिखाना पड़ा कि परमाणु हदबंदी को स्वीकार करते हुए संतुलित सैन्य बल का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी राजनीतिक मंजूरी जल्दी मिल गई और लक्ष्य सीमित रखे गये। आतंकवाद का मुंह तोड़ जवाब देना ज़रूरी हो गया था।
उधर पाकिस्तान में तेजी से कुछ बदलाव किए गये। पाकिस्तान संविधान में प्रस्तावित 27वां संशोधन मात्र एक कानूनी बदलाव नहीं है। सेना प्रमुख को चीफ ऑफ डिफेंस बनाया गया। सेना के सामूहिक ढांचे की सम्भाल करना और परमाणु कमान को पूरी तरह सैन्य नियंत्रण में लाना, इस सबसे पता चलता है कि पूरा नियंत्रण अब शीर्ष में केन्द्रित हो रहा है। यह ज्यादा ़खतरनाक स्थिति मानी जा सकती है। शक्तियां एक ही हाथ में चली जा रही हैं। भारत के लिए चुनौती बनी हुई है कि वह पाकिस्तान से जो ऐसे ़खतरनाक संकेत मिल रहे हैं उनका जवाब कब और कैसे दिया जाये। भारत यह भी नहीं दिखाना चाहेगा कि वह सारी चीज़ों को उपेक्षा की नज़र से देख रहा है या उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। परमाणु धमकियों की वजह से यदि पारम्परिक और मिश्रित प्रतिक्रियाएं भी रोक दी जाएं तो वह प्रॉक्सी युद्ध की रणनीति को बढ़ावा देता है। दूसरी बात यह कि विपक्ष का ध्यान जितना एस.आई.आर. के मुद्दे पर है उतना पड़ोस की हलचल या नीति पर नहीं। भारत की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा की बजाय वोट बैंक उनकी चिंता का कारण है।
कश्मीर को पूरे बदलाव का केन्द्र माना जा रहा है। हाल के वर्षों में कश्मीर घाटी की तुलना में जम्मू, विशेषकर राजौरी, पुंछ और कठुआ में ज्यादा हिंसा हुई है। यह बात अर्थपूर्ण है। पाकिस्तान की राजनीतिक नैरिटिव और उसकी अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति जम्मू की बजाय कश्मीर के इर्द-गिर्द घूमती है। घाटी में लंबे समय तक शांति उस मुद्दे पर पाकिस्तान की प्रासंगिकता घटाती है, जिसे उसने सदा अपनी पहचान का मूल माना है।
भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में ऐसे लोग भी हैं जो सीमाओं पर अमन चाहते हैं। विवाद का बातचीत द्वारा हल करवाना चाहते हैं। जीओ और जीने दो में विश्वास रखते हैं। हुक्मरानों के स्वार्थ से मतलब नहीं रखते और दोनों देशों में सांस्कृतिक आदान-प्रदान को अर्थपूर्ण समझते हैं। लेकिन जब हालात इस तरह के संगीन बने रहे, उनकी गतिविधियों पर अंकुश लग जाता है। तब बढ़-चढ़ कर बोलने वाले आगे आ जाते हैं। शांति के प्रयास को ठोकर लगती है। युद्ध की तैयारियों में करोड़ों रुपये खर्च करना ज़रूरी हो जाता है। देश भक्ति को आधार बनाया जाता है।
ज़ाहिर तौर पर भारत और पाकिस्तान किसी टकराव की स्थिति में नहीं है, लेकिन हालात बदल रहे हैं। जिनके प्रति बेखबर रहना भी ठीक नहीं होगा। भारत बिना कोई दावा किये जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार है। पाकिस्तान की गुपचुप तैयारियों और वैश्विक संबंधों पर नज़र तो रखनी होगी।



