हमारी मज़बूती ट्रम्प की परेशानी

भारत-पाकिस्तान युद्ध रुकवाने में ट्रम्प की भूमिका का ट्रम्प ने बार-बार उल्लेख किया। भारत की तरफ से बिल्कुल स्पष्ट बता दिया गया कि इस युद्ध को रुकवाने में किसी देश की कोई भूमिका नहीं रही। ट्रम्प ने टैरिफ धमाके से भारत को धमकाना चाहा जिसकी भारत ने परवाह नहीं की। अब सवाल यह उठाया जा रहा है कि ट्रम्प की भारत को लेकर चाहत क्या है? क्या उन्हें व्यापारिक सौदा चाहिए? नोबेल पुरस्कार के लिए अनुमोदन? या सिर्फ अटेंशन? इसका जवाब सरल नहीं है। शायद ट्रम्प के लिए भी? क्योंकि विरोधाभास बहुत है। कहीं कोरी कल्पना भी।
एक खबर के अनुसार अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ आपराधिक मुकद्दमे दाखिल करने वाले वकील और अफसर मुश्किल में हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव राजधानी वाशिंगटन के अटॉर्नी आफिस पर पड़ा है। वहां कई वकील इस्तीफा दे चुके हैं। लगभग बीस वर्ष से कार्यरत सीनियर प्रॉसीक्यूटर को निकाल दिया गया है। ट्रम्प उन लोगों से चुन-चुन कर बदला ले रहे हैं, जिन्होंने उनके एवं सहयोगियों के खिलाफ मामले पेश किए हैं। ट्रम्प देश के अन्दर और बाहर सहज नहीं हैं। अपने से ऊपर भी नहीं उठ पा रहे।
एक सी.ई.ओ. समिट में बोलते हुए ट्रम्प हमेशा की तरह पटरी से उतर गये। कारोबार की बात करते-करते भू-राजनीति की गलियों में भटक गए। उन्होंने भारत और पाकिस्तान को ऐसी ताकतों में बदल दिया जो एक-दूसरे पर टूट पड़ी थीं। फिर वही पुराना राग। युद्ध रुकवाने का श्रेय लेने वाला।यह पूछने की जगह कि ट्रम्प तथ्य लाते कहां से हैं? यह सवाल वाजिब होगा कि उनके तथ्य की आहमियत क्या है? फिर वह अपनी कहानियों में भारत को एक पात्र बनाना क्यों पसंद करते हैं? एक तरफ वह मोदी को अपना मित्र बताते रहते हैं दूसरी तरफ व्यावहारिक स्तर पर भारत के विरोध में खड़े हो जाते हैं। जिस दोस्ती का ढोंग करते हैं उसके मायने उनके लिए कुछ नहीं। ट्रम्प का दृष्टिकोण ही उनके आस-पास झूठ की दीवार खड़ी करता है। उनका दृष्टिकोण विभाजित है, जिसका आधार सौदेबाज़ी ही है, क्योंकि उनका विश्व दृष्टिकोण भी विभाजित है। पत्रकार उनका फसफला इस तरह बताते हैं- या तो मेरी चापलूसी करो, मेरा अनुसरण करो या मेरा सामना करने के लिए तैयार रहो। इसमें उन्हें कुछ सफलता भी हाथ लगी है। मसलन जापान के साथ संबंध। जापान को अमरीकी चावल खरीदने ही पड़े। ईयू ने सैकड़ों अरब डॉलर के ऊर्जा आयात का वादा किया। कतर ने 240 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा कर दी। वियतनाम टैरिफ शून्य पर लाना पड़ा। इन सबने ट्रम्प फार्मूला सीख लिया लगता है। खुशामद करो और डील पाओ, लेकिन भारत अपने आत्म-सम्मान के साथ खड़ा रहा। यही कारण है कि अभी तक अंतिम रूप से डील नहीं हो पाई।
ट्रम्प अब व्यापार से आगे बढ़कर विश्व शांति दूत बनना चाहते हैं जिसमें अभी तक उन्हें विशेष सफलता मिली नहीं। दावा कर रहे हैं कि उनकी एक काल पर युद्ध रुक जाता है। भारत-पाकिस्तान तनाव घटाने के लिए पाकिस्तान ने झुक कर उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए नामित कर दिया लेकिन भारत इस नौटंकी से दूर ही रहा और अपना आत्म-सम्मान बनाए रखा। ट्रम्प को अपना समर्थन न देने वाला देश कैसे पसंद आएगा?

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