किसानों की शुद्ध आय में वृद्धि करना ज़रूरी

चाहे गेहूं की कटाई अभी होनी है, लेकिन किसान खरीफ में काश्त करने के लिए फसलों और उनकी किस्मों का चयन करने हेतु अभी से विचार-विमर्श कर रहे हैं। किसानों को धान, बासमती के अतिरिक्त अन्य कोई फसल नहीं मिली , जो इनके समान मुनाफा दे सके। धान और बासमती की काश्त 32 लाख हेक्टेयर रकबे पर होनी है। धान और बासमती की किस्मों की भरमार है। किसान बिजाई के लिए लाभदायक किस्म का चयन करना चाहते हैं और इस संबंधी दुविधा में हैं। यहां तक कि एक निजी कंपनी द्वारा तैयार की गई धान की हाइब्रिड किस्म को बहुत महंगे दाम पर खरीदने के लिए भी तैयार हैं। 
हाइब्रिड किस्मों का उत्पादन ज़्यादा होने के कारण किसानों का रूझान इस किस्म की ओर है। कृषि और किसान कल्याण विभाग के निदेशक डॉ. गुरजीत सिंह बराड़ के अनुसार हाइब्रिड किस्मों की ब्रिकी के समय किसानों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इस समय निजी क्षेत्र के बीज बिक्रेता इस कंपनी को भारी पेशगी दे चुके हैं और दे रहे हैं। डॉ. गुरजीत सिंह बराड़ ने किसानों को अपील की है कि वे इन हाइब्रिड किस्मों की काश्त न करें। धान, बासमती की काश्त लगातार 30 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा रकबे में की जाती रही है। मुख्य रूप से पी.आर.-133, पी.आर.-126 और बासमती की पूसा बासमती-1509 और पूसा बासमती-1692 जैसी किस्मों की अधिक मांग रही है। बढ़िया चावल वाली पूसा बासमती-1121 और पूसा बासमती-1401 किस्मों की काश्त की ओर रूझान बहुत कम है। ये पकने के लिए लंबा समय लेती हैं। किसान आईएआरआई की नई किस्मों पूसा-1824 और पूसा-2090 जो पकने को 125-130 दिन लेती हैं और औसतन 135 क्ंिवटल प्रति एकड़ की पैदावार देती हैं, की काश्त को प्राथमिकता दे रहे हैं। किसान सेंट्रल स्वॉइल सैलिनिटी रिसर्च इंस्टीच्यूट, करनाल द्वारा 2024 में कुछ राज्यों के लिए जारी की गई सीएसआर-101 किस्म की भी पंजाब के कुछ किसान काश्त करने का इरादा रखते हैं। कई अन्य अप्रमाणित किस्में मंडी में बिक रही हैं, जिन्हें अपनाने संबंधी किसान दुविधा में हैं। निजी बीज विक्रेताओं का अभी तक धान, बासमती का बीज बहुत कम बिका है। चाहे पीएयू और आईएआराई द्वारा आयोजित किसान मेलों में चुनिंदा किस्मों के बीजों की बिक्री ज़रूर हुई, परन्तु पिछले मेलों से यह बिक्री बहुत कम है।
सर्टिफाइड और फाउंडेशन बीज किसानों को बहुत कम उपलब्ध हैं। मंडी में टीएल (ट्रुथफुली लेबल्ड) बीज उपलब्ध हैं। डॉ. बराड़ का कहना है कि फसली विभिन्नता के पक्ष से किसानों को बासमती की काश्त अधिक करनी चाहिए। बासमती के 60-65 लाख टन निर्यात से देश को 50 हज़ार करोड़ रुपये तक की विदेशी मुद्रा मिलती है। दुनिया के बासमती निर्यात में भारत का 70 फीसदी तक हिस्सा है, जिसमें पंजाब का हरियाणा को मिलाकर 40 फीसदी तक का योगदान  है। निर्यात में पूसा बासमती-1121 और पूसा बासमती-1509 किस्में प्रमुख हैं। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और प्रसिद्ध निर्यातक विजय सेतिया कहते हैं कि बासमती की घरेलू और विदेशों में मांग बनी हुई है। आईएआरआई के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. अक्षय तालुकदार के अनुसार पंजाब में बासमती की काश्त अधीन 7 लाख हेक्टेयर रकबे में 80-90 फीसदी पर आईएआरआई किस्मों की काश्त होती है। इनमें जो सुधार किए गए हैं, उसके बाद रकबा और बढ़ने की संभावना है।
कृषि को लाभदायक बनाने के लिए उत्पादन बढ़ाना ज़रूरी है। डॉ. बराड़ किसानों को अपील करते हैं कि वे फसलों के स्तरीय बीज ही इस्तेमाल करें। वे शुद्ध बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक और अन्य कृषि सामग्री उपलब्ध करवाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। पंजाब को सब्ज़ क्रांति लाने पर सम्मान तो मिला गया, लेकिन किसानों की आय में वृद्धि नहीं हुई। उत्पादन बढ़ा, लेकिन प्राकृतिक स्रोतों का क्षरण हो गया। भू-जल का स्तर लगातार नीचे जा रहा रहा। भूमि के सूक्ष्म तत्व खत्म होते रहे। किसानों की कृषि लागत बढ़ी, लेकिन खर्च के मुकाबले फसलों के दाम नहीं बढ़े। इस वजह से किसान घाटे में आकर कज़र्दार होते गए। उन पर कज़र् इतना बढ़ गया कि हर परिवार पर 2.03 लाख कज़र् हो गया। मशीनरी पर खर्च हुआ, लेकिन मशीनरी खेतों में जंक बन कर खड़ी है। ट्रैक्टरों की संख्या बढ़ने से इन्हें सड़कों पर वाहन के तौर पर इस्तेमाल करने से मशीनरी पर बहुत खर्च हो गया, जो किसानों पर छायी मायूसी का कारण बन गया।
लंबे समय से की जा रही कोशिशों के बावजूद धान की काश्त के रकबे में कोई कमी नहीं आई, जिससे ज़मीन की शक्ति कम होती गई और लागत बढ़ती गई। पीएयू, आईएआरआई और कृषि एवं किसान कल्याण विभाग को मिलकर एक योग्य नीति बनानी चाहिए और किसान हितैषी अनुसंधान को तेज़ करके किसानों की आय बढ़ा कर स्थिति को सुधारने की ज़रूरत है। जिस तरह पार्ट टाइम किसान राजमोहन सिंह कालेका को आईएआरआई के निदेशक डॉ. सी.एच. श्रीनिवासा राव ने पिछले दिनों रखड़ा किसान मेले में सम्मानित किया, उसी तरह पार्ट-टाइम प्रगतिशील किसानों तथा आय को कम न होने देने वाले अन्य किसानों को चुन कर उत्साहित करने की ज़रूरत है ताकि कृषि में कुछ बदलाव आए।

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