राजधानी दिल्ली में नवनिर्माण से लुटियन जोन का बदलता चेहरा

ब्रिटिश शासनकाल में समूची नई दिल्ली का निर्माण करने वाले वास्तुशिल्पी एडवर्ड लुटियंस की अभी राष्ट्रपति भवन में लगी प्रतिमा को हटाया गया और वहां आज़ाद भारत के पहले गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित की गई जिसका अनावरण राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया। इस मौके पर प्रधानमंत्री का यह संदेश पढ़ा गया कि औपनिवेशिक काल की इस पहचान को हटा देना देश के लिए गौरव की बात है। इससे ठीक पहले प्रधानमंत्री मोदी ने नवनिर्मित प्रधानमंत्री कार्यालय ‘सेवा तीर्थ’ का स्वयं उद्घाटन किया, जिसने करीब 75 साल से चल रहे साउथ ब्लॉक स्थित पीएमओ का स्थान लिया है। इसी के साथ लुटियन द्वारा निर्मित नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक स्थित भारत सरकार के मंत्रालयों को नवनिर्मित कर्तव्य भवन 1-2-3 में स्थानांतरित किया जा रहा है। आने वाले दिनों में सेंट्रल विस्टा निर्माण की नई परियोजना में राजधानी दिल्ली स्थित शास्त्री भवन, कृषि भवन, उद्योग भवन, निर्माण भवन और परिवहन भवन को भी या तो स्थानांतरित किया जाएगा या रूपांतरित किया जाएगा। कहने का मतलब यह कि अब सेंट्रल विस्टा लुटियन जोन का स्थान लेगा। इससे पूर्व मोदी सरकार ने नये संसद भवन का भी निर्माण कराया, जिसमें संसद की पिछले दो साल से बैठक चल रही है और पुराने संसद भवन का नया नामकरण संविधान भवन किया गया है।
जाहिर है कि मोदी सरकार 1920 के दशक में समूची नई दिल्ली की वास्तु संरचना करने वाले लुटियन की छाप मिटाना चाह रही है, जिसका प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में भी औपनिवेशिक दासता की पहचान मिटाने की बात का हवाला देकर किया। देखा जाये तो मोदी सरकार इन नए निर्माणों और नामकरणों के जरिए एक साथ तीन पहचानों को मिटाने और अपने हिसाब से एक नयी भारतीय राष्ट्रीयता की पहचान स्थापित करने की रणनीति पर काम कर रही है। भारत की इस नयी राष्ट्रीयता की पहचान में पौराणिक, धार्मिक, सांस्कृतिक पहचान को भी अंतर्निहित किए जाने की रणनीति है। मोदी सरकार द्वारा जो तीन पहचानें मिटायी जा रही हैं, उनमें पहली हैं मुस्लिम शासन से जुड़ी पहचानें। हालांकि उनकी कलाकृतियों और स्थापत्य कला को हटाना तो संभव नहीं पर मुस्लिम नाम वाले शहरों और रेलवे स्टेशनों के नए नामकरण किये गए हैं। जिस दूसरी पहचान को बदलने की रणनीति पर काम हो रहा है, उसमें अंग्रेजों के काल के भवन और कानूनों के बदले जाने की कोशिश है। इसके साथ ही मोदी सरकार की जो तीसरी रणनीति है, वह कांग्रेस शासन के खासकर नेहरू गांधी परिवार से जुड़ी पहचानों, योजनाओं, संस्थाओं के नए नामकरण कर भाजपा संघ की विचारधारा और महापुरुषों को स्थापित कर रही है।
मोदी सरकार की इस रणनीति पर देश के राजनीतिक दलों की अपनी राजनीतिक विचारधारा और अपने महापुरुषों को चमकाने के राजनीतिक स्वार्थ हो सकते हैं। मगर राष्ट्रीय औचित्य की दृष्टि से इन नए निर्माणों और नामकरणों को लेकर तटस्थ तरीके से बात करें तो इनमें कई चीज़ें अच्छी हैं पर इनमें कई सवाल भी उपजते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि किसी भी राष्ट्र में उसकी स्थापत्य और निर्माण संरचना से उसकी एक राष्ट्रीय ऐतिहासिक सांस्कृतिक बोध की अभिव्यक्ति मुखरित हो तो वह अच्छी बात है। इस दृष्टि से मोदी सरकार के कुछ कदम बेहद अच्छे हैं। जैसे ब्रिटिश शासनकाल के कई अनर्गल, गैर-ज़रूरी और जनविरोधी कानूनों को हटाया जाना। राजपथ का नाम बदलकर कर्त्तव्य पथ किया जाना, रेस कोर्स का नाम लोक कल्याण मार्ग किया जाना, राज भवन का नाम लोकभवन करना शाब्दिक तौर पर ज्यादा लोकतांत्रिक सुगंध बिखेरता है। पर बड़ा सवाल यह है कि इतिहास को जब हम अपनी नई राष्ट्रीय मंशा के आधार पर मिटाते हैं और फिर उस पर नया निर्माण कर नया इतिहास निर्मित करते हैं, तो वह पहले से अव्वल और बेहतर होना चाहिए। बदलने के लिए बदलना और वह भी कमतर गुणवत्ता के साथ तो वो चीजें दमदार नहीं लगतीं। 
मिसाल के तौर पर हमने नया संसद भवन बनाया जो नए दौर की संसदीय आवश्यकता के मुताबिक ज़रूरी था, पर नए निर्माण के मुकाबले अभी भी पुराना संसद भवन ज्यादा मजबूत लगता है। अभी भारत सरकार ने अपना नया प्रशासनिक भवन कर्त्तव्य भवन 1,2,3 बनाया है, पर इन भवनों के सामने अभी अंग्रेजों द्वारा बनाये नार्थ और साउथ ब्लॉक ज्यादा रॉक सॉलिड लगते हैं। सवाल यहां केवल बेहतर निर्माण को लेकर नहीं है बल्कि व्यय राशि के समुचित इस्तेमाल का भी है, निर्माण के तकनीकी पहलू का भी है और दूसरा अपनी पीठ थपथपाये जाने और श्रेय लेने की जल्दबाजी में आनन-फानन में निर्माण कार्य को पूरा कराये जाने का भी है। जैसे देश के नए संसद भवन का उद्घाटन 2023 में ही हुआ, पर इसकी पूरी फिनिशिंग एक साल बाद जाकर हो पायी। तब तक इसमें कई शिकायतें भी आयीं। अभी भारत की मशहूर प्रदर्शनस्थली प्रगति मैदान का भी नवनिर्माण किया गया है। इसके परिसर में अनेक भवनों को ढहा दिया गया और एक अज़ीम प्रदर्शनस्थल भारत मंडपम का निर्माण कराया गया। इसे देखकर यही लगता है कि मोदी सरकार ने प्रगति मैदान पर कांग्रेस की पहचान हटाकर अपनी सरकार की पहचान को चस्पां किया है, लेकिन पूरे प्रगति मैदान परिसर की फिनिशिंग अभी भी अधूरी लगती है। इस परिसर में स्थित विशाल भूमिगत पार्किंग और गलियारे में जलनिकासी की खामी अखबारों की हमेशा सुर्खियां बनती हैं।  
सवाल निर्माण की क्वालिटी और जल्दी में फिनिशिंग को बेहतर तवज्जो नहीं दिया जाना है। अभी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का दूसरा हवाई अड्डा जो जेवर में बन रहा है, उसे एशिया का सबसे बड़ा एयरपोर्ट बताया जा रहा है। इसकी निर्माण तिथि अब तक तीन बार बढ़ाई जा चुकी है। सवाल यही है कि जनता की गाढ़ी कमाई से प्राप्त करों से नया इतिहास बनाने वाले निर्माणों की क्वालिटी से कोई समझौता नहीं होना चाहिए और नए नामकरणों से एक समवेत राष्ट्रीय अभिव्यक्ति संचारित होनी चाहिए, जिसमें इतिहास के सभी किरदारों को समुचित श्रेय मिले।
 -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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