बिहार की राजनीति से नितीश की विदाई
गत दिवस 20 वर्षों तक बिहार के निरंतर मुख्यमंत्री रहे श्री नितीश कुमार द्वारा राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन करने से बिहार की राजनीति में नितीश युग का अंत हो गया है। उनके मुख्यमंत्री पद छोड़ कर संसद के ऊपरी सदन, राज्यसभा में जाने के फैसले से बिहार की राजनीति में व्यापक स्तर पर हलचल हुई है। नितीश कुमार ने अपने इस फैसले संबंधी कहा है कि वह पहले लोकसभा के सदस्य रह चुके हैं और उनकी इच्छा थी कि वह राज्यसभा के सदस्य भी बनें। इस कारण उन्होंने राज्यसभा में जाने का फैसला किया है, परन्तु विपक्षी पार्टियों ने यह आरोप लगाया है कि जिस तरह महाराष्ट्र और कई अन्य प्रदेशों में भाजपा अपनी सहयोगी पार्टियों को धीरे-धीरे कमज़ोर कर देती है या उनकी तोड़-फोड़ करके अपने में मिला लेती है, वही मॉडल भाजपा द्वारा बिहार में भी लागू किया गया है। उसने नितीश कुमार को मुख्यमंत्री पद छोड़ कर देश की राष्ट्रीय राजनीति में जाने के लिए विवश कर दिया है। यहां वर्णनीय है कि बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव नितीश कुमार को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का चेहरा बनाकर लड़े गए थे, उस समय गठबंधन द्वारा नारा दिया गया था, ‘25 से 30 फिर से नितीश।’ विपक्षी पार्टियां, विशेष रूप से राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव इसलिए आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा ने राज्य के लोगों के साथ विश्वासघात किया है। जहां तक कि जनता दल (यू) का संबंध है उनके समर्थकों और निम्न स्तर के नेताओं ने भी नितीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के फैसले का कड़ा विरोध किया है। इस संबंध में रोष प्रकट करते हुए उन्होंने जनता दल (यू) के पटना स्थित मुख्य कार्यालय में फर्नीचर की तोड़-फोड़ भी की है और मुख्यमंत्री के निवास स्थान पर जाकर भी अपना रोष प्रकट किया है।
नितीश कुमार ने बिहार की राजनीति छोड़ कर राष्ट्रीय राजनीति में जाने का फैसला चाहे स्वयं लिया हो या उन्हें भाजपा की ओर से विवश किया गया हो, परन्तु बिहार की राजनीति में उनकी जो भूमिका रही है, उसे हमेशा याद रखा जाएगा। नि:संदेह उन्होंने बिहार को लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनता दल के लम्बे शासन, जिसे जंगल राज भी कहा जाता था, से उभार कर विकास के मार्ग पर डाला है। विशेष रूप से उनके द्वारा दलितों, पिछड़े वर्गों और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है। वह समुचित रूप से सामाजिक न्याय की राजनीति करते रहे हैं। इस कारण चाहे उन्होंने समय-समय पर कई पार्टियां भी बदलीं, परन्तु फिर भी लोगों के एक बड़े वर्ग का उन्हें हमेशा विश्वास प्राप्त रहा है। अपने ऐसे वोट बैंक के दम पर ही वह निरन्तर चुनाव जीतते रहे।
यदि नितीश कुमार की पृष्ठ भूमि और व्यक्तित्व की बात करें तो उनका जन्म 1 मार्च, 1951 को बख्तयारपुर (बिहार) में हुआ था और उन्होंने इलैक्ट्रीकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन तक की शिक्षा प्राप्त की थी। 1974 में वह बिहार से श्री जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुए ‘सम्पूर्ण क्रांति’ आन्दोलन में शामिल हुए थे। यह उनकी राजनीति में शुरुआत थी। यह आन्दोलन नितीश कुमार के अतिरिक्त जॉर्ज फर्नांडिस, राम विलास पासवान, शरद यादव और लालू प्रसाद यादव जैसे अनेक नेताओं को भी आगे लाया था। सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले इन नेताओं ने न केवल बिहार, अपितु राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया था। शीघ्र ही जय प्रकाश नारायण का महंगाई, भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक नैतिक मूल्यों को लेकर शुरू हुआ आन्दोलन बिहार से निकल कर राष्ट्रीय स्वरूप धारण कर गया था और इसी कारण उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को आपात्काल भी लगाना पड़ा था। इसके बाद देश और बिहार की राजनीति में क्या-क्या हुआ, वह अब इतिहास का हिस्सा है। जहां तक नितीश कुमार का संबंध है, वह सिर्फ बिहार की राजनीति में 2005 से 2026 तक लगभग 20 वर्षों तक मुख्यमंत्री ही नहीं रहे, अपितु उन्होंने अलग-अलग पार्टियों द्वारा कई बार लोकसभा के चुनाव जीत कर राष्ट्रीय राजनीति में भी अपना अहम योगदान डाला। अटल बिहार वाजपेयी की सरकार में वह रेलवे, कृषि और परिवहन मंत्री रहे। एक लम्बी अवधि तक नितीश कुमार ने भाजपा से दूरी बनाकर रखी, क्योंकि वह भाजपा को एक साम्प्रदायिक पार्टी मानते थे। सामाजिक न्याय, दलितों और पिछड़े वर्गों की राजनीति और धर्म-निरपेक्षता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता स्थापित रखने के लिए वह विचारधारक रूप से अक्सर दुविधा में रहते थे। इसी कारण वह बार-बार भाजपा की ओर भी जाते रहे और भाजपा से अलग भी होते रहे। वास्तव में वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी राजनीतिक पार्टियों को अपने नेतृत्व में एकजुट करना चाहते थे और विपक्षी पार्टियों के ऐसे गठबंधन की ओर से वह प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न भी देखते थे, परन्तु जितनी बार भी वह भाजपा विरोधी पार्टियों की तरफ गए, उन्हें विपक्षी पार्टियों, विशेष रूप से कांग्रेस की ओर से कोई उचित समर्थन नहीं मिला। इस कारण वह व्यवहारिक राजनीति करते हुए भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ओर लौटते रहे।
विगत लोकसभा चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन बनाने में भी शुरू में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी, परन्तु बाद में विपक्षी पार्टियों, विशेष रूप से कांग्रेस के ठंडे व्यवहार के कारण वह पुन: भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ओर लौट गए। देश के ज्यादातर सभी राजनीतिक विशेषज्ञ यह मानते हैं कि यदि भाजपा विरोधी पार्टियों ने नितीश कुमार को प्रधानमंत्री का चेहरा बनाकर चुनाव लड़े होते तो देश की राष्ट्रीय राजनीति की एक अलग तस्वीर भी हो सकती थी, परन्तु यह समय तो गुज़र चुका है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्यसभा में जाकर श्री नितीश कुमार क्या भूमिका अदा करते हैं? यह देखना भी रोचक होगा कि बिहार की राजनीति में नितीश कुमार की अनुपस्थिति के बाद जनता दल (यू) का भविष्य क्या होगा? समाचार ये आ रहे हैं कि नितीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार राजनीति में आकर जनता दल (यू) का नेतृत्व सम्भालेंगे और नितीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से त्याग-पत्र देने के बाद उन्हें उप-मुख्यमंत्री भी बनाया जा सकता है। निशांत कुमार जोकि पेशे से एक इंजीनियर हैं, ने अभी तक स्वयं को राजनीति से दूर रखा है। इस कारण यह सवाल अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है कि वह जनता दल (यू) को सम्भाल पाएंगे या नहीं? कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि नितीश कुमार की अनुपस्थिति में देर-सवेर जनता दल (यू) का भाजपा में विलय हो जाएगा। यह भी कहा जा रहा है कि जनता दल (यू) के नेताओं और समर्थकों का एक हिस्सा राष्ट्रीय जनता दल में भी जा सकता है, परन्तु इन सभी प्रश्नों के जवाब तो भविष्य के आगोश में हैं। आज भी हकीकत यह है कि बिहार की राजनीति में श्री नितीश कुमार जैसे कद्दावर नेता की विदाई हो गई है। राजनीति के एक युग का अंत हो गया है। नई परिस्थितियों में भाजपा के लिए अनेक सम्भावनाएं भी पैदा हो गई हैं।

