असुरक्षित होते खाद्य-पदार्थ

पंजाब में खाद्यान्न पदार्थों में बड़े स्तर पर हो रही मिलावट और मानव-उपयोग हेतु इनकी बढ़ती असुरक्षा ने भावी पीढ़ियों की सुरक्षा संबंधी चिन्ताओं को बहुत बढ़ा दिया है। खाद्यान्न पदार्थों की असुरक्षा का आलम यह है कि एक सर्वेक्षण के अन्तर्गत विभिन्न पदार्थों के लिए गये नमूनों में से कुल 18 प्रतिशत पहली ही कसौटी पर विफल सिद्ध हुए हैं। खाद्यान्न सुरक्षा एवं स्टैंडर्ड अथारिटी ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार पंजाब एवं हरियाणा में खाद्यान्न पदार्थों के स्तर और इनकी गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर जांच की जाती रहती है, और इसके लिए उत्तरदायी पाये जाते लोगों एवं कम्पनियों के विरुद्ध समुचित कार्रवाई भी की जाती है। रिपोर्ट के अनुसार यूं तो खान-पान में प्रयुक्त होने वाले अधिकतर पदार्थों में मिलावट पाई जाती है, किन्तु दूध, खोया, पनीर, मसालों एवं दालों में की जाने वाली मिलावट बहुत हानिकर सिद्ध होती है। यहां तक कि दूध, दही और पनीर में मिलाये जाने वाले तत्व काफी विषाक्त और कैमिकल-जनित होते हैं जो मानव-स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकर होते हैं। बच्चों के लिए तो यह मिलावटी दूध और इनसे बने दुग्ध-पदार्थ पूरी तरह से हानिकर होते हैं जो कालांतर में उनके लिए अनेकानेक शारीरिक व्याधियों का कारण बनते हैं। ऐसे दुग्ध-पदार्थों में से बनने वाली मिठाइयों और लस्सी-मक्खन में भी ऐसे तत्व पूरी तरह से पाये गये हैं। मिलावट-युक्त पदार्थों के बढ़ते संजाल में अब बड़े लोकप्रिय पदार्थ चॉकलेट और पेय पदार्थ भी शुमार हो गये हैं।
फूड सेफ्टी की इस रिपोर्ट के अनुसार बेशक मिलावटी और घटिया स्तर के पदार्थों की यह समस्या देश के कई अन्य राज्यों में भी है, किन्तु पंजाब और हरियाणा से एकत्रित किये गये नमूनों में से 18 से 20 प्रतिशत तक नमूने विफल पाये गये हैं। यह भी, कि हरियाणा में इस समस्या को अधिक गहराई से महसूस किया गया है। हरियाणा के जिन क्षेत्रों में यह समस्या पाई गई है, वे कई राज्यों से सटे होने के कारण राष्ट्रीय राजदानी दिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों, पड़ोसी राज्य राजस्थान, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि में भी ऐसे मिलावटी एवं असुरक्षित पदार्थ बड़ी मात्रा में पाये गये हैं। हरियाणा में तो वर्ष 2024-25 में 22 प्रतिशत नमूने विफल हुए पाये गये थे। कुल 2233 नमूनों से 500 से अधिक मानव के खाने-योग्य भी नहीं पाये गये थे। हिमाचल प्रदेश में भी इस समस्या के नाखून गढ़े पाये गये हैं। इसी वर्ष हिमाचल प्रदेश में लिये गये 1587 नमूनों में से 293 फेल पाये गये थे। जम्मू-कश्मीर बेशक इस मामले में थोड़ा सुरक्षित रहा है, किन्तु ऐसे मिलावटी और असुरक्षित पदार्थों की सुगबुगाहट तो वहां भी सुनाई दी है।
इस रिपोर्ट का एक तथ्य यह भी बड़ा अहम है कि मिलावट पुराने ज़मानों और पुरानी सरकारों के दौर में भी होती रही है, किन्तु विगत तीन-चार दशकों से यह रोग ला-इलाज होता जा रहा है। यहां तक कि थोड़े-से अतिरिक्त लाभ एवं लालच के वशीभूत ऐसे असामाजिक तत्व दूध, खोया और पनीर में कैमिकल-जनित तत्वों, कपड़े धोने वाला कास्टिक सोडा और गंदा पानी तक मिलाने लगे हैं। यह दूध और पनीर चूंकि मिठाइयों आदि में प्रयुक्त होता है, अत: इसके ़खतरे का प्रसार द्विगुणित होने लगता है। मिलावट का एक खतरनाक रूप मसालों, दालों और चावलों में भी पाया गया है। मसालों में जानवरों की लीद और दालों में जंगली पौधों के विषाक्त एवं हानिकर बीज मिलाये जाते हैं। सब्ज़ियों और दवाओं में बड़े स्तर पर प्रयुक्त होने वाली महंगी काली मिर्च भी मिलावट के इस जिन्न से सुरक्षित नहीं रही है। यहां तक कि नमक जैसा अति सामान्य पदार्थ भी मिलावट के रोग से अछूता नहीं रहा है। कृषि हेतु प्रयुक्त होने वाली खादों और बीजों में पाई गई मिलावट ने तो सर्व-पक्षीय हानिकर स्थिति पैदा कर दी है। कृषि-उत्पन्न पदार्थों, फलों और फूल-पत्तियों में भी मिलावट के इस रोग के लक्षण पाये गये हैं।
हम समझते हैं कि नि:संदेह यह एक ऐसी समस्या हो गई है जिसका आकार निरन्तर बड़े से बड़ा होता जा रहा है। आज सम्भवत: कोई भी ऐसा क्षेत्र दिखाई नहीं देता है जो मिलावट के इस रोग से अछूता पाया गया हो। बेशक सरकारें और प्रशासनिक तंत्र इस समस्या पर नकेल कसने हेतु सदैव सक्रिय रहते हैं, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रकार के असामाजिक कृत्य से सम्बद्ध लोगों के हाथ कानून से भी लम्बे हैं। प्रत्येक कार्रवाई के बाद वे कोई नया और नायाब तरीका मिलावट के लिए ढूंढ लेते हैं। हम समझते हैं कि इस प्रकार के कृत्यों के विरुद्ध कानून के साथ नैतिक अंकुश भी उतना ही ज़रूरी है। मिलावट करने वाले लोगों को समझना चाहिए कि इस प्रकार के कृत्यों से दांव पर लगने वाली पीढ़ियों में कुछ सन्तानें उनकी अपनी और अपनों की भी हो सकती हैं। तथापि, कुछ भी हो, और कैसे भी हो, मिलावट के इस नागपाश पर अंकुश लगाना बहुत ज़रूरी है।

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