ईरान युद्ध : अकेले पड़े ट्रम्प के लिए परीक्षा की घड़ी
बुधवार को अमरीका-इज़रायल के ईरान के खिलाफ युद्ध के 18वें दिन ट्रम्प को एक साथ दो बुरी खबरें मिलीं। इन खबरों ने उन्हें इस बात पर सोचने पर मजबूर कर दिया कि ईरान को अमरीकी ताकत के आगे झुकाने के लिए उन्हें अपनी अगली रणनीति कैसे बनानी चाहिए। पहली खबर यह थी कि यूरोपीय देशों सरकारों ने ट्रम्प के उस अनुरोध का जवाब देने से इन्कार कर दिया है, जिसमें उन्होंने तेल टैंकरों के सुरक्षित मार्ग के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य में अपने युद्धपोत भेजने की मांग की थी। दूसरी खबर यह थी कि ईरान अब होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाज़ों को तभी गुजरने देगा, जब वे भुगतान डॉलर में नहीं, बल्कि चीनी युआन में करें।
इसका मतलब है कि चीन और ईरान के बीच कोई समझौता हो गया है। हालांकि उसकी शर्तें अभी पता नहीं चली हैं। लेकिन इसका कुल नतीजा यह निकला है कि चीन तेहरान के पूरे समर्थन के साथ ईरान द्वारा की गई होर्मुज नाकेबंदी का फायदा उठा रहा है और पैसे कमा रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति ने अपने वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट को मनाया कि वह चीनी व्यापार मंत्री ही लिफांग के साथ एक बैठक तय करें ताकि इस साल अप्रैल में बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ होने वाली उनकी बैठक के लिए ज़मीन तैयार की जा सके। ईरान युद्ध के माहौल के बीच चीन ने हिचकिचाते हुए ऐसी बैठक के लिए सहमति दी। यह बैठक रविवार को पेरिस में शुरू हुई और सोमवार को भी जारी रही थी। व्हाइट हाउस ने अपनी तरफ से 31 मार्च से 2 अप्रैल तक शिखर सम्मेलन की तारीखें तय कर दी थीं, लेकिन चीन की तरफ से इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई थी। असल में ट्रम्प पेरिस बैठक का इस्तेमाल एक ‘चारे’ के तौर पर करना चाहते थे, ताकि चीन को अपने पाले में रखा जा सके। वे यह संकेत देना चाहते थे कि वे चीनी राष्ट्रपति के साथ बैठक करने के लिए इतने उत्सुक हैं कि वे उस ऐतिहासिक व्यापार समझौते और अन्य विवादित मुद्दों पर आपसी समझ को अंतिम रूप देना चाहते हैं, लेकिन ट्रम्प की यह चाल कामयाब नहीं हुई। अब वह गुस्से से आग-बबूला हैं। उन्होंने घोषणा की है कि चीन का प्रस्तावित दौरा टाल दिया जाएगा, हालांकि व्हाइट हाउस के सूत्रों का कहना है कि शिखर सम्मेलन अप्रैल के अंत तक हो जाना चाहिए।
ट्रम्प ने चीन से भी होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाज़ भेजने का वही अनुरोध किया था, लेकिन चीन ने भी यूरोपीय देशों की तरह ही इस अनुरोध को ठुकरा दिया। इस तरह, दोनों ही पक्षों ने ट्रम्प की बात मानने से इन्कार कर दिया। जहां तक यूरोप की प्रतिक्रिया का सवाल है, वह ट्रम्प के लिए इतनी परेशान करने वाली थी कि उन्होंने कहा कि यूरोप का यह रुख नाटो के लिए बहुत बुरा है। इस बात के काफी संकेत थे कि वह नाटो के इन यूरोपीय सदस्यों के खिलाफ उचित कार्रवाई करेंगे। जर्मनी की प्रतिक्रिया ट्रम्प के लिए सबसे ज़्यादा चिंताजनक थी। जर्मनी ने किसी भी सैन्य गतिविधि में हिस्सा लेने से साफ इन्कार कर दिया, जिसमें जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के प्रयास भी शामिल थे। चांसलर फ्रेडरिक मज़र् ने कहा, ‘हस्तक्षेप करना है या नहीं, इस पर कभी कोई संयुक्त फैसला नहीं हुआ था। इसीलिए यह सवाल ही नहीं उठता कि जर्मनी के सैन्य रूप से योगदान देगा। हम ऐसा नहीं करेंगे।’
उन्होंने आगे कहा, ‘इस ईरानी शासन का अंत होना ही चाहिए,’ लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पिछले वर्षों और दशकों में हमने जो अनुभव हासिल किया है, उसके आधार पर बमबारी करके उसे घुटने टेकने पर मजबूर करने जैसा तरीका, पूरी संभावना है कि सही तरीका नहीं है।’
जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने कहा, ‘यह हमारा युद्ध नहीं है, हमने इसे शुरू नहीं किया है। डोनाल्ड ट्रम्प होर्मुज जलडमरूमध्य में मुट्ठी भर यूरोपीय युद्धपोतों से ऐसी क्या उम्मीद करते हैं, जिसे शक्तिशाली अमरीकी नौसेना अकेले नहीं संभाल सकती? यही वह सवाल है जो मैं खुद से पूछ रहा हूँ।’ ब्रिटेन, फ्रांस और इटली ने भी जर्मन राष्ट्रपति के विचारों का समर्थन किया और यह साफ कर दिया कि वे ट्रम्प के अनुरोध के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य में युद्धपोत भेजने की स्थिति में नहीं हैं। तो अब ट्रम्प यहां से आगे क्या करेंगे? पेंटागन ने इस महीने की शुरुआत में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ईरान में इस युद्ध को इस साल सितम्बर तक जारी रखने की क्षमता है और यह अमरीका के लिए बहुत महंगा साबित होगा। ट्रम्प को पेंटागन पर भरोसा नहीं था। वह ईरान को आत्म-समर्पण कराने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा 15 दिन का समय बता रहे थे। अब18वें दिन भी ऐसा कोई संकेत नहीं दिख रहा है। ट्रम्प तेल और परमाणु ठिकानों पर कब्ज़ा करने के लिए मरीन सहित बड़ी संख्या में सैनिकों का इस्तेमाल करके युद्ध को अगले स्तर पर ले जा सकते हैं। अगर वह सफल भी हो जाते हैं, तो भी इस कदम के खतरनाक परिणाम होंगे।
अब तक यह एक हवाई युद्ध रहा है, जिसमें कुछ ही अमरीकी जानें गई हैं। घायलों की संख्या भी लगभग 200 ही है। लेकिन अगर ट्रम्प ज़मीनी सैनिकों का इस्तेमाल करते हैं, तो मरने वालों की संख्या हज़ारों में होगी। नवम्बर में होने वाले मध्यावधि चुनावों के इस साल में यह ट्रम्प के लिए एक राजनीतिक आपदा साबित होगी। अमरीकी सैनिकों की मौत अमरीकी मतदाताओं के लिए बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है। (संवाद)



