हर साल आठ लाख गुमशुदगी पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता 

आखिर हर साल वो लाखों बच्चे अवयस्क लड़कियां महिलाएं कहां चली जाती है जिन्हें गुमशुदगी के बाद हमारी पुलिस और तंत्र खोजने में नाकाम बना रहता है। शीर्ष अदालत ने खुद चिंता व्यक्त की है। देश में हर साल करीब आठ लाख लोग लापता हो जाते हैं, जिनमें ज्यादातर बच्चे, महिलाएं और लड़कियां शामिल होती हैं ऐसा हम नहीं कह रहे राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बता रहे हैं लेकिन इनकी बरामदगी में सरकारी तंत्र निकम्मा और अक्षम साबित हो रहा है। इस वर्ष जनवरी के पहले पखवाड़े में दिल्ली से आठ सौ से अधिक लोगों के लापता होने की खबरों ने इस मामले की गंभीरता को फिर से उजागर किया है लेकिन चिंता की बात है कि इस आपराधिक समस्या से निपटने के लिए अब तक राष्ट्रीय स्तर पर कोई एकीकृत प्रयास होते नज़र नहीं आए हैं। यहां तक कि लापता होने की घटनाएं और उनमें से कितने लोगों को ढूंढ़ लिया गया तथा ऐसे मामलों के पीछे किसका हाथ था, इसका एकीकृत राज्यवार ब्योरा भी मुश्किल से दर्ज हो पाता है।
आपको बता दें हाल ही में देश के अलग-अलग हिस्सों से बच्चों के गायब होने की बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जताई है। अदालत ने मंगलवार को केंद्र सरकार से यह पता लगाने को कहा किए बच्चों के लापता होने की घटनाओं के पीछे कोई देशव्यापी नेटवर्क है या राज्य-विशिष्ट ग्रुप तो काम नहीं कर रहा है।
इस मसले की गंभीरता का अंदाजा राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट से लगाया जा सकता है, जिसके मुताबिक वर्ष 2023 में देश भर में आठ लाख से ज्यादा लोग लापता हुए थे। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में यह समस्या ज्यादा गंभीर है। ऐसे में ज़रूरी है कि हर राज्य अपनी जिम्मेदारी को समझे और लापता होने के मामलों में तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। अगर कहीं कोई लापरवाही बरती जाती है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए ताकि व्यवस्था में आम लोगों का भरोसा कायम रह सके।
यह मामला जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच के सामने सुनवाई के लिए आया। बेंच ने पूछा, ‘हम जानना चाहते हैं कि क्या इन घटनाओं के पीछे कोई देशव्यापी नेटवर्क या राज्य-विशिष्ट ग्रुप है, जहां बच्चे लापता होते हैं। बेंच ने पूछा किए क्या यह एक पैटर्न है या बस एक रैंडम घटना है। बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि यह पता लगाने की ज़रूरत है कि क्या इन घटनाओं के पीछे कोई पैटर्न है या ये रैंडम हैं, और केंद्र से सभी राज्यों से डेटा इकट्ठा करने को कहा। बेंच ने सुझाव दिया कि केंद्र उन बच्चों का इंटरव्यू ले सकता है जिन्हें बचाया गया है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ऐसी घटनाओं के लिए कौन जिम्मेदार है। केंद्र की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि कुछ राज्यों ने लापता बच्चों और अभियोग पक्ष के बारे में अपना डेटा दिया है। हालांकि भाटी ने बताया कि करीब एक दर्जन राज्यों ने अपना डेटा नहीं दिया है। इस बात पर ज़ोर दिया कि केंद्र के पूरा डेटा मिलने के बाद विश्लेषण किया जा सकता है। शीर्ष अदालत की बेंच ने उन राज्यों से नाराज़गी जताई जिन्होंने डेटा नहीं दिया है, और कहा कि ज़रूरत पड़ने पर वह कड़े आदेश दे सकती है। वकील अपर्णा भट्ट ने कहा कि केंद्र ने पहल की है और सभी राज्यों को डेटा देने का निर्देश दिया जाना चाहिए।
आपको पता रहे सुप्रीम कोर्ट ने ये बातें एक एनजीओ ‘गुरिया स्वयं सेवी संस्थान’ की याचिका पर सुनवाई करते हुए कही। इस याचिका में कई राज्यों में लापता बच्चों की बढ़ती संख्या पर जोर दिया गया था। पिछले साल दिसम्बर में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया था कि वह लापता बच्चों का देश भर में छह साल का डेटा दे और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ ऐसे डेटा को इकट्ठा करने में असरदार तालमेल पक्का करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय में एक खास अधिकारी नियुक्त करे। दरअसल पिछले वर्ष दिसंबर में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को लापता बच्चों के सिलसिले में छह साल के राष्ट्रव्यापी आंकड़े उपलब्ध कराने और ऐसे आंकड़ों के संकलन में राज्यों के साथ प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करने को कहा था। इससे पहले राज्यों को बच्चों की गुमशुदगी के मामलों की निगरानी के लिए नोडल अधिकारियों की नियुक्ति का निर्देश भी दिया गया था। इसके बावजूद अगर राज्यों की ओर से संबंधित ब्योरा उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है, तो इससे सरकारी तंत्र में व्यवस्थागत खामियों का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। इससे पहले बेंच ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को लापता बच्चों के मामलों की निगरानी के लिए खास नोडल अधिकारी नियुक्त करने और यह पक्का करने का निर्देश दिया था कि ऐसी जानकारी महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा चलाए जा रहे पोर्टल पर तुरंत अपलोड की जाए। पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने एक न्यूज रिपोर्ट पर चिंता जताई थी, जिसमें दावा किया गया था कि देश में हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है। उसने इसे एक गंभीर मुद्दा बताया था। देश की राजधानी दिल्ली समेत विभिन्न राज्यों में विशेषकर बच्चों, महिलाओं और लड़कियों के लापता होने की घटनाएं जितनी बड़ी संख्या में सामने आ रही हैं, उससे इस आशंका को दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि इसके पीछे देशव्यापी या राज्य स्तरीय गिरोहों का हाथ हो सकता है। इसलिए इस बात की गहन जांच जरूरी है कि लापता होने की ज्यादातर घटनाओं में किसी तरह कोई समानता तो नहीं है! मगर यह तभी संभव होगा, जब राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे मामलों से जुड़े आंकड़ों का संकलन हो पाएगा। आशंका है कि इन गुमशुदगी की बढ़ती तादाद के पीछे मानव तस्करी मानव अंगों की तस्करी और अवैध अंग प्रत्यारोपण तथा देह व्यापार में लिप्त अपराधियों के गिरोहों का संगठित नेटवर्क जुड़े हुए हैं। सरकार को इन घटनाओं को नियंत्रित करने के लिए कठोरतम कदम उठाने चाहिए। 

मो. 9219179431

#हर साल आठ लाख गुमशुदगी पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता