नक्सलवाद के सामाजिक कारण खत्म नहीं हुए
नक्सल शब्द का इस्तेमाल अक्सर उनके लिए किया जाता रहा है जो विदेशी सोच के साथ तालमेल रखकर किसी भी तरह की असामनता को खत्म करने के लिए हथियार उठाने का आह्वान करते हैं। प्रश्न यह नहीं कि नक्सलवाद समाप्त हो गया तो इसके लिए जश्न जैसा कोई आयोजन हो और सरकार की उपलब्धियों पर गर्व हो, बल्कि यह है कि क्या प्रशासन अपने रवैये से उस सोच को जड़ से समाप्त करने में सफल हुआ या होता दिख रहा है जो विदेशों, विशेषकर उन देशों से जिनका हमारी संस्कृति, सभ्यता और गौरवशाली विरासत से कोई संबंध ही नहीं है।
कुछ तथ्य और कुछ कल्पना
आज़ादी के बीस वर्ष बाद दो युवकों चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने एक बड़े प्रदेश के छोटे से अंचल नक्सलबाड़ी में हथियार के बल पर क्रांति लानी चाही। एक ऐसे समाज के खिलाफ बगावत करने का संकल्प लिया, जो पारम्परिक रूप में स्वयं को गरीबों की मेहनत तथा सम्मान पर अपना एकाधिकार समझता रहा था। उसके बाद जो हुआ वह अपने आप में तत्कालीन सामाजिक ताने-बाने से अलग होने के कारण एक तरह के विचित्र भाव से देखा गया। जब सरकार ने उसका नामकरण ही उस भूमि के नाम पर नक्सलवाद कर दिया तब इनके हौसलें और भी बुलंद हुए। उन दिनों मार्क्सवादी विचारधारा और राजनीतिक रूप से कम्युनिस्ट यानी साम्यवाद अर्थात जो समानता के व्यवहार में विश्वास रखता हो, उसे समझने का दौर शुरू हो चुका था। चीन के माओत्से तुंग की विचारधारा हमारी सीमा से होकर चुपचाप प्रवेश करती गई, जो अत्याचार करने वाले को सज़ा देने की थी। इसमें लेनिन की भूमिका भी शामिल हो गई और मार्क्स तथा लेनिन के नाम से एक नई कम्युनिस्ट पार्टी अस्तित्व में आ गई। बंदूक और बारूद इस आंदोलन की सोच का अंग बनता गया। यह लहर एक ज़िले से निकलकर देश के उन सभी प्रदेशों में फैलती गई जहां-जहां शोषण हो रहा था।
सरकार ने भी अपनी दमनकारी नीतियों से इस तेज़ी से उभर रहे वंचित और शोषित समाज को किसी भी तरह से कुचलने का काम किया। यह समस्या सुरक्षा बलों द्वारा नियंत्रित किए जाने के दौर में पहुंच गई जिनका काम यह नहीं होता कि वह लोगों की बात सुने और उसके आधार पर फैसला करें, बल्कि उसे केवल अपने अधिकारियों द्वारा दिए गए शासक वर्ग अर्थात् केंद्र के अधीन ग्रह मन्त्रालय के आदेश का पालन करना होता है। देखा जाए तो जो लोग आंदोलन कर रहे थे, वे सिवाय इसके और कुछ नहीं चाहते थे कि उनकी बात सुनी जाए। उनके साथ जो ज़ुल्म हो रहा है, रोका जाए, उनकी बेरोज़गारी की समस्या का हल निकाला जाए और सबसे बड़ी बात कि उनके लिए शैक्षणिक व्यवस्था और रहने को पर्याप्त सुविधाओं सहित आवास मुहैया करवाए जाएं क्योंकि उनकी ज़मीन का अधिग्रहण कर उन्हें केवल आश्वासन के सहारे छोड़ दिया गया था। इसमें कहीं भी कुछ गलत नहीं था लेकिन सरकार ने गोली-बंदूक से उनका दमन और ज़मींदारों का संरक्षण किया।
हठधर्मी सरकार की कार्यशैली
यह बहुत बाद में समझ आया कि प्रमुखतया आदिवासी क्षेत्रों की समस्याएं सामान्य प्रदेशों जैसी नहीं होतीं। उन्हें अपने रीति-रिवाज़ों और पारिवारिक मूल्यों के साथ जीने की आज़ादी चाहिए होती है। वे चाहते हैं कि उनकी स्त्रियों को दबंगों की गंदी मानसिकता का शिकार न होना पड़े। उनके लिए भी सड़क और आवागमन के साधन उपलब्ध हों। वे अपने त्यौहार मनाने के लिए समुचित सुविधाएं चाहते हैं। यह सब उन्हें इसलिए नहीं चाहिए था कि वे अपने जीवन में इन सब का अभाव महसूस करते थे, बल्कि इसलिए कि सरकारों ने अपनी विकास परियोजनाओं के नाम पर उनसे अपने जल, अपनी ज़मीन और उनके जीवन की मूलभूत संरचना जंगलों से छीन कर उन्हें बाहर निकाल दिया था। माओवाद ने इन्हें ही सबसे अधिक प्रभावित किया जिसका मूलमंत्र यह था कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिये शस्त्र उठाना ही होगा।
विडम्बना यह है कि जिन स्थानों पर शिक्षक, डॉक्टर, न्यायविद और स्वास्थ्य केंद्र होने चाहिए, वहां पुलिस और सुरक्षाबल ही तैनात रहते हैं। इससे जो भय और असुरक्षा का वातावरण बनता हैं, उसके कारण स्थायी रूप से कभी शांति स्थापित हो ही नहीं सकती। यह समझ से परे है कि सरकार उन पर नियंत्रण तो करना चाहती है, लेकिन उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेती। यही कारण है कि किसी क्षेत्र में दवाब कम होते ही फिर से पहले जैसी गतिविधियां शुरू हो जाती हैं।
यह कहना कि अब नक्सलवाद नहीं रहा, अपने-आप में एक भ्रामक तथ्य है। इसलिए इसकी समाप्ति की घोषणा भी वास्तविकता से कोसों दूर है। जो लोग इन क्षेत्रों में या उन स्थानों पर जहां आदिवासी रहते हैं, कभी गए हैं तो उन्हें अवश्य यह अनुभव हुआ होगा कि इनकी जीवनशैली, खानपान और दिनचर्या बिल्कुल अलग है और जब ऐसा है तो उनकी ज़रूरतें भी अलग हैं, लेकिन इस बात को समझे बिना और उन्हें अपनी बात डंडे के ज़ोर से मनवाने की नीति पर चलते हुए उनसे यह अपेक्षा रखना कि वे आपका साथ देंगे, एक तरह की गलतफहमी पालने जैसा है।
मुख्यधारा में शामिल कीजिए
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। इसलिए यहां चीन जैसा नियंत्रण संभव नहीं है। अक्सर हमारा लोकतंत्र हमारे लिए एक चुनौती बन जाता है। हम असंतोष को हिंसा से दबा नहीं सकते। उसके लिए उसकी जड़ पर प्रहार करना होता है जो जीवन की सभी सामान्य सुविधाओं का प्रत्येक नागरिक के लिए समान रूप से उपलब्ध किया जाना है। यह संभव नहीं कि किसी के पास इतना कि विलासिता कहलाए और किसी के लिए दो समय का भोजन भी न हो और उसे परिवार सहित आत्महत्या करनी पड़े। जो समझते हैं कि हिंसक होने को क्रांति मान लिया जाएगा तो वे भी म़गालते में जीने जैसा है। इसका सीधा मतलब यह है कि विकास का जो भी मॉडल हो, उसका सामाजिक न्याय और स्थानीय भागीदारी पर आधारित होना अनिवार्य है।



