तुझे कोई न मारेगा गुलेल
रात को आये तूफान ने वृक्षों की शाखाओं को तोड़ डाला था।
गौरैया का घोंसला भी बिखर गया था। गौरैया पूरी रात पत्तों में छुप कर बैठी रही। गरजते बादल जैसे फटने पर आमदा थे। गौरैया बादलों को विनती करती रही, ‘भाईयो! मेरी जान का ध्यान रखना।’ बादल भी शायद उस की बिनती सुन कर आगे निकल गये थे। भोर हुई तो सूर्य की गर्माहट से गौरैया में फुर्ती आ गई। वह नये घोंसले की जगह देखने के लिये दूर उड़ गई। रास्ते में उसे एक बरगद दिखाई दिया। घने हरे पतों व टहनियों ने उसका मन मोह लिया। वह बरगद की शाखा पर जा बैठी। सोचने लगी, ‘यहां पक्षियों के काफी घर होंगे। पर घोंसला कोई दिख नहीं रहा।’ गोरैया इधर उधर देखने लगी। इतने में बरगद के पत्तों में से एक आवाज़ सुनाई दी, ‘ओ गौरैया! मेरी शाखाओं पर किसी पक्षी का घर नहीं है। तू भी यहां घर बनाने को ताक रही हो क्या?’
‘इतना भारी वृक्ष होकर एक हल्के फुलके पक्षी को तू आश्रय नहीं दे सकता?’ गौरैया ने उसे उलाहना दिया।
‘मैं तो चाहता हूँ कि मेरी शाखाओं पर पक्षी चहचहायें, गीत गायें, मस्ती करें।’ बरगद बोला।
‘तो मुझे रोकते क्यों हो?’
‘गौरैया जो तेरा मन है कर।’ बरगद चुप्प हो गया।
गौरैया बरगद की सहमती मिलते ही, उडारी से फुर्र हुई व शीघ्र अपनी चोंच से घोंसला बनाने के लिये सामान एकत्रित करने लगी। घास फूस धागे, रूईयां इक्ट्ठा कर लीं। अभी वह सामान इक्ट्ठा कर ही रही थी कि उसने देखा कि उसका अधबना घोंसला नीचे बिखरा पड़ा था। गौरैया को अत्यंत दु:ख हुआ। उसको बरगद पर गुस्सा आया कि बरगद के मन में खोट थी। फिर वह तेज़ चलती वायु से रोष जताने लगी।
‘चुप हो जाओ गौरैया।’ वायु ने कहा।
‘क्यों चुप रहूँ? मेरा घर बिखर गया। पहले भी और अब भी।’
‘तेरे से मेरी कोई शत्रुता नहीं।’ वायु ने कहा।
‘कार्य तो तेरा शत्रुता जैसा ही है।’ गौरैया ने गुस्सा उगला।
‘देख गौरैया, मैं दिन और रात को जागती रहती हूं। आस-पास क्या होता है, मुझे सब मालूम है।’ वायु ने बताया।
‘क्या होता है, मुझे भी पता चले।?’ गौरैया पूछने लगी।
‘जिस शाखा पर तू घर बना रही हो, वहां रात को एक अजगर आता है। इसी मोटी शाखा से लिपट कर सो जाता है।’ वायु ने जानकारी दी।
‘सचमुच... अ्जगर...?’ गौरैया ने आश्चर्य से पूछा।
‘हां सचमुच में अजगर। कल एक तोता अपने बच्चे लेकर इस शाखा की खोल में ले आया था। रात को वह अजगर तोते के पूरे परिवार को निगल गया। ‘वायु ने संक्षिप्त में बताया। चारों और एक चुप्पी सी छा गई। फिर वायु बोल, ‘बच्चों के लुप्त हो जाने का दर्द कुछ असह्य होता है।’
गौरैया वायु के गले लग कर सिसकने लगी, ‘मैं अब घर कहां बनाऊं, तुम ही बताओ?’
‘खेत में एक शहतूत का वृक्ष है।’ वायु बताने लगी।
‘मैं खेत में घर बनाना नहीं चाहती।’ गौरैया ने तुरंत उत्तर दिया।
‘क्यों, उस भारी पेड़ पर कई पक्षियों के घोंसले हैं?’
‘मुझे यह खेत पक्षियों का मरघट सा लगता है।’
‘ऐसा क्यों?’ वायु ने पूछ लिया।
‘मेरा साथी ऐसे ही एक खेत में कीटनाशक खाकर मर गया था। पूरा एक वर्ष होने को है, मैं कभी किसी खेत में नहीं गई।’ गौरैया ने अपना दु:ख बताया।
‘तो फिर सामने बगिया में घोंसला बना ले। वहां बहुत से पक्षियों के घर हैं।’ वायु ने पुन: मशवरा दिया।
‘वहां माली गुलेल से पत्थर द्वारा प्रहार करता है।’ गौरैया ने सुनी सुनाई अशंका व्यक्त की।
‘जो पक्षी फलों को ज्यादातर खराब करते हैं, तभी गुलेल से पत्थर का शिकार बनते हैं। पेट भरने के लिये फल खाते हैं तो कोई पक्षियों को नहीं मारता। तेरे पर कोई प्रहार नहीं करेगा।’ वायु ने उसे हौंसला दिया।
‘मेरे साथ वाली गौरैया भी यही कहती थी कि माली के पास बारीक गोलियां वाली एक बंदूक है। जिस से पक्षी मर जाते हैं।’
‘गौरैया को कोई गुलेल या बंदूक से नहीं मारता। गौरैया तेरे बाप दादा इन लोगों के घरों में रहते थे। मनुष्य तुझ से प्रेम करता है।’ वायु ने पूरी बात गौरैया को समझाई।
आंखों ही आंखों में वायु को धन्यवाद देती गौरैया बोली, ‘तुने मुझे सही मार्ग दिखाया है। मैं अभी घोंसले का सामान इकट्ठा करना शुरू करती हूँ।’
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