चटपटी है मसालों की कहानी

दालचीनी, अदरक लौंग, काली मिर्च, काली इलायची आज से 5000 वर्ष पहले सिर्फ भारतीय उपमहाद्वीप में ही पायी जाती थी। तब भारत से इसका निर्यात पश्चिम व मध्यपूर्व में होता था।  अरब के व्यापारी मसालों का व्यापार करते थे। उन्होंने ऐसी अफवाहें उधर फैला रखी थीं कि दूसरे देशों के व्यापारी इधर आने की हिम्मत न करें। अरबों ने अफवाहों में कहा था कि मसाले ऐसे दुर्गम क्षेत्र में होते हैं जहां पंखदार भयंकर ड्रैगन रहते हैं। जहरीले सर्पों व मानव भक्षी जानवरों के बीच से जान जोखिम में डालकर मसाले एकत्र करने पड़ते हैं।
एक जमाने में श्रीलंका सबसे बड़ी मसाला मंडी था। 332 ईसा पूर्व में विश्व की प्रमुख मसाला मंडी सिकंदरिया बना। पहले भारत से मसालों का व्यापार सिर्फ अरब कर रहे थे, फिर अलैक्जेंड्रिया के मिस्तियों ने किया। जब रोमनों का व्यापार शुरू हुआ तो रोमन व्यापारिक नगर वेनिस विश्व की प्रमुख मसाला मंडी बना। यह व्यापार 8वीं सदी से 15वीं सदी तक चला।
मसाले मध्य पूर्व और पश्चिम में हमेशा ही हाथों-हाथ लिए जाते थे। हर बड़ा व्यापारी चाहता था कि वह मसालों का व्यापार करे या मसाले उसके हाथ लगें। इसके लिए व्यापारियों के बीच छलकपट, मारपीट और लूटमार तक होती थी। तमाम देशों के व्यापारी इस खोज में रहते थे कि मसाले कहां से, कैसे प्राप्त होते हैं। वास्को-डी-गामा का भारत आगमन उसी खोज की एक कड़ी था। सन् 1498 में वास्को-डी-गामा ‘केप ऑफ गुडहोप’ का चक्कर काटकर भारत के पश्चिमी तट कालीकट पहुंचा।
गामा के अलावा दो और यात्री मसालों के लिए भारत की खोज में निकले, 1492 में स्पेन से क्त्रिस्टोफर कोलंबस और 1497 में इंग्लैंड से जॉन कैबेट। यह दोनों ही भारत पहुंचने में असफल रहे। हां, कोलंबस ने अमरीका की खोज कर डाली।
असल में उस समय आवागमन समुद्री मार्ग से ही होता था। कोलंबस जल्दी पहुंचने के चक्कर में भटक गया और अमरीका पहुंच गया। जब वह जहाज से उतरा तो उसे यकीन था कि वह भारत में उतर रहा है। वह जहां उतरा था, उस जगह का नाम उसने वेस्ट इंडीज रखा। वहां लाल रंग की त्वचा वाले लोगों को उसने ‘रेड इंडियंस’ कहा। उसने वहां मसालों की खोज की पर उसे कुछ नहीं मिला। 
जॉन कैबेट भटक कर कनाडा की धरती पर उतरा। उसे वहां मसालों के नाम पर सिर्फ बड़ी लाल मिर्च मिली। मसाले की तलाश में मैगेलान ने भी विश्व भ्रमण किया। ब्रिटिश साम्राज्ञी एलिजाबेथ प्रथम की आर्थिक सहायता से ‘गोल्डन हिंद’ नामक जहाज से मोलाक्यूस द्वीप पहुंचा और सिर्फ लौंग लेकर पहुंचा। मसाले को लेकर इंडोनेशिया पर अधिकार जमाया डच लोगों ने। फलस्वरूप मैक्सिको और अन्य दक्षिणी देशों में स्पेनी भाषा, संस्कृति और नस्ल का प्रसार हुआ। ब्रिटिशों का भारत आगमन मसाले प्राप्त करना और व्यापार करने के उद्देश्य से हुआ। रानी एलिजाबेथ प्रथम के आदेश पर भारत और दूसरे पूर्वी देशों से सन् 100 में कैप्टन जेम्स लैंकस्टार 10 लाख पौंड वजन की काली मिर्च लाया था। उसे यह मिर्च 6 पेंस की दर से मिली और उसने इसे चांदी के रेट पर बेचा।
रोमन सम्राट एलरिच ने विदेश व्यापार करने की रोमन व्यापारी को इस शर्त पर आज्ञा दी कि वह उसे प्रतिवर्ष कर के अलावा 16 कुंटल काली मिर्च भी देंगे। काली मिर्च की रोमन धनाढ्य वर्ग में बड़ी मांग थी, इसके लिए वे कोई भी कीमत देने को तैयार रहते थे। काली मिर्च के कारण एक बार तो रोमन अर्थव्यवस्था चौपट होने के कगार पर पहुंच गई। तब फ्लिटनी ने कहा था-‘रोमनों ने स्वाद लोलुपता के कारण सोना, चांदी, तांबा भारत भेजकर रोमन अर्थव्यवस्था चौपट कर रखी है।’
काली मिर्च, लौंग, इलायची तेजपत्ता, जीरा आदि मसाले स्वाद के साथ अच्छी सेहत भी देते हैं इसलिए उन दिनों भी इनके गुणों की चर्चा होती थी। प्राचीन मिस्र, बाबुल, यूनान, रोम और भारत आदि देशों में स्वास्थ्यकर पेय और चूर्ण बनाए जाते थे। यही नहीं, सुमेर, रोम और यूनान आदि देशों में मसालों का उपयोग पूजा में भी होता था। भारत में तो प्राचीन काल से लौंग की पूजा तथा तांत्रिक क्रियाओं में प्रयोग किया जाता रहा है। (उर्वशी)

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