बन्दा बिकता है

बहुत पहले हमने रंगमंच पर एक नाटक देखा था, जिसमें एक लेखक के गिर्द उसके बच्चे और मरियल बीवी घूम-घूम कर कहती है, ‘अपने आप नूं वेचो, सानूं रोटी चाहीदी है।’
तब मन बहुत तिक्तता से भर गया था, क्योंकि उन दिनों अपने आपको किसी श्रेष्ठि के सामने बेच देना एक निकृष्ट काम माना जाता था। परन्तु बन्धु जो कल निकृष्ट था, वह आज श्रेष्ठ बन गया है। पूछते हैं, क्यों हुआ, तो जवाब मिलता है, ‘यह बदले ज़माने की निशानी है।’ आज तो जो आदमी अपने आपको, जितना अच्छी तरह से बेच सके, उतना ही कामयाब है। पहले लोग अपने आपको अपने आदर्शों और सिद्धांतों के लिए कुर्बान कर देते थे, आजकल कुर्बानी नाम का शब्द केवल किताबों तक सीमित रह गया है। हां, एक देसी फिल्म का नाम भी इस शब्द के साथ ही रखा गया था, एकाध फिल्मी गाने में भी इसे सुना है। या जो कुर्बान है उसे लतीखागरों ने अपने लतीफों का मौजूं बना लिया। आजकल के नये बाज़ारों में कुर्बानी की सेल लगी है और अपना उल्लू सीधा करने के लिए बहुमंज़िली इमारतों की दहलीज पर सजदा करते हुए अपने बिक जाने को इसका नाम दिया जाता है। पहले प्रेमिका के वेलेंटाइन दिवस पर फूलों का गुलदस्ता भेंट करते हुए कहा जाता था, ‘हे भद्रे मैं तेरे  पर कुर्बान।’
आजकल भद्रता तो कमज़ोरी की निशानी है, इसलिए कोई उपयोगी कुर्सी पर बैठे अयोग्य व्यक्ति को उसके जन्मदिन पर फूल भेंट करते हुए कह जाता है कि हे अभद्र व्यक्ति, तुम इस कुर्सी पर जियो हज़ारों साल साल के दिन हो पचास हज़ार क्योंकि तुम्हारी अयोग्यता है फलदायी। इस अयोग्यता में जनता से टैक्सों के रूप में उगाहा पैसा अपने और अपने नाती-पोतों पर खर्च करते हुए तुम्हें अपार हर्ष होता है। और सजदे में झुके व्यक्ति से कह पाते हो, केवल फूलों से काम नहीं चलेगा। धर्म-स्थान पर जाते हो, अर्चना करते हुए पैसे चढ़ाते हो ताकि तेरे बिगड़े हुए काम बन जायें। खोई हुई सेहत लौट आये।
बदले माहौल में कुर्सियों की परिक्रमा आज हमारे नये अर्चना स्थल हैं और फूलों के साथ चढ़ावा पेश करना नई पूजा विधि। न हो सकने वाला काम करवा पाना ही राहत है, और तेरी खोयी हुई सेहत का लौटना है।
देखिये जनाब जबकि बिक सकना ही सफलता की सीढ़ी हो गया है, तो उसके खिलाफ मार्मिक शिकायतें क्यों? आज तो अपने आपको अच्छी तरह से बेच सकना सिखाने वाले प्रशिक्षण स्थान भी खुल गये, और इन्हें ‘व्यक्तित्व विकास स्थल’ कहा जाता है। यहां अपने आपको कामयाबी से बेच सकना सिखाया जाता है, मिष्ट भावी बन कर नहीं। अपने आप में सद्गुण पैदा करके, या दूसरों का उचित आदर करके नहीं, बल्कि अपनी वाचालता के साथ दूसरों को छोटा सिद्ध करके। जो आपके पास नहीं है, उसे होने का सफल भ्रम पैदा करके, और भी विकास हो जाने के काबिल बन जाने में।
आज केवल प्रसूति ग्रह से बच्चे चुरा कर ही निस्संतानों को नहीं बेचे जाते, बल्कि ऐय्याश गाहों के लिए काबल बनाने के लिए पोषक गृहों में भी ऊंचे दाम बेचे जाते हैं। इसे कारोबार कहते हैं जैसे आपके गलत कामों को सरकारी दरबार में पारित करवा देना जन-सेवा कहलाता है, और अधिक से अधिक छूट और रियायतें बांटना, जन-कल्याण? चुनाव करीब हैं। अब तो राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी एजेंडों का मुखड़ा भी बदल गया। इनमें दौड़ सजने लगी। जनता नहीं वोटर जर्नादन को अधिक से अधिक रियायतें और अनुकम्पाओं को बांटने की दौड़ लगी है। जो बिना काम अधिक से अधिक रुपया आपके खाते में डाल दे, वहीं जनता का हमदर्द। जो अधिक से अधिक मूल सेवाओं को मुफ्त कर दे, वही जनता का सच्चा हमदर्द। वोट बेचने या खरीदने पर प्रतिबंध लगे थे, इसलिए पिछले दिनों एक राज्य में विशेष वोटर वर्ग को प्रसन्न करने के लिए दस-दस हज़ार रुपये के श्रद्धा पुष्प भेंट कर दिये, जीत ने उनके माथे पर सेहरा बांध दिया। लो यहां जीत भी बिकती है, यूं नेताओं को सीख मिली।
सीख की क्या बात कहते हो, यहां तो सीख देने वाले भी ट्यूशनों का बाज़ार सुझाते हैं। कलाकार सफलता के साथ अपनी कला बेच सकने के लिए महिमा मण्डन के बाज़ार सजाते हैं। पहले लोग इनाम पाने के लिए सिफारिशों की सीढ़ी तलाशते थे, अब बाकायदा इनाम राशि का बंटवारा कर लेते हैं।
आपको पता है आजकल सांप और सीढ़ी का खेल सिखाने वालों का भी एक बाज़ार सज गया है। कोई योग्य प्रतिस्पर्धी मिल गया तो ज़िन्दगी की लुडो में उसे उसके स्थान निन्यान्नवे से चार घर परे फेंक देने वाले विशेषज्ञों ने अपनी दुकानें सजा ली हैं, और दो अंक से सौ पर पहुंचाने वाली सीढ़ियां इतनी अधिक हो गई हैं कि इनकी सस्ती सेल लगानी पड़ गई, देश सांस्कृतिक है सदियों से, इसलिये इसे शार्टकट संस्कृति कह दिया जाता है। इसमें दीक्षित हो पाना ही दुनियादार हो जाने की सही निशानी है। इससे पुस्तक संस्कृति की मौत हो गई तो क्या? विनयकला तो एक शानदार जान पा गई। अपने आपको ढिंढोरा पीट कर बेचो। अपनी कलम को बेचो। आजकल भूख लेखन का ज़माना आ गया है। यहां पुस्तकें आपके नाम से लिख कर देने वालों के बाज़ार सज गये हैं, और आपको नामद डिग्रियां बेचने वाले अपने कामयाब संस्थानों के खुले विज्ञापन दे रहे हैं। इसलिए अगर योग्य और जन्मजात विलक्षण व्यक्ति हो गये तो क्या दर्द। जीवन तो अपने लिए एक शोभायात्रा निकालने का सफल सपना बन गया।

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