आस्था, उल्लास और आत्म-शुद्धि का महापर्व होली
फाल्गुन मास की पूर्णिमा की संध्या जैसे ही आकाश में उतरती है, वातावरण में एक अलग ही थिरकन महसूस होने लगती है। हवा में हल्की सी गंध होती है नई फसल, बसंत और एक ऐसे उत्सव की जो केवल रंगों का ही नहीं बल्कि आस्था, विश्वास और आत्मशुद्धि का पर्व है। होली और होलिका दहन भारतीय संस्कृति के ऐसे दो आयाम हैं जो एक ही भावधारा में प्रवाहित होते हैं। पहले दहन, फिर दिगन्त तक फैलता उल्लास।
होलिका दहन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह उस सनातन सत्य का स्मरण है कि अन्याय, अहंकार और अत्याचार का अंत निश्चित है। असुरराज हिरण्यकश्यप का घमंड, प्रह्लाद की अटूट भक्ति और होलिका का दहन ये घटनाएं मात्र कथा नहीं, बल्कि मानवीय जीवन के गहरे प्रतीक हैं। जब होलिका अग्नि में भस्म होती है और प्रह्लाद सुरक्षित रहते हैं तो यह संदेश स्पष्ट हो जाता है कि सच्ची श्रद्धा को कोई जला नहीं सकता। होलिका की अग्नि में केवल लकड़ियां नहीं जलतीं, बल्कि हमारे भीतर छिपी ईर्ष्या, द्वेष, कटुता और अहंकार भी जल जाने चाहिएं। यही इस अनुष्ठान का वास्तविक उद्देश्य है।हिंदी पट्टी के ग्रामीण अंचलों में जब लोग होलिका की परिक्रमा करते हैं, नई फसल की बालियां सेंकते हैं और परिवार की मंगलकामना करते हैं, तब यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव भी बन जाता है। धरती की कोख से निकले अन्न के प्रति आभार व्यक्त करना व सामूहिक समृद्धि की कामना करना भारतीय जीवन-दृष्टि का मूल स्वर है।
फिर अगली सुबह वही वातावरण रंगों की फुहारों से भर उठता है। धुलंडी की सुबह मानो यह घोषणा करती है कि जीवन केवल संघर्ष और तप का नाम नहीं, बल्कि आनंद और अपनत्व का भी उत्सव है। अबीर-गुलाल का एक हल्का सा स्पर्श वर्षों की दूरी को मिटा देता है। होली के रंग व्यक्ति की पहचान नहीं पूछते। वे न जाति देखते हैं, न वर्ग, न पद। रंग सबको एक समान कर देते हैं। यही इस पर्व की सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति है। होली हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में यदि कभी संबंधों पर धूल जम जाए तो उसे झाड़ देना चाहिए। ‘बुरा न मानो होली है’ केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि क्षमा और पुनर्मिलन का निमंत्रण है। यह पर्व मन के द्वार खोलने का अवसर देता है ताकि भीतर जमी कड़वाहट बाहर निकल सके और प्रेम का रंग स्थायी हो सके।
देश के विभिन्न भागों में होली के विविध रूप इस उत्सव को और भी समृद्ध बनाते हैं। ब्रज की फाग, बरसाने की लट्ठमार होली, पंजाब का होला मोहल्ला, बंगाल का बसंतोत्सव हर क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक छाप के साथ इस पर्व को जीवन्त करता है। विविधता के इन रंगों में ही भारत की आत्मा झलकती है किन्तु समय के साथ यह भी आवश्यक हो गया है कि हम इस उत्सव की गरिमा और पर्यावरण का ध्यान रखें। प्राकृतिक रंगों का प्रयोग, जल की बचत और मर्यादित आचरण ये केवल आधुनिक आग्रह नहीं, बल्कि हमारे संस्कारों की ही पुनर्स्मृति हैं। होली का अर्थ उच्छृंखलता नहीं, बल्कि उत्सवधर्मिता और उल्लास है परंतु मर्यादा के साथ। होलिका दहन की अग्नि हमें भीतर झांकने को प्रेरित करती है और होली के रंग जीवन में नवचेतना भर देते हैं। एक रात आत्ममंथन की और अगला दिन आत्मीयता का। यही इस पर्व की पूर्णता है।
मो. 90412.95900



