‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद क्या आतंकी फिर दुस्साहस की फिराक में हैं ?
नवम्बर 2025 में दिल्ली में कश्मीरी आतंकवादियों द्वारा किए गए कार विस्फोट के बाद लगता है, आतंकी एक बार फिर से कश्मीर में किसी खौफनाक दुस्साहस की पटकथा लिखने की फिराक में हैं। इसकी सबसे बड़ी आशंका कश्मीरी पंडितों को 3 फरवरी 2026 से अब तक टारगेट किलिंग की मिल चुकी कई धमकियां हैं। गौरतलब है कि 5 फरवरी 2026 को गृहमंत्री अमित शाह की प्रस्तावित कश्मीर यात्रा के दो दिन पहले ही 3 फरवरी 2026 को आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के प्रॉक्सी ग्रुप द रेजिस्टेंस फोर्स यानी टीआरफ की तरफ से यह धमकी दी गयी। कश्मीरी पंडितों के लिए जारी धमकी वाला यह लेटर फाल्कन स्क्वाड के नाम से जारी किया गया, जिसमें लिखा है, ‘कश्मीरी पंडितो थोड़े फायदे के लिए बलि का बकरा मत बनो। तुम पहले ही देख चुके हो कि इस रास्ते पर चलने का अंजाम जान गंवाना होता है, जैसा राहुल पंडित, माखन लाल बिंदद्रू, मोहन लाल और बाकी के साथ हुआ था। इन्हें भी हमने कई बार चेतावनी दी थी, लेकिन उन्होंने नजरअंदाज कर दिया। तुम लोग उनकी तरह मत बनो। अपना नाम मरने वालों की लिस्ट में मत लिखवाओ।’
इसके अलावा 1990 के दशक में एक्टिव रहे ग्रुप मुस्लिम जांबाज फोर्स ने भी पोस्टर लगाकर कश्मीर की आजादी तक जंग जारी रहने की धमकी दी है। इन धमकियों के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने कश्मीरी पंडितों को अलर्ट रहने की हिदायत दी है। विशेषकर कश्मीरी पंडितों से कहा गया है कि वे अनजान नंबरों से आने वाले फोन न उठाएं, शाम होने से पहले घर आ जाएं। अजनबियों से दूर रहें। अंधेरे में बाहर न निकलें और कोई संदिग्ध दिखे, तो सुरक्षा एजेंसियों को तुरंत खबर करें। आतंकी धमकियों और उसके बाद सुरक्षा एजेंसियों की हिदायतों ने एक बार फिर उस सच्चाई को उजागर कर दिया कि आतंकवाद केवल एक क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि एक वैचारिक और रणनीतिक चुनौती है। विशेषकर ‘आपरेशन सिंदूर’ के बाद कश्मीर घाटी में लौटे कश्मीरी पंडितों को मिली धमकियों ने यह सवाल और गंभीर बना दिया है कि क्या तीन दशक के बाद भी उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकी है?
कश्मीरी पंडितों का विस्थापन 1990 के दशक की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक था, जब आतंकवादियों ने चुन-चुनकर उन्हें निशाना बनाया और घाटी से उनका लगभग पूर्ण पलायन हुआ। पिछले कुछ वर्षों में सरकार की पुनर्वास योजनाओं और सुरक्षा आश्वासनों के चलते हजारों पंडित परिवार वापस लौटे लेकिन नवम्बर 2025 में पहले दिल्ली विस्फोट और उसके बाद घाटी में जारी धमकियों ने इस पुनर्वास प्रक्रिया पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। धमकियों का यह नया दौर दरअसल भय का मनोवैज्ञानिक युद्ध है। हाल के महीनों में कई कश्मीरी पंडित कर्मचारियों, शिक्षकों और सरकारी कर्मियों को अज्ञात संगठनों की ओर से धमकी भरे पत्र, फोन कॉल और सोशल मीडिया संदेश मिले हैं। इन संदेशों में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि वे घाटी छोड़ दें या गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें।
आतंकवादी संगठनों की रणनीति हमेशा से रही है कि वे किसी बड़े हमले से ज्यादा भय का वातावरण बनाए रखें, जिससे समुदाय स्वयं असुरक्षित महसूस करके घाटी छोड़ने को मज़बूर हो जाए। यह रणनीति 1990 के दशक में सफल रही थी और अब फिर से उसी पैटर्न को दोहराने की कोशिश की जा रही है। सरकार द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे सुरक्षा अभियानों ने आतंकवादियों के कई नेटवर्क को कमजोर किया था। उम्मीद थी कि इससे आतंकवादियों का मनोबल टूटेगा और हिंसा में कमी आएगी लेकिन इसके विपरीत, हाल के महीनों में धमकियों और छोटे हमलों में वृद्धि देखी गई है। शायद इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जब आतंकवादी संगठनों की संरचना कमजोर होती है, तो वे अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए ‘हाई-विजिबिलिटी टारगेट’ चुनते हैं-ऐसे लक्ष्य जो प्रतीकात्मक रूप से अधिक प्रभावशाली हों। कश्मीरी पंडित, जो भारत की धर्मनिरपेक्षता और पुनर्वास नीति का प्रतीक हैं, ऐसे ही लक्ष्य बन जाते हैं।
इसके अलावा सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आतंकवादी अब ‘लो-कॉस्ट, हाई-इम्पैक्ट’ रणनीति अपना रहे हैं जिसमें बड़े हमलों की बजाय छोटे लेकिन मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावशाली हमले या धमकियां शामिल हैं। सरकार ने कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें सुरक्षित आवास, सरकारी नौकरियां और विशेष कॉलोनियों का निर्माण शामिल है। हजारों पंडित कर्मचारी इन योजनाओं के तहत घाटी में काम कर रहे हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि इन कर्मचारियों में से कई अब भी अलग-थलग कॉलोनियों में रहते हैं, जो उन्हें समाज से अलग और संभावित रूप से अधिक असुरक्षित बनाती हैं। कई मामलों में, स्थानीय स्तर पर सामाजिक एकीकरण की प्रक्रिया धीमी रही है, जिससे उनका अलगाव और असुरक्षा की भावना बढ़ती है। इसके अलावा जब भी घाटी में कोई आतंकी घटना होती है, तो सबसे पहले निशाने पर वही समुदाय आता है, जो पहले से ही कमजोर स्थिति में है।
कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाने का उद्देश्य केवल हिंसा फैलाना नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक और वैचारिक संदेश देना भी है। आतंकवादी संगठन यह दिखाना चाहते हैं कि घाटी अब भी ‘असुरक्षित’ है और भारत सरकार की पुनर्वास नीति विफल हो रही है। यह रणनीति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि को प्रभावित करने के उद्देश्य से अपनाई जाती है। जब अल्पसंख्यक समुदाय खुद को असुरक्षित महसूस करता है, तो यह सरकार की सुरक्षा नीति पर सवाल खड़े करता है। यह भी सच है कि पिछले दशक में घाटी में आतंकवाद के लिए स्थानीय समर्थन में कमी आयी है। बड़ी संख्या में स्थानीय युवाओं ने हिंसा का रास्ता छोड़कर शिक्षा और रोज़गार की ओर रुख किया है। लेकिन सीमापार से आने वाले आतंकवादी और उनके समर्थक अब भी सक्रिय हैं। इन आतंकवादियों का उद्देश्य केवल हिंसा करना नहीं, बल्कि यह दिखाना भी है कि वे अब भी प्रभावी हैं। इसलिए वे ऐसे लक्ष्यों को चुनते हैं, जिनसे अधिकतम मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा हो।
ऐसे में यदि सुरक्षा और सामाजिक विश्वास दोनों को मजबूत नहीं किया गया, तो पुनर्वास की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। लेकिन यह भी सच है कि आज की स्थिति 1990 के दशक से अलग है-सरकार अधिक सक्रिय है, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के प्रति सहिष्णुता कम हो गई है। फिर भी कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा केवल सैन्य या पुलिस बल से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके लिए सामाजिक विश्वास, राजनीतिक स्थिरता और स्थानीय स्तर पर सामंजस्य जरूरी है। आतंकवाद का अंतिम उद्देश्य केवल हिंसा नहीं, बल्कि समाज को विभाजित करना है। यदि कश्मीरी पंडित घाटी में सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकते हैंए तो यह आतंकवाद की सबसे बड़ी हार होगी। इसलिए आज आवश्यकता केवल आतंकवाद को हराने की नहींए बल्कि उस भय को हराने की हैए जो आतंकवाद का सबसे बड़ा हथियार है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



