एआई दिल्ली समिट में हुआ दुनियाभर के दिग्गजों का जुटान

नई दिल्ली में आयोजित एआई समिट को केवल एक तकनीकी सम्मेलन कहना इसके महत्व को कम करके आंकना होगा। यह आयोजन उस वैश्विक श्रृंखला का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत इंग्लैंड और फ्रांस जैसे तकनीकी रूप से परिपक्व देशों से हुई और जिसे दक्षिण कोरिया जैसे नवाचार-केंद्रित राष्ट्रों ने आगे बढ़ाया। अब इस श्रृंखला में दिल्ली का जुड़ना इस बात का संकेत है कि भारत केवल एआई का उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक एआई पारिस्थितिकी तंत्र का सक्रिय सहभागी और संभावित नेतृत्वकर्ता बन चुका है। जब दुनिया के प्रमुख एआई वैज्ञानिक, निवेशक, नीति निर्माता और राजनीतिक नेता एक मंच पर इकट्ठा होते हैं, तो यह केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं होता, बल्कि भविष्य की तकनीकी दिशा तय करने की प्रक्रिया भी होती है।
भारत के लिए यह आयोजन इसलिए अद्भुत है क्योंकि यह उसकी तकनीकी और कूटनीतिक दोनों क्षमताओं की स्वीकृति का प्रतीक है। अब तक एआई के वैश्विक विमर्श पर अमरीका, यूरोप व चीन का वर्चस्व रहा है। ऐसे में नई दिल्ली में इस स्तर की समिट का आयोजन यह दिखाता है कि भारत को एक ‘विश्वसनीय तकनीकी शक्ति’ के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। यह वही भारत है, जिसने पिछले दशक में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना-आधार, यूपीआई व  डिजिलॉकर के माध्यम से दुनिया के सामने एक नया मॉडल प्रस्तुत किया है। इन प्रणालियों ने न केवल भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत किया, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि बड़े पैमाने पर तकनीकी समाधान लोकतांत्रिक और समावेशी हो सकते हैं।
इस समिट में एआई के वैश्विक धुरंधरों की उपस्थिति अपने-आप में एक संकेत है कि भारत अब केवल एक आईटी सेवा प्रदाता नहीं, बल्कि एआई अनुसंधान और नवाचार का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। भारत में पहले से ही दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम मौजूद है और एआई-आधारित स्टार्टअप्स की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। नैसकॉम के अनुसार भारत में एआई से संबंधित स्टार्टअप्स की संख्या 2020 से 2025 के बीच लगभग दोगुनी हो चुकी है। यह वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि भारत में प्रतिभा, बाजार और नवाचार की संभावनाएं प्रचुर मात्रा में हैं, लेकिन किसी भी समिट की सफलता का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि उससे देश को ठोस लाभ कितना मिलता है। इस दृष्टि से देखें तो भारत को इस आयोजन से तीन प्रमुख क्षेत्रों में लाभ मिलने की संभावना है-निवेश, नीति निर्माण और वैश्विक प्रभाव।
पहला और सबसे महत्वपूर्ण लाभ है निवेश। जब वैश्विक निवेशक और तकनीकी कंपनियां किसी देश में इस स्तर की उपस्थिति दर्ज कराती हैं, तो इसका सीधा अर्थ होता है कि वे वहां निवेश की संभावनाएं देख रही हैं। एआई के क्षेत्र में निवेश केवल पूंजी का प्रवाह नहीं लाता, बल्कि इसके साथ तकनीक, विशेषज्ञता और वैश्विक नेटवर्क भी आता है। यदि इस समिट के बाद भारत में एआई अनुसंधान केंद्र, डेटा सेंटर और नवाचार प्रयोगशालाएं स्थापित होती हैं, तो यह भारत की तकनीकी क्षमता को कई गुना बढ़ा सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण लाभ है नीति निर्माण में भारत की भूमिका का बढ़ना। एआई केवल तकनीकी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह नैतिकता, गोपनीयता और रोज़गार से भी जुड़ा हुआ है। दुनिया भर में एआई के नियमन को लेकर बहस चल रही है और इस संदर्भ में भारत की आवाज का महत्व बढ़ना स्वाभाविक है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश का दृष्टिकोण यह सुनिश्चित कर सकता है कि एआई का विकास केवल कॉर्पोरेट हितों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के व्यापक हितों को भी ध्यान में रखे।
तीसरा लाभ है वैश्विक प्रभाव और प्रतिष्ठा। आज की दुनिया में तकनीकी शक्ति ही वास्तविक शक्ति का आधार बनती जा रही है। जिस देश के पास एआई और अन्य उन्नत तकनीकों में नेतृत्व होगा, वही भविष्य की वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करेगा। नई दिल्ली में इस समिट का आयोजन यह संकेत देता है कि भारत अब इस वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में एक गंभीर दावेदार बन चुका है।
हालांकि, इस उपलब्धि के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। किसी समिट का आयोजन करना एक बात है, लेकिन उससे प्राप्त अवसरों का वास्तविक लाभ उठाना दूसरी बात। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस आयोजन के बाद एआई के क्षेत्र में ठोस कदम उठाए जाएं। इसमें अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा व प्रशिक्षण उपलब्ध कराना व उद्योग-अकादमिक सहयोग को मजबूत करना शामिल है।
भारत के पास प्रतिभा की कमी नहीं है। हर साल लाखों इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ देश से निकलते हैं लेकिन चुनौती यह है कि इन प्रतिभाओं को एआई जैसे उन्नत क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जाए और उन्हें देश में ही अवसर प्रदान किए जाएं। यदि भारत इस दिशा में सफल होता है, तो वह न केवल एआई का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है, बल्कि वैश्विक तकनीकी नेतृत्व में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि एआई का विकास केवल आर्थिक अवसर ही नहीं, बल्कि सामाजिक व नैतिक चुनौतियां भी लेकर आता है। रोज़गार पर इसका प्रभाव, डेटा गोपनीयता के मुद्दे और एआई के दुरुपयोग की संभावनाएं-ये सभी ऐसे प्रश्न हैं जिनका समाधान संतुलित और दूरदर्शी नीति से ही संभव है। भारत के पास यह अवसर है कि वह एआई के विकास का एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत करे, जो तकनीकी प्रगति के साथ-साथ सामाजिक न्याय और नैतिक मूल्यों को भी प्राथमिकता दे। अंतत: नई दिल्ली में आयोजित यह एआई समिट भारत के लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक अवसर है-एक ऐसा अवसर, जो भारत को वैश्विक तकनीकी नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ा सकता है। इस आयोजन की सफलता का वास्तविक मापदंड आने वाले वर्षों में दिखाई देगा, जब यह स्पष्ट होगा कि भारत ने इस मंच का उपयोग अपने तकनीकी और आर्थिक विकास के लिए किस हद तक किया।

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