नक्सलवाद खत्म, सामाजिक असमानता ?

देश के गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद खत्म करने की घोषणा कर दी। लोकतंत्र में उनके अनुसार बंदूक उठाने की ज़रूरत नहीं। अपने लंबे भाषण में उन्होंने बताया कि नक्सली भारतीय नहीं, विदेशी स्लोगन और विदेशी आदर्श को लाना चाहते थे, परन्तु यह मुमकिन था नहीं।  नक्सलवादी अमूमन उन लोगों को कहा जाता है जो असमानता दूर करने के लिए हथियार उठाने में यकीन करते रहे हैं उनकी सोच के पीछे विदेशी शक्तियों का फलस्फा होता है। सरकार इस आंदोलन को कुचल देने का गर्व महसूस कर रही है। लेकिन क्या वह सोच भी कुचल दी गई जो भले ही विदेश से आई और जिसका हमारी संस्कृति, सभ्यता से कोई रिश्ता नहीं था।
भारत ने मुश्किल से आज़ादी का सूर्य देखा था। परन्तु दो दशकों बाद ही कानू सान्याल और चारु मजूमदार नामक दो युवकों ने एक बड़े प्रदेश के छोटे से गांव नक्सलबाड़ी में हथियारों के बल पर क्रांति का बिगुल बजाना चाहा। एक लंबे समाज के विरुद्ध विद्रोह का संकल्प लिया जो परम्परागत रूप से निर्धन लोगों के श्रम और सम्मान पर अपना पूरा अधिकार समझ रहा था। इसे आधार बना कर अपने आप में उस समय के सामाजिक ढांचे से अलग होने को संदेह से देखा गया। जब इस आंदोलन को ‘नक्सलवाद’ का नाम दिया गया तब उनके जोश को पंख लग गये। मार्क्सवादी विचारधारा को राजनीतिक आधार देकर कम्युनिस्ट उर्फ साम्यवाद, समानता के व्यवहार का दर्शन समझा और समझाया गया। मार्क्सवाद से आगे माकोर्त्स की विचारधारा को सामने रखा गया। मार्क्स तथा लेनिन का नाम जोड़ कर मार्क्स तथा लेनिन के नाम से कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ। बंदूक और बारूद की शब्दावली सामने आने लगी। कार्ल मार्क्स ने औद्योगिक-पूंजी विकास के परिणाम को समझा और इस परिणाम तक आए कि इससे इतनी अतिरिक्त पूंजी या मुनाफा हो सकता है। मनुष्य-जाति की बुनियादी ज़रूरतें पूरी की जा सकती हैं। तथापि पूंजी के एकाधिकार के खतरे उन्हें नज़र आए। भारत में जब यह नक्सलवादी आंदोलन पनप रहा था, सरकार ने दमनवादी नीतियों से उसे कुचलने का काम किया। सुरक्षा बलों द्वारा नियंत्रण किए जाने पर। लोगों की बात सुनकर फैसला देने का काम करने की जगह अधिकारियों  द्वारा दिए गए आदेश का पालन किया गया। जो लोग आंदोलन कर रहे थे, वे हर हाल में चाहते थे कि उनकी बात को अनसुना न किया जाए। कहीं जुल्मो सितम है तो उसे रोका जाए, बेरोज़गारी की समस्या का फौरी हल किया जाए। फिर छुपाने की जगह दी जाए, लेकिन सरकार संवेदनापूर्ण विचार करने की जगह दमन की नीति पर थी और छोटे जमींदारों को संरक्षण दे रही थी।एम.एन. राय का चिंतन भी यहा मौजूद था। वह जिस आंदोलनधर्मी मानववाद को विकसित करना चाहते थे, उसमें बौद्धिक स्वतंत्रता या मौलिक अन्तर्विकास की संभावना को प्राथमिकता दी गई थी, परन्तु इन आंदोलनकारियों को अपनी राह बनाने में दिलचस्पी थी।
इसकी घोषणा कर दी गई कि अब नक्सलवाद खत्म हो गया है, कितने नक्सलवादी मार दिए गए, कितने अपनी राह छोड़ गए और सुरक्षा बलों को कितनी सफलता मिली, परन्तु क्या हमने गरीबी, असमानता, शोषण के रास्ते को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है। भारत में चीन जैसा नियंत्रण सम्भव नहीं। असंतोष के कारणों पर हमें गहन विचार करना चाहिए। संवेदनशील व्यवस्था के लिए जी जान से काम करना चाहिए। सामाजिक न्याय पर जितना ज़ोर दिया जाएगा उतनी ही सफलता मिलेगी।

#नक्सलवाद खत्म
# सामाजिक असमानता ?