देश के भविष्य का ब्लूप्रिंट है जनगणना
जनसंख्या के मामले में दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश में 1 अप्रैल 2026 से ‘जनगणना 2027’ के पहले चरण की शुरुआत हो गई है। यह भारत की 16वीं और आज़ादी के बाद की 8वीं जनगणना है। साल 1872 में पहली व्यापक जनगणना से शुरू होने वाली हर दस वर्षीय जनगणना का मकसद विकसित होते सामाजिक ताने बाने को समझना रहा है। सालों से जैसे-जैसे देश बदल रहा है, वैसे-वैसे जनगणना करने तरीके और दायरा भी बदल रहा है।
जनगणना इसलिए कराई जाती है ताकि सरकार को यह पता चल सके कि देश में कितने लोग हैं, वे कहां रहते हैं, क्या काम करते हैं और किस भाषा में बात करते हैं। हालांकि जनगणना सिर्फ लोगों की गिनती नहीं होती, यह देश की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तस्वीर दिखाती है। इससे सरकार को नीतियां बनाने, संसाधनों का वितरण और योजनाओं की दिशा तय करने में मदद मिलती है।
भारत में सदियों पुराने ग्रंथ ऋग्वेद में भारत में 800-600 ईसा पूर्व में एक प्रकार की जनसंख्या गणना का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा कौटिल्य के अर्थशास्त्र और मुगल काल में आईन-ए-अकबरी में भी जनगणना कराने के बारे में जिक्र किया गया है। आधुनिक काल में जनगणना का इतिहास 1800 से शुरू होता है जब इंग्लैंड ने अपनी जनगणना कराई थी। ब्रिटिश काल में भारत के अंदर जेम्स प्रिंसेप द्वारा इलाहाबाद (वर्ष 1824) और बनारस (वर्ष 1827-28) में जनगणना कराई गई थी।
एक भारतीय शहर की पहली पूर्ण जनगणना वर्ष 1830 में हेनरी वाल्टर द्वारा ढाका (आज का बांग्लादेश) में करवाई गई थी। भारत में पहली बार आधिकारिक जनगणना सन् 1872 में ब्रिटिश शासन के दौरान कराई गई थी। हालांकि यह जनगणना पूरे देश में एक साथ नहीं हुई थी, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में चरणबद्ध तरीके से कराई गई थी। 1881 में भारत में पहली बार संपूर्ण और व्यवस्थित जनगणना कराई गई, जिसे ‘पहली आधुनिक जनगणना’ माना जाता है। तब से हर 10 साल में जनगणना कराई जा रही है। भारत की जनगणना दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक जनगणना मानी जाती है। आजाद भारत की पहली जनगणना का कार्य 1951 में हुआ था। उस समय देश की आबादी महज 36 करोड़ थी, जबकि 2011 में हुई आखिरी जनगणना में देश की आबादी 1.21 अरब हो चुकी थी। भारत में प्रत्येक दस वर्ष के अंतराल पर नियमित जनगणना का कार्य किया जाता है। दशकीय (10 साल में होने वाली) जनगणना का संचालन गृह मंत्रालय के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त का कार्यालय की ओर से किया जाता है। साल 1951 तक प्रत्येक जनगणना के लिए तदर्थ आधार पर जनगणना संगठन की स्थापना की गई थी।
भारत में जनगणना का काम संविधान के जनगणना अधिनियम, 1948 के प्रावधानों के तहत किया जाता है। इस कानून को बनाने का विधेयक भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की ओर से पेश किया गया था। भारत के संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत जनगणना संघ का विषय है। यह संविधान की सातवीं अनुसूची के क्रमांक 69 में सूचीबद्ध है। जनगणना अधिनियम, 1948 में गोपनीयता की गारंटी भी दी जाती है। जनगणना के दौरान एकत्र की गई जानकारी इतनी गोपनीय होती है कि यह न्यायालयों के लिये भी सुलभ नहीं होती है। गोपनीयता के उल्लंघन पर दंड का भी प्रावधान है। साल 2011 में हुई जनगणना में 29 सवाल पूछ गए थे। इनमें सामान्य सवालों के अलावा मातृभाषा, अन्य भाषाओं की जानकारी, माइग्रेशन, रोज़गार और पलायन से जुड़ी वजह से संबंधित सवाल किए गए थे। जनगणना 2021 को कोविड-19 महामारी के प्रकोप के कारण स्थगित कर दिया गया था। हालांकि यह पहली डिजिटल जनगणना होगी, जिसमें स्व-गणना का भी प्रावधान होगा। यह पहली बार है कि ऐसे परिवार और परिवारों में रहने वाले सदस्यों की जानकारी एकत्र की जाएगी, जिनका मुखिया कोई ट्रांसजेंडर हो। पहले केवल पुरुष और महिला के लिये एक कॉलम होता था। जनगणना के पहले चरण (मकान सूचीकरण और आवास) में कुल 33 सवाल पूछे जाएंगे। ये सवाल मकान की स्थिति, परिवार की सुख-सुविधाओं, पीने के पानी, शौचालय, बिजली, ईंधन और मुख्य रूप से खाए जाने वाले अनाज से संबंधित होंगे। इस बार की जनगणना कई मायनों में ऐतिहासिक साबित होने वाली है। यह पहली बार होगा जब जनगणना पूरी तरह डिजिटल माध्यम से संपन्न की जाएगी, जिससे न केवल प्रक्रिया तेज और पारदर्शी बनेगी, बल्कि आंकड़ों की गुणवत्ता भी बेहतर होगी। पारंपरिक कागज आधारित प्रणाली के स्थान पर अब मोबाइल एप, वेब पोर्टल और रियल-टाइम डेटा मॉनिटरिंग का उपयोग किया जाएगा। इससे जनगणना कर्मचारियों द्वारा एकत्रित जानकारी सीधे सर्वर पर पहुंचेगी, जिससे डेटा प्रोसेसिंग में लगने वाला समय काफी कम हो जाएगा। इस डिजिटल जनगणना की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसे दो चरणों में आयोजित किया जाएगा। इससे डेटा अधिक व्यवस्थित और विश्लेषण योग्य बनेगा।



