ऐतिहासिक फैसले

भारत और यूरोपियन संघ में हुआ व्यापार समझौता बेहद महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक कहा जा सकता है। यूरोपियन संघ के गठन की शुरुआत वर्ष 1958 में शुरू हो गई थी। समय-समय पर इससे जुड़े 28 देशों में नई संधियां होती रहीं और आपसी गठबंधन के नए समझौते भी किए जाते रहे, जो वर्ष 2013 तक निरन्तर विकास करते रहे और एक तरह से पूरा यूरोपियन क्षेत्र ही एक मज़बूत संगठन में बंध गया। वर्ष 2020 में ब्रिटेन इससे अलग हो गया परन्तु संगठन के शेष 27 देशों ने बेहद अनुशासन बना कर अपनी एकता और शक्ति को और भी मज़बूत और प्रभावशाली बना लिया। विगत लगभग दो दशकों से भारत और यूरोपियन यूनियन की सभी देशों के आपसी मेल-मिलाप को बढ़ाने के लिए लगातार वार्ता चलती रही और सामने आती अनेक रुकावटों का हल निकालने का यत्न किया गया।
इस दौरान अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक कार्यकाल पूरा करके दूसरी बार इस कुर्सी पर बैठे हैं। उन्होंने ‘अमरीका फर्स्ट’ की अपनी नीति लागू करके एक तरह से विश्व भर के बड़े-छोटे देशों को चुनौती दे दी है। भारत, रूस और चीन जैसे बड़े देश भी उनके निशाने पर हैं। यूरोपियन संघ के साथ अमरीका के दशकों से लगातार मेल-मिलाप वाले अच्छे संबंध बने रहे हैं परन्तु ट्रम्प की मौजूदा नीतियों ने इस मज़बूत संघ को भी बड़ी चुनौती दे रखी है। ब्रिटेन चाहे इस संघ से अलग हो चुका है परन्तु उसने भी ट्रम्प की नीतियों से नाखुश होकर व्यापार और सहयोग के लिए अन्य देशों की ओर अपनी नज़रें केन्द्रित करनी शुरू कर दी हैं। भारत के साथ उसने पहले से कहीं अधिक व्यापारिक संबंध बनाने को प्राथमिकता दी है। इसी क्रम में विगत दिवस भारत के गणतंत्र दिवस के बाद यूरोपियन संघ के साथ भारत के हुए समझौते ने देश को एक बड़ा संबल दिया है। एक तरफ भारत और दूसरी तरफ यूरोप के 27 देशों के बीच हुए इस समझौते ने विश्व भर को आश्चर्यचकित कर दिया है।
77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर यूरोपियन परिषद् के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपियन आयोग की प्रमुख उरसुला वॉन डेर लेआन को भारत की ओर से इस अवसर पर मुख्यातिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। गणतंत्र दिवस समारोह के एक दिन बाद यह ऐतिहासिक समझौता किया गया। किए गए समझौते में व्यापारिक धारा के अतिरिक्त अनेक कुछ ऐसी धाराओं को शामिल किया गया जिससे आगामी समय में भारत और यूरोपियन संघ के मध्य मेल-मिलाप और भी भावपूर्ण हो जाएगा। वर्ष 2024-25 में भारत और यूरोपियन संघ का व्यापार 11.5 लाख करोड़ था। इस समझौते को प्रक्रिया में लाने के बाद आपसी व्यापार के कई गुणा बढ़ जाने की सम्भावना बन गई है। यूरोपियन संघ विश्व की दूसरी बड़ी आर्थिक शक्ति है। भारत लगातार चौथी शक्ति बनने के बाद तीसरी शक्ति बनने के मार्ग पर चल रहा है। दोनों पक्षों की आर्थिकता विश्व की एक चौथाई है और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार एक तिहाई हिस्से के समान है। भारत ने लगातार इस बात का ध्यान रखा है कि वह अपनी कृषि वस्तुओं, डेयरी पदार्थ, पोल्ट्री, कुछ फलों और सब्ज़ियों के क्षेत्र को ऐसे समझौते से प्रभावित न होने दें और इन क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित बनाएं, परन्तु चाय, कॉफी, मसाले, ताज़ा फल और सब्ज़ियां आदि भारतीय वस्तुओं के लिए यूरोप ने अपने द्वार पूरी तरह खोल दिए हैं, परन्तु इसके साथ ही कपड़ा, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पादन, आभूषण, हीरे और इंजीनियरिंग की वस्तुओं के निर्यात में भी भारत को बड़ा लाभ पहुंचने की उम्मीद बन गई है।
 भारतीय श्रमिक, कारीगर, महिलाएं और युवाओं के भी यूरोप में जाने के अधिक अवसर पैदा होने की उम्मीद की जा रही है। इसके साथ ही शिक्षा, वित्तीय सेवाएं, निर्माण और पर्यटन के लिए भी भारत में सम्भावनाएं उजागर हो सकती हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी चीन से भारत को दरपेश बड़ी चुनौतियों में भी यूरोपियन संघ चीन के मुकाबले में भारत के साथ खड़े होने को प्राथमिकता देगा। ऐसा समझौता विश्व भर में भारत के प्रभाव को और भी बढ़ाने में सहायक होगा। यह बात अब विश्वास और गर्व के साथ कही जा सकती है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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