ईरान के बहाने दुनिया को डरा रहे हैं डोनाल्ड ट्रम्प

इस दौर का इससे बड़ा मजाक भला और क्या हो सकता है, जिसमें अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कहते हैं, ‘मैं दुनिया का सबसे बड़ा शांतिकामी हूं, मैंने दुनिया के 8 युद्ध रुकवाये हैं, जिसमें भारत-पाकिस्तान के बीच आशंकित परमाणु युद्ध भी है, जो अगर हो जाता तो कम से कम 3.5 करोड़ लोग मारे जाते।’ दूसरी तरफ वही ट्रम्प जबसे अमरीका के राष्ट्रपति बने हैं, तब से यानी पिछले 13 महीनों में सात देशों में बमबारी कर चुके हैं। ईरान में उसके सुप्रीम लीडर सहित 40 दूसरे नेताओं, मिलिट्री कमांडरों और परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या करवा चुके हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को उनके बेडरूम से अगवा करवा चुके हैं, भले इसके लिए 300 से ज्यादा उनके सुरक्षा रक्षकों की हत्या करनी पड़ी हो और यमन से लेकर तंजानिया तक पांच दूसरे देशों में न केवल आतंकियों को नेस्तनाबूद करने के लिए बार-बार बम बरसाये हैं बल्कि इस बीच दर्जनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों को जुबानी भी धमका चुके हैं। जेलेंस्की को किस तरह उन्होंने व्हाइट हाउस से बेइज्जती करके निकाला और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के साथ किस तरह उनकी तू-तू-मैं-मैं हुई, यह दुनिया ने देखा है। यही नहीं फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वह खिसाहटभरी नकल भी उतार चुके हैं। इसके बावजूद उनके दिल में यह हुड़क मची हुई है कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिलना ही चाहिए। इसके लिए वह बीच-बीच में नोबेल कमेटी को अप्रत्यक्ष रूप से हड़काने का भी काम करते हैं और कई बार यह दिखाने की भी कोशिश करते हैं कि उनसे बड़ा कोई नोबेल पुरस्कार नहीं है।
सवाल है आखिर उनकी इस विध्वंसकारी सनक की असली वजह क्या है? आखिर अमरीकी राष्ट्रपति जो कर रहे हैं, वह सब क्यों कर रहे हैं? क्या इसके पीछे सिर्फ इनकी अपनी निजी अकड़ है अथवा इस सबके पीछे कोई गहरी राष्ट्रीय हताशा काम कर रही है? अगर गौर से देखें तो पिछले 13 महीनों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह से दुनिया को अपनी सनक से हलकान कर रखा है, उसका कारण सिर्फ उनकी निजी इच्छा या अहं भर नहीं है। इसके पीछे अमरीका की गहरी हताशा है कि आने वाले दिनों में दुनिया में उसका पिछले कई दशकों से जारी वर्चस्व कायम रहेगा या खत्म हो जायेगा? हम सब जानते हैं कि दुनिया में अमरीका का वर्चस्व केवल दो स्तरों पर है। एक तो पूरी दुनिया में अमरीका का सैन्य वर्चस्व है और दूसरा दुनिया के अंतर्राष्ट्रीय कारोबार में अपना मुद्रा डॉलर के चलते उसका एकछत्र कब्जा है लेकिन पिछले दो दशकों में जिस तरह से दुनिया के कारोबार में डॉलर दिन पर दिन कमजोर हुआ है और सारी संभावनाओं और अनुमानों को सही साबित करते हुए चीन एक विश्व आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरा है, उससे अमरीका हिल गया है।
पिछली सदी के आखिर दशक में दुनिया के कारोबार लगभग 93 प्रतिशत अमरीकी डॉलर के जरिये होता था। आज दुनिया के कारोबार में डॉलर का हिस्सा महज 58 से 60 प्रतिशत रह गया है, जिसका मतलब यह है कि दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार का सिर्फ 58 से 60 प्रतिशत हिस्सा ही डॉलर में है। तेल और हथियार का जो कारोबार सिर्फ डॉलर से होता था, आज उसमें बड़ा हिस्सा बिना डॉलर के सम्पन्न हो रहा है। वास्तव में अमरीका की सबसे बड़ी घबराहट और हताशा इसी बात को लेकर है। इसलिए वह किसी भी कमजोर देश को मटियामेट कर देने की अपनी हरकत के जरिये पूरी दुनिया को डराने-धमकाने पर लगा रहता है। दुनिया के 70 से भी ज्यादा देशों में अमरीका के सैन्य अड्डे हैं। करीब 4 लाख से ज्यादा अमरीकी सैनिक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हैं और 100 से ज्यादा अमरीकी जंगी जहाज, पनडुब्बियां और सैकड़ों स्टील्थ बॉम्बर दुनिया को घेरे हुए हैं, यह दिखाने के लिए कि एक इशारे में वह दुनिया के किसी भी हिस्से को तहस-नहस कर सकता है। यही नहीं आज भी पूरी दुनिया टेक्नोलॉजी और वित्तीय नियंत्रण व्यवस्था में अमरीका की पूरी तरह से पकड़ में है। पूरी दुनिया का बैंकिंग सिस्टम जिस ‘स्विट’ कोड के जरिये लेनदेन का काम करता है, वह अमरीका की मुट्ठी में है। 
दुनिया के दो सबसे बड़े वित्त साहूकार संगठन इंटरनेशनल मॉनिट्री फंड और वर्ल्ड बैंक जैसे संस्थान अमरीका के इशारे पर चलते हैं। इस सबके बाद भी अमरीका को लगता है, भला उसकी दादागिरी पर कौन रोक लगा सकता है? यही कारण है कि जब से ट्रम्प अपने दूसरे कार्यकाल में अमरीका के राष्ट्रपति बने हैं, पूरी दुनिया को दहशत में डाल रखा है। अपनी मनमानी टैरिफ नीतियों के चलते उन्होंने पूरी विश्व अर्थव्यवस्था में उठा-पटक मचा रखी है। बावजूद इसके कि अमरीकी फेडरल कोर्ट ने उनकी इस मनमानी टैरिफ नीतियों को गैर-कानूनी बता चुके हैं, फिर भी दूसरे कानून का सहारा लेकर उन्होंने नये सिरे दुनिया के हर देश पर 15 प्रतिशत टैरिफ लगा रखा है। देखने पर भले लगे कि वह ईरान को तहस-नहस करने में लगे हैं, लेकिन यह अकेले सिर्फ ईरान भर का मटियामेट करना नहीं है। ईरान को ध्वस्त करके वह दुनिया को अमरीकी ताकत का जलवा दिखाना चाहते हैं कि कोई दूसरा देश उनसे टकराने या उनकी बातों को मानने से इंकार न करें। भले लोग कहने से हिचकिचाए, लेकिन पूरी दुनिया के रणनीतिकार और कूटनीतिक विशेषज्ञ यह बात भलीभांति समझते हैं कि ईरान में जिस तरह की ट्रम्प मनमानी कर रहे हैं, वह दरअसल ईरान के बहाने चीन, रूस और भारत को डराने की कोशिश है। क्योंकि सब कुछ के बावजूद आज अमरीका के अंदर गहरे तक यह दहशत भर गई है कि ये तीन देश अमरीका के वर्चस्व को बेमतलब बना सकते हैं। 
अमरीका फर्स्ट के नाम पर उन्होंने जिस तरह हमारे खिलाफ पहले 25 प्रतिशत का टैरिफ लगाया, फिर 25 प्रतिशत इस दादागिरी के नाम पर हम पर ठोका कि हम अमरीका के मना करने के बाद भी रूस से तेल क्यों खरीद रहे हैं? लेकिन भारत ने दिखा दिया कि हम पर जब इस तरह का दबाव आता है तो हम ज्यादा मजबूती से उभरकर आते हैं। अमरीका द्वारा जोर-शोर से हम पर लगाये गये 50 प्रतिशत टैरिफ के बावजूद दुनियाभर के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि 3 महीनों में जब तक भारत पर अमरीका का यह टैरिफ डंडा लागू रहा है, भारतीय अर्थव्यवस्था को कोई खास फर्क नहीं पड़ा बल्कि उल्टे फायदा यह हुआ है कि पिछले एक दशक से हिंदुस्तान जिन द्विपक्षीय व्यापार समझौतों की दहलीज तक आकर रुक रहा था, पिछले 8-9 महीने के भीतर भारत ने ऐसे 7 बड़े समझौते कर लिए है, जिनमें ‘मदर ऑफ आल ट्रेड डील्स’ नाम से मशहूर यूरोपीय यूनियन के साथ भारत का भारी भरकम व्यापार समझौता भी है। वास्तव में ट्रम्प इसी सबसे घबराये हुए हैं और वह हर वह हथकंडा अपनाने से पीछे नहीं हट रहे, जिससे उन्हें लगता है कि दुनिया पर अमरीका का वर्चस्व कायम हो सकता है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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