क्या ए.आई. से किसानों की तकदीर बदल जाएगी ?

भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले कृषि क्षेत्र के लिए केंद्रीय बजट-2026 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) को एक गेम चेंजर के रूप में पेश किया है। अपने बजट भाषण में उन्होंने ‘भारत विस्तार’ नामक एक बहुभाषी ए.आई. प्लेटफॉर्म की घोषणा की। सवाल यह है कि क्या यह तकनीक वाकई भारत के लगभग 14 करोड़ किसानों की तकदीर बदल सकेगी, या यह महज एक और सरकारी घोषणा बनकर रह जाएगी?
बजट 2026 में कृषि क्षेत्र के लिए 1.62 लाख करोड़ रुपये से अधिक का आवंटन किया गया है, जो पिछले वर्ष से लगभग 7 प्रतिशत अधिक है। इसमें सबसे उल्लेखनीय है ‘भारत विस्तार’ प्लेटफॉर्म की स्थापना। यह एक बहुभाषी ए.आई. टूल है जो एग्री स्टैक पोर्टल और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की सत्यापित कृषि पद्धतियों को ए.आई. सिस्टम के साथ एकीकृत करेगा। इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता, जलवायु परिस्थितियों और फसल के आधार पर वैयक्तिकृत कृषि सलाह मिलेगी। मौसम का सटीक पूर्वानुमान, कीट और रोग प्रबंधन, बाज़ार की जानकारी और क्षेत्रीय भाषा समर्थन भी इसके प्रमुख फीचर्स हैं। इसके अतिरिक्त ‘कृषि साथी’ नामक ए.आई. चैटबॉट की भी घोषणा की गई है, जो वॉयस और वीडियो के माध्यम से किसानों के सवालों का जवाब देगा।
आधुनिक तकनीक और ए.आई. के सही इस्तेमाल से कृषि क्षेत्र में कई सकारात्मक बदलाव संभव हैं। ए.आई. आधारित सिस्टम यह बता सकता है कि किस खेत के किस हिस्से में कितना पानी, उर्वरक या कीटनाशक चाहिए, जिससे लागत में 20-30 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। समय पर सही जानकारी मिलने से फसल उत्पादकता में वृद्धि होगी। मौसम का सटीक पूर्वानुमान, बीमारियों की शीघ्र पहचान और बाज़ार की सही जानकारी से किसान बेहतर फैसले ले सकेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे उपज में 15-25 प्रतिशत तक की वृद्धि संभव है। जोखिम प्रबंधन में भी सुधार होगा। ए.आई. सिस्टम ऐतिहासिक डेटा और वर्तमान परिस्थितियों के विश्लेषण से फसल विफलता के जोखिम को पहले से भांप सकता है और निवारक उपाय सुझा सकता है। यह खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जो एक ही फसल पर निर्भर रहते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म किसानों को सीधे खरीदारों से जोड़ सकते हैं, बिचौलियों की भूमिका कम कर सकते हैं और किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिला सकते हैं।
हालांकि, ए.आई. की इन संभावनाओं के बावजूद भारतीय कृषि क्षेत्र में इसके व्यापक कार्यान्वयन में कई गंभीर चुनौतियां हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। भारत के छोटे और सीमांत किसानों में डिजिटल साक्षरता की गंभीर कमी है। अधिकांश किसान स्मार्टफोन का बुनियादी उपयोग तो कर लेते हैं, लेकिन ए.आई.-आधारित जटिल एप्लिकेशन का इस्तेमाल करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगा। अनेक गांवों में अभी भी मोबाइल कनेक्टिविटी और इंटरनेट की सुविधा नहीं है। जहां इंटरनेट उपलब्ध है, वहां भी कनेक्टिविटी अस्थिर और धीमी है। बिना मज़बूत डिजिटल अवसंरचना के ये सारी योजनाएं कागज़ पर ही रह जाएंगी। हालांकि सरकार ने प्रधानमंत्री वाई-फाई एक्सेस नेटवर्क इंटरफेस और भारत नेट परियोजना के माध्यम से ग्रामीण कनेक्टिविटी बढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इनका कार्यान्वयन अभी भी अपर्याप्त है।
ए.आई.-आधारित समाधानों को अपनाने के लिए ड्रोन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स सेंसर, स्मार्टफोन और अन्य उपकरणों में महत्वपूर्ण निवेश की आवश्यकता होती है। छोटे और सीमांत किसान इस तरह के निवेश का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। उनकी औसत वार्षिक आय ही इतनी कम है कि वे मूलभूत कृषि आदानों के लिए कज़र् पर निर्भर रहते हैं। छोटे किसानों तक पहुंचने के लिए इन योजनाओं को और अधिक समावेशी और सुलभ बनाना होगा।
ए.आई. सिस्टम के लिए किसानों का व्यक्तिगत और कृषि संबंधी डेटा एकत्र करना आवश्यक है। लेकिन इस डेटा की सुरक्षा और गोपनीयता को लेकर गंभीर सवाल हैं। किसानों की जमीन, फसल, आय और अन्य संवेदनशील जानकारी का दुरुपयोग हो सकता है। भारत में व्यापक डेटा संरक्षण कानून का अभाव इस चिंता को और बढ़ाता है। स्वचालन और ए.आई. के बढ़ते उपयोग से कृषि क्षेत्र में रोज़गार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है। यदि मशीनें और ए.आई. मानव श्रम का स्थान लेने लगें, तो लाखों खेत मजदूरों के लिए यह अस्तित्व का संकट बन सकता है।
इन चुनौतियों को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि बजट 2026 में घोषित एआई पहल अकेले किसानों की तस्वीर बदल देगी। हां, इसमें संभावनाएं ज़रूर हैं, लेकिन इन संभावनाओं को हकीकत में बदलने के लिए बहुत कुछ करना होगा। 

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