केरल का चुनावी दंगल -यूडीएफ को बहुमत मिलेगा या एलडीएफ आयेगा तीसरी बार ?
विपक्ष में एक दशक बिताने के बादए कांग्रेस पार्टी 2026 के चुनावों से पहले केरल में अपना प्रभाव फिर से हासिल करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ), पिछले लोकसभा चुनावों और स्थानीय निकाय चुनावों में मिले मज़बूत नतीजों से उत्साहित होकर, सत्ता छीनना चाहता है। सत्ताधारी सीपीआई(एम) राज्य में अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए अपने प्रयास तेज़ कर रही है। आने वाला चुनाव यूडीएफ द्वारा मिल रही कड़ी चुनौती के सामने सत्ता बनाए रखने की लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) की क्षमता की परीक्षा लेगा। 1982 से मतदाताओं ने हर पांच साल में एलडीएफ और यूडीएफ के बीच अपना समर्थन बदला है, जिससे किसी भी सरकार को लंबे समय तक सत्ता में बने रहने का मौका नहीं मिला है। 2021 में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाले एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की। दोनों पार्टियां फिलहाल मोदी सरकार का विरोध कर रही हैं और मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन पाने के लिए होड़ कर रही हैं।
एनडीए केरल में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। भाजपा अपना वोट शेयर बढ़ाने और महत्वपूर्ण सीटें जीतने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। राज्य स्तर पर कांग्रेस के पदाधिकारी आत्मविश्वास से भरे हैं। हालांकि स्थानीय स्तर पर कुछ गंभीर समस्याएं हैं जो भविष्य के चुनावों में उनके जीतने की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकती हैं। एलडीएफ केरल में सबसे मज़बूत राजनीतिक गठबंधन है, जिसे मुख्य रूप से हिंदुओं का समर्थन प्राप्त है। इसके विपरीत यूडीएफ अल्पसंख्यक समूहों के समर्थन पर निर्भर करता है। भाजपा ने यूडीएफ के कुछ वोट अपनी तरफ खींच लिए हैं। इस गठबंधन में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) और केरल कांग्रेस शामिल हैं, जो क्रमश: लगभग 27 प्रतिशत मुसलमानों और 18 प्रतिशत ईसाइयों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
केरल के 6 ज़िलों में कम से कम दस ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां किसी भी पार्टी की जीत पक्की नहीं होती। ये सीटें इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पिछले दो विधानसभा चुनावों में तीनों गठबंधनों को मतदाताओं का लगभग एक जैसा ही समर्थन मिला था। कांग्रेस के भीतर चल रहे आपसी झगड़े, खासकर उम्मीदवारों के चयन को लेकर पार्टी में एकता बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करते हैं। हालांकि सतीशन, रमेश चेन्निथला और के.सी. वेणुगोपाल जैसे नेता विधानसभा चुनावों से पहले एकजुट दिख रहे हैं, फिर भी अगर यूडीएफ जीतता है, तो वे मुख्यमंत्री पद के लिए आपस में मुकाबला करेंगे।
2026 के केरल विधानसभा चुनावों में भाजपा ईसाई मतदाताओं से जुड़ने की पूरी कोशिश कर रही है, खासकर मध्य केरल में। पार्टी की योजना स्थानीय समुदायों से जुड़ने, मुख्य मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने और अपने प्रयासों में वरिष्ठ नेताओं को शामिल करने की है। उनका लक्ष्य खुद को यूडीएफ गठबंधन के एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश करना है। पार्टी बुनियादी ढांचे, नौकरियों और सुरक्षा पर केंद्रित है। हाल ही में एनडीए ने स्थानीय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया है। यह दर्शाता है कि केरल का राजनीतिक परिदृश्य, जिस पर यूडीएफ और एलडीएफ का दबदबा रहा है, अब बदल सकता है।
उम्मीदवारों के चयन को लेकर कांग्रेस के भीतर मतभेद, जिसमें टिकट वितरण को लेकर राहुल गांधी की चिंताएं भी शामिल हैं, पार्टी की एकजुटता को कमजोर कर सकते हैं और मतदाताओं के भरोसे पर असर डाल सकते हैं। प्रस्तावित सूची में लगभग 60 प्रतिशत उम्मीदवार लोकसभा सदस्य और पार्टी के महासचिव के.सी. वेणुगोपाल से जुड़े हैं। गांधी ने कांग्रेस के भीतर अधिक व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया है। चुनाव समिति केवल राज्य इकाई से मिले नामों पर निर्भर रहने के बजाय जातिगत समीकरण, जीतने की संभावना और पिछले चुनावी परिणामों जैसे मुख्य कारकों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। पार्टी के सदस्य उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व को लेकर भी चिंतित हैं।
जमीनी स्तर पर स्थिति स्पष्ट है। सीपीआई(एम) ने प्रभावी प्रचार और स्पष्ट संगठन के माध्यम से मजबूत प्रगति की है। इसके विपरीत कांग्रेस को अभी भी अपने सदस्यों को संगठित करने में मुश्किल हो रही है। मुख्यमंत्री बनने की चाह रखने वाले कुछ लोग अपने समर्थकों के लिए टिकट पक्का करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। वे न केवल वफादार कार्यकर्ताओं की मदद कर रहे हैं या नए नेता तैयार कर रहे हैं, बल्कि वे अपने खुद के गुटों को मजबूत करने की भी कोशिश कर रहे हैं। विधानसभा चुनावों से पहले सतीशन, चेन्निथला और वेणुगोपाल एक दुर्लभ एकजुटता दिखा रहे हैं। फिर भी राजनीतिक नेतृत्व के लिए मुकाबला स्पष्ट रूप से बना हुआ है। 2026 के केरल विधानसभा चुनावों में भाजपा सक्रिय रूप से ईसाई मतदाताओं तक पहुंच बना रही है, विशेष रूप से मध्य केरल में सीरो-मालाबार समुदाय तक। हाल के स्थानीय निकाय चुनावों और शुरुआती सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि यूडीएफ थोड़ा आगे है, लेकिन उसे अंदरूनी कलह का सामना करना पड़ रहा है। यदि भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन 2024 के लोकसभा चुनावों वाला अपना 19 प्रतिशत वोट शेयर बरकरार रखता है, तो 2021 की तुलना में उसे 7 प्रतिशत का फायदा हो सकता है। अहम सवाल यह है कि क्या यह बढ़त एलडीएफ या यूडीएफ के वोटों में सेंध लगाएगी? ईसाई और मुस्लिम समुदाय किसे वोट देंगे? आखिरकार सवाल यह है कि क्या यूडीएफ बहुमत हासिल कर पाएगी या फिर एलडीएफ लगातार तीसरी बार सत्ता में आने का रिकॉर्ड बनायेगी। अब यह फैसला मतदाताओं के हाथों में है। (संवाद)



