नई सरकार की प्राथमिकताएं
बांग्लादेश में तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ले ली है। भारत द्वारा लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला इस समारोह में शामिल हुए हैं। विगत दिनों हुए आम चुनावों में बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी ने बहुत शानदार जीत प्राप्त की थी। 297 में से इस पार्टी ने 209 सीटें जीती थीं, जबकि वहां की कट्टर जमात-ए-इस्लामी पार्टी को 68 सीटें प्राप्त हुई हैं, परन्तु बांग्लादेश के इतिहास में यह पहली बार है कि इस कट्टर पार्टी को इतनी सीटें मिली हैं।
शपथग्रहण समारोह में तारिक रहमान ने कहा कि इस समय देश की सबसे बड़ी ज़रूरत शांति और राष्ट्रीय एकता है। यह भी कि बंटवारा लोकतंत्र को कमज़ोर करेगा, जबकि देश एक बुरी आर्थिकता, बिगड़ी कानून व्यवस्था और बेहद कमज़ोर हो चुकी संस्थाओं के दौर में से गुज़र रहा है। ओम बिरला ने भी वहां यह कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और मज़बूत देश बनाने के लिए बांग्लादेश के यत्नों का समर्थन करने के लिए तैयार है। इससे पहले बांग्लादेश में शेख हसीना के नेतृत्व वाली आवामी लीग का 15 सालों तक शासन रहा है। उससे पहले बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी की लम्बे समय तक खालिदा ज़िया की हुकूमत रही, जो तारिक रहमान की मां थीं। तारिक ने भी पिछले 17 साल इंग्लैंड में निर्वासन का समय काटा है। खालिदा ज़िया ने अपने समय में कट्टर इस्लामी पार्टी के साथ समझौता किया था, जिस कारण उस समय भारत के साथ बांग्लादेश के रिश्ते काफी हद तक बिगड़े रहे थे। जहां तक कि आवामी लीग का संबंध है, इसकी नेता शेख हसीना के लम्बे कार्यकाल में भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध मज़बूत रहे। आपसी रक्षा के मामले में पूरा सहयोग बना रहा।
हसीना ने अपने देश में से आतंकी ठिकानों को खत्म करने के लिए सख्त कदम उठाए। दोनों देशों में द्विपक्षीय लाभ वाली विकास योजनाएं पूरी की गईं और आर्थिक संबंध भी बेहद मज़बूत बने रहे। अगस्त, 2024 में उठी एक बड़ी विद्यार्थी लहर के कारण शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलट दिया गया। तथा उसके बाद अस्थायी रूप में सरकार के प्रमुख बने मोहम्मद यूनुस की डेढ़ वर्ष की सरकार के समय वहां अल्पसंख्यक हिन्दुओं को जगह-जगह हिंसा का निशाना बनाया गया। दर्जनों लोग इस हिंसा की भेंट चढ़ गए और हज़ारों ही आगज़नी, मार-पीट तथा सम्पत्तियां तबाह करने की घटनाएं सामने आईं। यूनुस सरकार इस घटनाक्रम के सामने बेबस हो गई थी। बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते बेहद करीबी हैं, दोनों देशों की भाषा साझी है। संस्कृति तथा परम्पराएं एक जैसी हैं। भारत ने ही इसके मुक्ति संग्राम के समय 1971 में पूरी मदद की थी और इसके बाद ही बांग्लादेश एक आज़ाद देश बना था। दोनों देशों के त्यौहारों में बड़ी समानता है। साहित्य, संगीत तथा खान-पान मिलता-जुलता है। दोनों का व्यापार उच्च स्तर का रहा है। दवाइयों, मशीनरी, खाद्य पदार्थ तथा कपड़े का आदान-प्रदान होता रहा है। बांग्लादेश ज़्यादातर ज़रूरतों के पक्ष से भारत पर निर्भर करता है। दोनों की आपसी सीमाएं जुड़ी हुई हैं। नदियां तथा जल प्रबंधन में भी आपसी सहयोग है, परन्तु इसके साथ-साथ नई सरकार के सामने अनेक चुनौतियां भी खड़ी हैं और उसकी सीमाएं भी दिखाई देती हैं।
अब नये प्रधानमंत्री के समक्ष कट्टर इस्लामिक पार्टियों से निपटना एक बड़ी चुनौती होगी। आर्थिक रूप में पिछड़े देश को विकास के मार्ग पर ले जा सकने के लिए भी पुख्ता योजनाबंदी की ज़रूरत होगी। चीन ने बांग्लादेश के आधारभूत ढांचे में भारी मात्रा में निवेश किया है। वह इस देश के साथ व्यापार को भी विशेष प्राथमिकता देने के लिए बड़े यत्न कर रहा है। भारत के साथ बांग्लादेश के आदान-प्रदान में बड़ा असंतुलन है। तीस्ता नदी के जल बंटवारे का विवाद अभी भी हल नहीं हो सका। शेख हसीना ने भारत में शरण ली हुई है। बांग्लादेश अनेक पक्षों से, विशेष कर घुसपैठियों तथा शरणार्थियों के मामले में पश्चिम बंगाल तथा असम के लिए बड़ी सिरदर्दी बना रहा है। आगामी समय में तारिक रहमान लगभग एक करोड़ अल्पसंख्यक हिन्दुओं की रक्षा करने तथा देश को कट्टर इस्लामिक मार्ग पर जाने से रोकने के लिए कितना सफल हो सकेंगे, यह देखने वाली बात होगी।
भारत से सहयोग तथा नए रिश्ते बनाने के मामले में भी उसे सचेत रूप में विचरण करना पड़ेगा। भारत को भी बांग्लादेश के प्रशासन की सीमाओं को समझते हुए उसके साथ रिश्तों में सुधार लाने के लिए बड़े कदम उठाने की ज़रूरत होगी।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

