कृत्रिम बौद्धिकता (ए.आई.) मानवतावादी हो

कृत्रिम बौद्धिकता अपने तरीके से आगे बढ़ रही है। हज़ारों लोग जो विभिन्न संस्थानों में कार्यरत थे, वहां से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। भारत जैसे देश में जहां बेरोज़गारी पहले से ही विकट समस्या है, कृत्रिम बौद्धिकता (ए.आई.) से और भी विकट हो जाएगी, हो रही है। आज का बड़ा सवाल केवल यह नहीं रह गया कि क्या ए.आई. (कृत्रिम बौद्धिकता) हम सभी से आगे निकल जाएगा? कितने ही क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें वह आगे निकल चुका है। क्या हम सामान्य ज्ञान से उसे हरा सकते हैं। दूसरा बड़ा सवाल ज़हन में आ रहा है कि क्या ए.आई. हम इन्सानों की जगह ले सकती है। उस मनुष्य से जिसने कभी भी हार को स्वीकार नहीं किया। अगर पराजित हुआ भी है तो अपने आप को सम्भाला है और जीवन संघर्ष में आगे बढ़ा है। अपनी राख से उठने, सम्भलने की हिम्मत, धैर्य है उसके पास। आज जो सबसे बड़ी चुनौती सामने आ रही है, वह यही है कि क्या हम ए.आई. में ऐसे बदलाव ला सकते हैं जो मनुष्य की ताकत बने, समृद्ध करें, कमज़ोर न बनाएं, जीवन पथ पर चलने में बाधक न बन कर, आगे बढ़ने में मदद कर पाएं।
ए.आई. पर बहुत कुछ कहा जा चुका है। शोर-शराबा भी खूब रहा। लेकिन आराम से बैठ कर सोचना होगा कि कितना कुछ दाव पर लग चुका है। विज्ञान की दीर्घकालीन प्रगति से मनुष्य के जीवन में अनेकानेक बदलाव आए हैं। अंधकार भरे जीवन में उजाला भर गया है। इस परिवर्तन कामी योगदान को कोई कैसे अस्वीकार कर सकता है? विज्ञान की सहायता से अरबों लोग अपनी गरीबी के दलदल को पार कर सके हैं। आज जिस स्थिति में हैं, वह आश्चर्यलोक से कम नहीं मानी जा सकती। बिजली से लेकर तुरंत कम्युनिकेशन तक क्या नहीं हुआ? कृत्रिम से बौद्धिकता इस विकास क्रम का अगला पायदान है। जिसकी क्षमता को विस्तार मिलना है। अगर हम इसका विकास मनुष्य के हित में करेंगे नहीं तो भारी नुकसान हो सकता है। किसी भी प्रकार की कोई गलती नुकसान पहुंचा सकती है। इस दिशा में काम कर रहे लोगों में से कोई भी संतोषजनक ढंग से यह नहीं बता पा रहा कि इसकी प्रणालियों पर नियंत्रण कैसे कर पायें? यह बड़े अचरज और असमंजस की स्थिति में है कि एक ताकतवर ऐतिहासिक तकनीक हमारे रू-ब-रू है परन्तु यह काबू में रह पाएगी या फिर नहीं? हमारी ही शक्ति हमारी शक्ति बनी रहेगी या कहीं कोई नुकसान पहुंचाएगी? जिन्होंने इसके बनने में मदद की है वे खुद इसकी ताकत और अनुमानित नुकसान को लेकर हतप्रभ है। क्या ए.आई. मानवीय जीवन की गुणवत्ता में कोई बड़ा सुधार लाने वाली है? हम इसके पहले चरण से आगे निकल चुके हैं। अब ऐसे सवालों का जवाब हमें तलाशना ही होगा। स्वप्न तो यही है कि एडवांसड ए.आई. को नियंत्रित, अलाइड और पूरी तरह जनहित में रखने के लिए क्या और कैसे किया जा सकता है? हमें हर कीमत पर इसे अनियंत्रित होने से बचाना है। जैसे ड्राइव करते हुए हम करते हैं कि वह स्पीड किस काम की जो नियंत्रण में न रह सके। सैकड़ों बेशकीमती जानें इसी तरह आत्मीयजनों का जीवन अंधकारमय कर गई। मानवतावादी ए.आई. की मांग इसलिए की जा रही है कि इतिहास सम्मत है। इतिहास ने मानवीय गरिमा बनाए रखने के लिए मानवतावादी परम्पराओं को शक्ति दी है। इस जज्बे से बना ए.आई. एक तो असाधारण लाभ देगा, दूसरे विनाशकारी जोखिम से भी बचा सकता है। एक जैसे पुख्ता दृष्टिकोण की ज़रूरत है, जो मानवीयता का पक्षधर रहे, रचनात्मकता बढ़ाये और हमारे पर्यावरण की हिफाजत भी करे।

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