खाड़ी युद्ध में हूतियों का प्रवेश-और बढ़ सकती हैं अमरीका-इज़रायल की मुश्किलें
खाड़ी युद्ध में घटनाक्रम तेज़ी से बदल रहा है। हालात लगातार अमरीका और इज़रायल के खिलाफ होते जा रहै हैं। उनके अपने साथी एक-एक करके उनका साथ छोड़ रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि अभी तक उनके सामने होर्मुज जलडमरूमध्य की ईरान द्वारा की गई नाकेबंदी ही थी। अब अल मंडेब जलमार्ग भी बंद होने का अंदेशा पैदा हो गया है। अगर ऐसा हुआ तो लाल सागर से होकर जाने वाला समुद्री रास्ता भी बंद हो जाएगा। यानी, होर्मुज की वज़ह से दुनिया का व्यापार पहले से ही ठप हो रहा था, अल मंडेब के बंद होने के बाद ग्लोबल अर्थव्यवस्था की तबाही तय है। अपनी मज़र्ी के मालिक ट्रम्प और नेतन्याहू के किरदार का खमियाजा सारी दुनिया भुगत रही है और अगर युद्ध बंद न हुआ तो और भी भुगतेगी। यही है ईरान का हाइब्रिड युद्ध। यानी, एक तरफ से मिसाइलें दनदना कर इज़रायल पर गिर रही हैं और मध्य-पूर्व में अमरीकी अड्डों को तबाह कर रही हैं, और दूसरी तरफ से ईरान ने पहले होर्मुज बंद करके दुनिया भर पर दबाव बनाया, और अब वह हूती विद्रोहियों के ज़रिये अल मंडेब भी बंद करने वाला है। ट्रम्प ने सोचा भी नहीं होगा कि ईरान के तरकश में एक तीर हूती नाम का भी है।
ये हूती विद्रोही कौन हैं? इनका ईरान से क्या ताल्लुक है? ये ईरान की युद्ध-डिज़ाइन में कहां फिट होते हैं? अभी तक ये कहां गायब थे? अचानक ये कैसे टपक पड़े और ट्रम्प-नेतन्याहू के एप्स्टीन गिरोह के लिए पहले से ज्यादा समस्याएं पैदा करने लगे? दरअसल, हूती विद्रोहियों का ताल्लुक यमन के शिया विद्रोही संगठन से है। इनका पूरा नाम अंसार अल्लाह है। ये मुख्य रूप से यमन के उत्तरी इलाके यानी सादाह प्रांत के जैदी शिया समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। नब्बे के दशक में इनकी शुरुआत एक सामाजिक-धार्मिक आंदोलन के रूप में हुई। इसके संस्थापक हुसैन बदरुद्दीन अल-हूती थे, जिनके नाम पर यह संगठन जाना जाता है। शुरू में हूती तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह के भ्रष्टाचार और सल़ाफी (सुन्नी) विचारधारा के विस्तार के खिलाफ थे। 2004 में इनका हथियारबंद विद्रोह शुरू हुआ। अरब स्प्रिंग की विचारोत्तेजक घटनाओं के बाद हूतियों ने राजधानी सना समेत यमन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। इससे यमन में गृहयुद्ध शुरू हो गया। इस समय हूती यमन के 80 प्रतिशत आबादी वाले क्षेत्रों (उत्तर और पश्चिम) में अपनी सरकार चला रहे हैं। वे टैक्स वसूलते हैं और उन्होंने अपनी मुद्रा भी जारी कर दी है। दरअसल, वे ईरान के समर्थन वाले ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ का हिस्सा हैं, जिसके सदस्य हिजबुल्लाह और हमास जैसे संगठन हैं। हूती खुद को ‘अमरीका, इज़रायल और यहूदियों’ का दुश्मन मानते हैं और नारा लगाते हैं : ‘अमरीका का खात्मा हो, इज़रायल का खात्मा हो।’ हूतियों को ईरान से हथियार, ट्रेनिंग और मिसाइल-ड्रोन तकनीक मिलती है। उन्होंने लाल सागर में सैकड़ों जहाजों पर हमले किए हैं।
अभी तक हूती मौके का इंतज़ार कर रहे थे। अब ईरान के साथ योजनाबद्ध सलाह-मश्विरा करके उन्होंने सीधे युद्ध में कूदने की घोषणा की है। 28 मार्च को उन्होंने इज़रायल पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं- यह उनके पहले सीधे हमले में से एक था। 2023-2025 में गाज़ा युद्ध के दौरान उन्होंने 100 से ज्यादा जहाजों पर हमले किए थे, जिससे सारी दुनिया में जहाज़ों का आवागमन बुरी तरह से प्रभावित हुआ था। अमरीका और इज़रायल को हूतियों से सबसे बड़ा खतरा यही है। इस समय होर्मुज ईरान ने बंद कर दिया है, इसलिए सऊदी अरब आदि खाड़ी देशों का तेल लाल सागर के रास्ते पर बने यानबू बंदरगाह से गुजर रहा है। हूती इसे निशाना बना सकते हैं, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति, कीमतें और अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी। जल्दी ही देखने में आएगा कि वे इज़राइल पर मिसाइलों और ड्रोनों से ज़बरदस्त हमले करेंगे। वे सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात के तेल संस्थानों और अमरीकी ठिकानों को भी निशाना बनाएंगे। हूती ईरान के लिए ‘दूसरा मोर्चा’ खोल रहे हैं, ताकि अमरीका-इज़रायल की सेनाओं को खाड़ी और लाल सागर दोनों तरफ बांट दिया जाए। इससे युद्ध लंबा खिंच सकता है और तेल संकट गहरा सकता है। कुल मिला कर हूती ईरान द्वारा चलाये जा रहे युद्ध का ताज़ा हथियार हैं। वे सीधे बड़ी सेनाओं से नहीं लड़ते, बल्कि जहाजों को वैश्विक व्यापार और ऊर्जा मार्गों को मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाकर दबाव डालते हैं। हूतियों ने अभी-अभी युद्ध में एंट्री की है। आगे क्या होता है, यह अमरीका-इज़रायल की प्रतिक्रिया, सऊदी अरब की भूमिका और ईरान की रणनीति पर निर्भर करेगा।
डोनाल्ड ट्रम्प और नेतन्याहू के मुंह पर एक और तमाचा भी पड़ा है। यह किसी मुस्लिम देश या विद्रोही संगठन ने नहीं, बल्कि एक बड़े युरोपीय देश के प्रधानमंत्री ने मारा है। ये हैं स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ जिनका ताल्लुक स्पेन की सोशलिस्ट पार्टी से है। सांचेज़ हिम्मत और जीवट के साथ व बड़ी स्पष्टता दिखाते हुए खाड़ी युद्ध का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने ट्रम्प और नेतन्याहू की कड़ी आलोचना की है। उनका मुख्य नज़रिया नो टू वार’ जैसे स्वागत योग्य जुमले के इर्दगिर्द गठित होता है। सांचेज़ बार-बार अंतर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करने और शांतिपूर्ण, कूटनीतिक समाधान की वकालत करते हैं। वे 2003 के इराक युद्ध का हवाला देते हुए कहते हैं कि वर्तमान ईरान युद्ध उससे भी ‘कहीं ज्यादा खतरनाक और व्यापक’ है। वे अमरीका और इज़रायल की सैन्य कार्रवाइयों को ‘अवैध, अनुचित और खतरनाक’ मानते हैं। स्पेन ने साफ कह दिया है कि वह अमरीका को अपने देश में रोटा और मोरोन में बने हुए सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ नहीं करने देगा। सांचेज़ का कहना है कि कुछ लोग दुनिया में आग लगाते हैं और बाकी के हिस्से में आती है उसकी राख। सांचेज़ की मान्यता है कि इज़रायल की गाज़ा कार्रवाई ज़रूरत से ज्यादा और ‘निहत्थे लोगों का सफाया’ करने की श्रेणी में आती है। उन्होंने इसे मानवीय कानूनों का उल्लंघन बताया है। स्पेन 2024 में फिलिस्तीन को राज्य के रूप में मान्यता दे चुका है। आयरलैंड और नॉर्वे ने भी इसी तरह से फिलिस्तीन को मान्यता दी है। इन देशों के नेता अपने इस कदम को ‘न्याय और शांति की दिशा में ऐतिहासिक कदम’ मानते हैं।
ट्रम्प का विरोध केवल ईरान, हूती और सांचेज़ ही तमाचा नहीं कर रहे। ट्रम्प के असली मकसद को उजागर करने वाली ऐसी ही हस्तियों में एक नाम जो केंट का भी है। जो केंट अमरीका के एक प्रमुख पूर्व सैन्य अधिकारी, खुफिया विशेषज्ञ और राजनेता हैं। उनका पूरा नाम जोसेफक्ले केंट है। केंट 17-18 साल की उम्र में अमरीकी सेना में भर्ती हुए। ग्रीन बेरे जैसी स्पेशल फोर्स और रेंजर जैसी प्रतिष्ठित अमरीकी फौजी संरचनाओं में केंट ने सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने मुख्य रूप से इराक में और 11 मुकामों पर कॉम्बेट सर्विस दी और 20 साल की सेवा के बाद 2018 में रिटायर हुए। केंट ने छह ब्रॉन्ज स्टार समेत कई सम्मान भी प्राप्त किए। केंट की पत्नी शैनन केंट नेवी में क्रिप्टोलॉजिस्ट थीं। वे 2019 में सीरिया में आईएसआईएस सुसाइड बॉम्बर हमले में मारी गईं। यानी, केंट एक गोल्ड स्टार स्पाउज़ शहीद के पति हैं। सेना के बाद केंट ने सीआईए में पैरामिलिट्री ऑफिसर के रूप में काम किया। जब ट्रम्प राजनीति में उतरे तो केंट ने उनका समर्थन किया। 2020 में वे ट्रम्प की चुनावी मुहिम में विदेशी मामलों के सलाहकार रहे। वाशिंगटन राज्य से रिपब्लिकन उम्मीदवार के रूप में 2022 और 2024 में चुनाव लड़े लेकिन दोनों बार हार गए। जुलाई 2025 में ट्रम्प ने उन्हें नैशनल काउंटर टेररिज़म सेंटर का डायरेक्टर नियुक्त किया। वे तुलसी गब्बार्ड के तहत काम करते थे। पिछले दिनों जो केंट ने एनसीटीसी के डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया— यह ट्रम्प प्रशासन में ईरान युद्ध के खिलाफ इस्तीफा देने वाले सबसे उच्च-स्तरीय अधिकारी हैं।
उन्होंने टकर कार्लसन के साथ किये गये एक मशहूर पॉडकास्ट में बताया कि इस्तीफे के मुख्य तौर पर चार कारण थे। पहला, ईरान की तरफ से अमरीका के लिए कोई आसन्न खतरा नहीं था। दूसरा, युद्ध इज़रायल और उसकी समर्थक अमरीकी लॉबी के दबाव से शुरू किया गया। तीसरा, अमरीका इज़रायल के हितों के लिए लड़ रहा है, न कि अपने। चौथा, उन्होंने इस युद्ध की इराक युद्ध (2003) की तुलना की और कहा कि यह उसी तरह का मनमाने तौर पर गढ़ा गया युद्ध है। उन्होंने ट्रम्प प्रशासन की मध्य पूर्व नीति पर सवाल उठाए और कहा कि अमरीकी सैनिक इज़रायल के लिए अपनी जान दे रहे हैं। जो केंट का दावा है कि उनका नज़रिया ही असल में अमरीका फर्स्ट नज़रिया है। मेक अमरीका ग्रेट अगेन के दायरों में केंट एक ऐसी हस्ती हैं जो मानते हैं कि मध्य-पूर्व में अनंत युद्ध जारी रहने से अमरीका कमजोर होता है, संसाधन बर्बाद होते हैं और चीन/रूस जैसे असली प्रतिद्वंद्वियों से अमरीका का ध्यान भटकता है।
जब ट्रम्प ने 28 फरबरी को युद्ध की शुरुआत की थी, तो न उन्होंने हूती विद्रोहियों की भूमिका का पूर्वानुमान लगाया था, न ही स्पेन के प्रधानमंत्री सांचेज़ के दृष्टिकोण की उनकी निगाह में कोई गिनती थी और न ही वे जो केंट जैसे अपने भीतरी आलोचकों के बारे में कुछ सोच पाये थे। ईरान की तरफ से होने वाले रक्षात्मक प्रतिरोध का भी उन्हें कोई अंदाज़ा था। ईरान इस युद्ध को हाइब्रिड वार में बदल देगा, यह तो उनकी योजना का हिस्सा था ही नहीं। आज स्थिति यह है कि जो व्यक्ति दुनिया का एकमात्र चौधरी बनने का सपना देख रहा था और जो वेनेजुएला के तेल पर कब्ज़ा करने के बाद ईरान के तेल पर कब्जा करने के बाद सारी दुनिया की ऊर्जा ज़रूरतों को अपने शिकंजे में ले लेना चाहता था, वह किसी तरह से अपनी इज्जत बचाने की कोशिश करने में लगा हुआ है। ट्रम्प के पैरों तले की ज़मीन खिसक चुकी है। अब केवल वे फिकरेबाज़ी ही कर सकते हैं। मसलन, उनकी ताज़ी जुमलेबाज़ी यह है कि वे होर्मुज जलडमरूमध्य को नाम बदल कर ट्रम्प स्ट्रेट या स्ट्रेट ऑफ ट्रम्प कह रहे हैं। अपनी बातों को मसालेदार बनाने के लिए उन्होंने कहना शुरू कर दिया है कि अब उनका अगला निशाना क्यूबा होगा। अमरीकी व अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना कुछ और है। वे कह रहे हैं कि खाड़ी युद्ध में ट्रम्प को अपनी स्थिति का भान तब होगा जब नवम्बर में उन्हें मध्यावधि चुनावों का सामना करना पड़ेगा।
लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और
भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।



