विकास के साथ-साथ ज़रूरी है पर्यावरण सुरक्षा

इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि देश को आगे बढ़ना है तो औद्योगिक उपक्रमों, बड़े कारखानों और व्यापारिक संस्थानों को बढ़ावा देना होगा। इसी के साथ ज़रूरी यह है कि यदि इसके लिए नियमों की अनदेखी करते हुए पर्यावरण संरक्षण के लिए बने कानूनों की बलि दी गई और जन स्वास्थ्य का ध्यान रखें बिना कुछ किया गया तो यह वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए खतरनाक होगा।
नियमों का उल्लंघन
जब कोई बड़ी परियोजना बनती है तो यह देखा जाता है कि इससे कितने लोगों को रोज़गार मिलेगा, गरीबी में कितनी कमी आएगी और कितने पैमाने पर ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होगा। इसके लिए सरकार का उन पाबंदियों को तिलांजलि देना हानिकारक होगा, जिनसे लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा होती है, प्रदूषण से बचाव होता है, वनों की गैर-ज़रूरी कटाई नहीं होती और ज़मीन के उपजाऊ तत्व नष्ट नहीं होते। पर्यावरण संरक्षण के नियमों के विरुद्ध किया गया औद्योगिक विकास तब बेमानी हो जाता है जब उससे विषैले पदार्थ पास की नदियों, नालों में बहकर बड़े स्तर पर जल प्रदूषित करते हैं। इसी तरह वायु में धुएं के रूप में विषाक्त कण लोगों की सांस की बीमारियों का कारण बनते हैं तो यह घातक हो जाता है। पर्यावरण का नुकसान एक बार हुआ तो उसका कोई निदान न होने से जीवन भर के लिए व्यक्ति को इसके कारण हुई परेशानी और बीमारी से जूझना पड़ता है। एक बार वन विनाश हुआ और इससे संबंधित जैविक संपदा नष्ट हुई तो उसे दोबारा प्राप्त करना असंभव है।
इसी तरह एक बार बिगड़ा इकोसिस्टम फिर से ठीक नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए यदि बिना सोचे समझे जंगलों का सफाया होता है तो यह भविष्य के लिए विनाशकारी होगा। वनों को दोबारा पनपने में दशकों से लेकर सदियां तक लग जाती हैं। देश की औद्योगिक प्रगति से आर्थिक सम्पन्नता और समृद्धि का रास्ता तो खुल जाता है लेकिन इसकी कीमत युवाओं के स्वास्थ्य की गिरावट के रूप में चुकानी पड़े तो यह अक्लमंदी नहीं है। एक समस्या और है जिसके कारण अधिकतर परियोजनाएं समय पर पूरी इसलिए नहीं होतीं या उन्हें बीच में ही रोक दिया जाता है क्योंकि कहीं ज़मीन का अधिग्रहण करने में अनेक वर्ष निकल जाते हैं और कहीं एनजीटी द्वारा उन्हें पर्यावरण के लिए नुकसानदेह मान कर रोक दिया जाता है।
विकास किस कीमत पर
आर्थिक प्रगति, सामाजिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए कोई भी परियोजना बनाई जाएगी तो वह समय पर तो पूरी होगी ही, साथ में गरीबी, असमानता और बेरोज़गारी का हल निकालने में भी सहायक होगी। इससे ही जुड़े अन्य क्षेत्रों में भी सुधार होगा जैसे कि शिक्षा, साफ जल और स्वच्छता के साधन उपलब्ध होना। इससे सही दिशा में आगे बढ़ने में सहायता मिलेगी। दलदली क्षेत्रों और रेगिस्तान बनते जा रहे इलाकों की स्थिति में सुधार होगा। यह सभी बातें एक दूसरे के साथ जुड़ी हुई हैं इसलिए किसी एक को भी छोड़ना या उस ओर ध्यान न देना विनाशकारी होगा।
इसके अनेक उदाहरण हैं लेकिन हमारे नीति निर्माताओं ने उन पर ध्यान नहीं दिया और उन दुर्घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा। भोपाल गैस त्रासदी, उपहार सिनेमा में हुआ हादसा, तेलंगाना में रासायनिक विस्फोट, दिल्ली में मुंडका फैक्ट्री में हुआ अग्निकांड, कोलकाता में एएमआरआई अस्पताल में आग लगना, कोडईकैनाल में मर्करी का रिसाव, विशाखापत्तनम में एक पॉलीमर फैक्ट्री में गैस रिसाव, यह कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनमे नियमों की अनदेखी की गई और लाखों लोगों को जीवन भर के लिए अपंग होना पड़ा। न जाने कितनों को अब तक अपने दैनिक कामकाज़ में प्रतिदिन शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में हो रही दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। यह सब इसलिए होता है क्योंकि नियमों का पालन नहीं हुआ, कानून लागू करने में ढिलाई बरती गई और जिन अधिकारियों की लापरवाही से यह हुआ, उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसका कारण सरकारी महकमों में फैला भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भी है।
विकास की परिभाषा
माननीय सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का भी कोई असर नहीं है जो उन्होंने कुछ मामलों में ज़मीन के उपयोग या लैंड यूसेज बदलने में सुरक्षा मानकों के पालन न करने पर दी थी। उनके आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि जन स्वास्थ्य और पर्यावरण की कीमत पर कोई भी औद्योगिक विकास नहीं हो सकता। जब तक इनकी सुरक्षा के लिए उचित प्रबंध नहीं किए जाते तब तक कोई भी गतिविधि नहीं की जा सकती। कर्मचारियों और कामगारों की सेहत का ध्यान रखे बिना कोई भी निर्माण नहीं किया जा सकता। 
भविष्य में इस प्रकार की कोई स्थिति नहीं होनी चाहिए जिसका असर उस प्रोजेक्ट में काम करने वाले लोगों की सेहत पर हो। यदि सभी आवश्यक कार्रवाई और प्रावधान योजना बनाते समय पूरे कर लिए जाएं तो फिर उसके समय पर पूरा होने में कोई समस्या नहीं होती। विकास अपने आप में कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिस का व्यापार किया जा सके। यह तब ही हो सकता है जब किसी भी प्रकार का प्रदूषण न हो, प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग और इकोसिस्टम पर विपरीत असर न हो।
हमारे यहां ऊज़र्ा और विद्युतीकरण परियोजनाओं को लेकर अक्सर विवाद होता रहता है। इन्हें स्थापित करने से पहले जल, जंगल और ज़मीन से जुड़ी सभी समस्याओं पर पहले ही विचार न करने और उनसे होने वाली परेशानियों से निपटने के उपाय न किए जाने से उनके बीच में बंद होने की स्थिति पैदा हो जाती है। इतना ही नहीं, अनियमित होने से होने वाली हानि की अनदेखी किए जाने से आर्थिक नुकसान भी होता है। यहां एक और बात का ज़िक्र करना भी आवश्यक है और वह है राजनीतिज्ञों का अनावश्यक दखल जिनके अपने स्वार्थ होते हैं जिनके पूरा न होने से विरोध से लेकर श्रमिक आंदोलन तक हो जाता है जिसके कारण बहुत सी लाभकारी योजनाएं ठंडे बस्ते में पड़ जाती हैं। यह न भी हो तो फिर घोटालों का सूत्रपात हो जाता है। एक ही व्यक्ति या उसकी कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों की अवहेलना की जाती है जिसके कारण समर्थन या विरोध का माहौल बन जाता है जिसके परिणामस्वरूप वह स्कीम ही रोक या बदल दी जाती है।
भारत ने हाल में बहुत से देशों और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों से करार या समझौते किए हैं जिनकी पूर्ति तब ही हो सकती है जब हम अपने मानव संसाधनों और उपलब्ध सुविधाओं का सही तरीके से इस्तेमाल करें ताकि कोई हम पर तैयारी न होने का आक्षेप न लगा सके। अगर ऐसा होता है तो हमारी छवि खराब हो सकती है और हमें बदनामी झेलनी पड़ सकती है जिसका असर हमारी आर्थिक स्थिति पर पड़ेगा और हम विकसित देशों की श्रेणी में नहीं आ पाएंगे।

#विकास के साथ-साथ ज़रूरी है पर्यावरण सुरक्षा