कांगड़ा की वादियों में स्थित शक्तिपीठ ब्रजेश्वरी देवी मंदिर

पौराणिक मान्यतानुसर ब्रजेश्वरी देवी चमत्कारिक शक्ति के रूप में मानी जाती है। 51 शक्तिपीठों में से यह भी एक शक्ति स्थल है जिसकी जन साधारण में अच्छी मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि यहां देवी सती के वक्षस्थल गिरे थे। भक्तों की दृष्टि में यह तारा देवी का भी स्थान है।  हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा नगर में ब्रजेश्वरी देवी का भव्य मंदिर स्थित है। ज्वालामुली तीर्थ से लगभग 30 किमी. दूरी पर यह शक्तिपीठ है। मात्रा 2 घंटे में बस मार्ग से कांगड़ा पहुंचा जा सकता है। कांगड़ा से हिमाचल प्रदेश के दूसरे स्थानों के लिए बसें सुलभ हैं। पठानकोट से भी रवाना होकर यात्री लगभग तीन घंटे में कांगड़ा पहुंच सकते हैं। रेल की छोटी लाइन से भी यह स्थान जुड़ा हुआ है। रेल द्वारा भक्तजन मंदिर के समीप भी उतर सकते हैं।
हिमाचल प्रदेश के दर्शनीय स्थल
मंदिर से पूर्व पैड़ियानुमा चढ़ाई है। उसके बाद गली आती है। मंदिर का मुख्य द्वार बड़ा है। मंदिर के सिंहद्वार के पूर्व दायी-बायीं ओर दो छोटे-छोटे मंदिर हैं। प्रवेश करने पर संगमरमर की कुछ पैड़ियां उतरनी पड़ती हैं। इस मंदिर की यह विशेषता है कि इस मंदिर के ऊपर मस्जिद, गुरुद्वारा व मंदिर के प्रतीक चिन्ह ऊपर गुम्बद के पास बने हुए हैं। भक्तों को पंक्तिबद्ध रखने के लिए मंदिर परिसर में रेलिंग है। माता के दर्शन पिंडी के रूप में हैं। माता के सामने बड़ी-बड़ी आकृति में चार संगमरमर के शेर बने हैं। 
मंदिर का सभा मण्डप बड़ा है। दो बड़े-बड़े दीपक रखने के पात्रा सभा मण्डप में बने हुए हैं। सभी मण्डप संगमरमर के विशाल खंभों पर अवस्थित हैं। सभा मण्डप चारों तरफ से खुला है। सभा मण्डप में दुर्गा के कई रुपों की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी हुई हैं तथा एक मूर्ति बायीं ओर बनी हुई है। सभा मण्डप में किनारे-किनारे भी रेलिंग है। पश्चात चांदी की पात चढ़ा द्वार आता है, फिर चैनल गेट। माता का चौखटा चांदी का है। माता की पिण्डी के ऊपर कई छत्र लटके हुए हैं। परिसर में वातानुकूलित व्यवस्था है। मंदिर का गर्भगृह भी बड़ा है। दो चांदी के कपाटों वाली अलमारियां गर्भगृह में हैं। माता के पास मंदिर खुले रहने की अवस्था में लोग बैठे-बैठे माला फेरते रहते हैं। माता की पिण्डी के पीछे छोटी-छोटी मूर्तियां स्थित हैं। मुख्य प्रवेश द्वार के दायीं ओर वापसी में निकासी है। सभा मण्डप से पूर्व मंदिर के बाहर लम्बा-चौड़ा प्रांगण स्थित है। मंदिर के पीछे कमरे बने हुए हैं जहां लंगर की व्यवस्था है। मंदिर के पीछे एक और मंदिर है तथा परिसर में कुछ अन्य मंदिर भी अवस्थित हैं। मंदिर का शिखर विशाल होने के कारण दूर से ही दिखाई देता है। मंदिर के परकोटे में प्रवेश करते ही मुख्य द्वार के पास ध्यानु भक्त के सिर के दर्शन होते हैं। पुजारीगणों के अनुसार आगरा का निवासी ध्यानु भक्त जाति से बनिया था। उसके मन में माता के प्रत्यक्ष दर्शनों की लालसा प्रकट हुई। उद्देश्य पूर्ति हेतु उसके अपना सिर काट कर माता के चरणों में अर्पित किया। माता ने उसका सिर जोड़ दिया। ध्यानुभक्त ने पुन: सिर काटकर चरणों में अर्पित कर दिया। माता ने दूसरी बार भी उसका सिर जोड़ दिया। माता ने तीसरी बार सिर काटने के लिए मना किया था मगर ध्यानु ने फिर से सिर अर्पित कर दिया लेकिन तीसरी बार सिर नहीं जुड़ा। माता ने उसको वर दिया कि मेरे दर्शनों से पूर्व भक्त तेरे दर्शन करेंगे। 
सतयुग में देवी ने राक्षसों का संहार किया था। तब माता के शरीर में कुछ घाव हो गए। तब देवताओं ने माता के घावों पर घी का लेप किया था। इस परम्परा को मानते हुए लोहड़ी की अगली रात को माता के ऊपर पांच मन देशी घी, एक सौ बार शीतल कुएं के जल में धोकर, मक्खन तैयार करके, मेवों तथा अनेक प्रकार के फलों से सुसज्जित करके एक सप्ताह तक माता के ऊपर चढ़ा दिया जाता है। आस्था व विश्वास का यह शक्तिपीठ लाखों को अपने यहां प्रणाम करने हेतु प्रेरित करता रहता है। (उर्वशी)

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