ट्रम्प की किरकिरी

एक बार फिर अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की किरकिरी हुई है। उनके प्रशासन को इस बार जो चुनौती मिली है, वह बड़ी भी है और गम्भीर भी। देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने ट्रम्प द्वारा अन्य देशों पर जो कर (आयात टैक्स) लगाए थे, उन्हें रद्द करने की घोषणा कर दी है। सर्वोच्च अदालत ने बहु-सम्मति से यह फैसला दिया है कि राष्ट्रपति ने ऐसा करके इस दिशा की ओर जो कदम उठाए हैं, वे जायज़ नहीं, न ही वह अमरीकी राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। अदालत के अनुसार ऐसे फैसले लेने का अधिकार अमरीकी कांग्रेस को है, राष्ट्रपति को नहीं। 1977 के एक कानून में आपात्काल के दौरान व्यापार को नियमित करने के अधिकार राष्ट्रपति को दिए गए थे, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रम्प की टैरिफ संबंधी घोषणाएं और क्रियान्वयन उस कानून के दायरे में नहीं आते।
ट्रम्प दूसरी बार अमरीका के राष्ट्रपति बने हैं। अपने पहले कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई बहुत ही विवादास्पद फैसले किए थे, जिनकी विश्व भर में चर्चा रही थी। तब उन्होंने 7 मुस्लिम बहुसंख्यक वाले देशों के लोगों पर अमरीका में दाखिल होने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। उन्होंने मैक्सिको-अमरीका की सीमाओं की दीवारों को और भी ऊंचा करने और मज़बूत करने की योजना बनाई थी। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व के वायुमंडल में बड़े बदलाव संबंधी किए गए और किए जाने वाले समझौतों से उन्होंने किनारा कर लिया था। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भी सख्ती से दबाने की नीति धारण की थी और चीन के साथ व्यापारिक लड़ाई शुरू कर दी थी। अपनी ऐसी नीतियों के कारण कड़ी आलोचना के दायरे में आने के कारण वह 2020 में डैमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडन से हार गए थे, परन्तु तब उन्होंने चुनावों में धांधली किए जाने का शोर-शराबा किया था और उनकी शह पर ही उनके समर्थकों ने 6 जनवरी, 2021 को संसद भवन ‘कैपीटोल’ पर हमला कर दिया था, जिस कारण उन पर मुकद्दमा भी चलाया गया था। उन पर शारीरिक शोषण, अपने विरोधियों पर निराधार आरोप लगाने और व्यापार में बड़े घोटाले करने संबंधी लगभग 34 मामले चलाए गए थे परन्तु इस सब कुछ के बावजूद उनके द्वारा वर्ष 2024 में राष्ट्रपति का चुनाव जीतने ने विश्व भर को आश्चर्यचकित कर दिया था। 
आते ही उन्होंने वर्षों से रहे अपने मित्र देशों पर अधिक से अधिक आयात टैक्स लगाने की घोषणा कर दी थी। इसका प्रभाव विश्व के सैकड़ों देशों पर तो पड़ा ही था परन्तु उनके टैरिफ संबंधी फैसलों और अन्य अनेक कारणों के दृष्टिगत अमरीका में एकाएक महंगाई बढ़ने से उनकी आलोचना होनी शुरू हो गई थी और उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुना हुआ ‘तानाशाह’ कहा जाने लगा था। उन्हें राष्ट्रपति बने वर्ष से अधिक का समय हो चुका है, इस समय में ही उन्होंने एक बार तो विश्व को हिला कर रख दिया है और यह भी कि किसी बड़े युद्ध लगने की सम्भावनाओं को और उजागर कर दिया है। एक वर्ष की अवधि में ही उनकी ओर से किए गए लगभग 150 फैसलों पर अदालत ने प्रतिबन्ध लगा दिया था। इन फैसलों में जन्म आधारित नागरिकता, ट्रांसजैंडर अधिकार, यूनिवर्सिटियों और कालेजों के फंड रोकने और उनके द्वारा घोषित चुनाव सुधार निराधार करार दिए गए थे। अपनी आपात्काल शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अब तक विश्व भर में लगाए टैरिफ से उनकी ओर से टैरिफ संबंधी 175 अरब डॉलर वसूले जा चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फैसले से अमरीका में  अनिश्चितता वाली स्थिति पैदा हो गई है। टैरिफ संबंधी विगत फैसलों को रद्द करने से अमरीका में अस्थिरता और बढ़ सकती है। ट्रम्प के ज्यादातर फैसलों संबंधी उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के दर्जनों सदस्य उनके विरुद्ध आवाज़ उठा रहे हैं। यदि अब वह संवैधानिक परम्परा के अनुसार अमरीका के 2 सदनों कांग्रेस और सेनेट द्वारा अपने पहले दर्जनों ही फैसलों को पास करवाने का यत्न करते हैं तो ऐसा होना कठिन होगा।
अमरीका की 435 प्रतिनिधियों की कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी के 218 सदस्य और डैमोक्रेटिक पार्टी के 213 सदस्य हैं, इसी तरह 100 सदस्यों वाली सेनेट में 53 सदस्य रिपब्लिकन पार्टी और 47 सदस्य डैमोक्रेटिक पार्टी के हैं। पैदा हुए ऐसे हालात में वह स्वयं तो बड़ी मुश्किल में फंसे दिखाई देते ही हैं परन्तु इसके साथ ही उन्होंने विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका को भी चौराहे पर ला खड़ा किया है। पैदा हुए ऐसे विवादों और बेहद गम्भीर स्थिति से उनका निकल पाना बेहद कठिन प्रतीत होता है, जो अमरीका जैसे शक्तिशाली देश के लिए अच्छा संदेश नहीं कहा जा सकता।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द 

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